भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • रामचरितमानस *

तुम्ह कहहुँ बन सब भाँति सुपासू । सँग पितु मातु रामु सिय जासू ॥ जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू । सुत सोड़ करेहु इहड़ उपदेसू ॥

तुमको वनमें सब प्रकारसे आराम है, जिसके साथ श्रीरामजी और सीताजीरूप पिता-माता हैं। हे पुत्र! तुम वही करना जिससे श्रीरामचन्द्रजी वनमें क्लेश न पावें, मेरा यही उपदेश है ॥४॥

छं०— उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं । पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं ॥ तुलसी प्रभुहि सिख देड़ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दर्ई । रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई ॥

हे तात! मेरा यही उपदेश है (अर्थात् तुम वही करना) जिससे वनमें तुम्हारे कारण श्रीरामजी और सीताजी सुख पावें और पिता, माता, प्रिय परिवार तथा नगरके सुखोंकी याद भूल जायँ। तुलसीदासजी कहते हैं कि सुमित्राजीने इस प्रकार हमारे प्रभु (श्रीलक्ष्मणजी) को शिक्षा देकर [वन जानेकी] आज्ञा दी और फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्रीसीताजी और श्रीरघुवीरजीके चरणोंमें तुम्हारा निर्मल (निष्काम और अनन्य) एवं प्रगाढ़ प्रेम नित-नित नया हो!

सो०— मातु चरन सिरु नाड़ चले तुरत संकित हृदयँ।

बागुर बिषम तोराड़ मनहुँ भाग मृगु भाग बस ॥ ७५ ॥

माताके चरणोंमें सिर नवाकर हृदयमें डरते हुए [कि अब भी कोई विघ्न न आ जाय] लक्ष्मणजी तुरंत इस तरह चल दिये जैसे सौभाग्यवश कोई हिरन कठिन फंदेको तुड़ाकर भाग निकला हो ॥७५॥

गए लखनु जहाँ जानकिनाथू । भे मन मुदित पाड़ प्रिय साथू ॥ बंदि राम सिय चरन सुहाए । चले संग नृपमंदिर आए ॥

लक्ष्मणजी वहाँ गये जहाँ श्रीजानकीनाथजी थे, और प्रियका साथ पाकर मनमें बड़े ही प्रसन्न हुए। श्रीरामजी और सीताजीके सुन्दर चरणोंकी वन्दना करके वे उनके साथ चले और राजभवनमें आये ॥१॥

कहहिं परसपर पुर नर नारी । भलि बनाड़ बिधि बात बिगारी ॥ तन कूस मन दुखु बदन मलीने । बिकल मनहुँ माखी मधु छीने ॥

नगरके स्त्री-पुरुष आपसमें कह रहे हैं कि विधाताने खूब बनाकर बात बिगाड़ी! उनके शरीर दुबले, मन दुःखी और मुख उदास हो रहे हैं। वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे शहद छीन लिये जानेपर शहदकी मक्खियाँ व्याकुल हों ॥२॥

कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं । जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं ॥ भड़ बड़ि भीर भूप दरबारा । बरनि न जाड़ बिषादु अपारा ॥