भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 407
  • अयोध्याकाण्ड *

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गुर पितु मातु बंधु सुर सार्ई । सेइअहिं सकल प्रान की नाई॥ रामु प्रानप्रिय जीवन जी के । स्वार्थ रहित सखा सबही के॥

गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी, इन सबकी सेवा प्राणके समान करनी चाहिये। फिर श्रीरामचन्द्रजी तो प्राणोंके भी प्रिय हैं, हृदयके भी जीवन हैं और सभीके स्वार्थरहित सखा हैं॥ ३॥

पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें । सब मानिअहिं राम के नातें॥ अस जियँ जानि संग बन जाहू । लेहु तात जग जीवन लाहू॥

जगत्में जहाँतक पूजनीय और परम प्रिय लोग हैं, वे सब रामजीके नातेसे ही [पूजनीय और परम प्रिय] मानने योग्य हैं। हृदयमें ऐसा जानकर, हे तात! उनके साथ बन जाओ और जगत्में जीनेका लाभ उठाओ॥ ४॥

दो०—भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ॥ जौं तुम्हरे मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ॥ ७४॥

मैं बलिहारी जाती हूँ, [हे पुत्र!] मेरे समेत तुम बड़े ही सौभाग्यके पात्र हुए, जो तुम्हारे चित्तेने छल छोड़कर श्रीरामजीके चरणोंमें स्थान प्राप्त किया है॥ ७४॥

पुत्रवती जुबती जग सोई । रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥ नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी । राम बिमुख सुत तें हित जानी॥

संसारमें वही युवती स्त्री पुत्रवती है जिसका पुत्र श्रीरघुनाथजीका भक्त हो। नहीं तो जो रामसे विमुख पुत्रसे अपना हित जानती है, वह तो बाँझ ही अच्छी। पशुकी भाँति उसका ब्याना (पुत्र प्रसव करना) व्यर्थ ही है॥ १॥

तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं । दूसर हेतु तात कछु नाहीं॥ सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू । राम सीय पद सहज सनेहू॥

तुम्हारे ही भाग्यसे श्रीरामजी बनको जा रहे हैं। हे तात! दूसरा कोई कारण नहीं है। सम्पूर्ण पुण्योंका सबसे बड़ा फल यही है कि श्रीसीतारामजीके चरणोंमें स्वाभाविक प्रेम हो॥ २॥

रागु रोषु इरिषा मदु मोहू । जनि सपनेहूँ इन्ह के बस होहू॥ सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करेहु सेवकाई॥

राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह—इनके वश स्वप्नमें भी मत होना। सब प्रकारके विकारोंका त्याग कर मन, वचन और कर्मसे श्रीसीतारामजीकी सेवा करना॥ ३॥