श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 409, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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सब हाथ मल रहे हैं और सिर धुनकर (पीटकर) पछता रहे हैं। मानो बिना पंखके पक्षी व्याकुल हो रहे हैं। राजद्वारपर बड़ी भीड़ हो रही है। अपार विषादका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ३ ॥ सचिर्व उठाइ राउ बैठारे । कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे ॥ सिय समेत दोउ तनय निहारी । व्याकुल भयउ भूमिपति भारी ॥
‘श्रीरामचन्द्रजी पधारे हैं’, ये प्रिय वचन कहकर मन्त्रीने राजाको उठाकर बैठाया। सीतासहित दोनों पुत्रोंको [वनके लिये तैयार] देखकर राजा बहुत व्याकुल हुए ॥ ४ ॥
दो०—सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ ।
बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ ॥ ७६ ॥
सीतासहित दोनों सुन्दर पुत्रोंको देख-देखकर राजा अकुलाते हैं और स्नेहवश बारंबार उन्हें हृदयसे लगा लेते हैं ॥ ७६ ॥
सकड़ न बोलि बिकल नरनाहू । सोक जनित उर दारुन दाहू ॥ नाइ सीसु पद अति अनुरागा । उठि रघुबीर बिदा तब मागा ॥
राजा व्याकुल हैं, बोल नहीं सकते। हृदयमें शोकसे उत्पन्न हुआ भयानक सन्ताप है। तब रघुकुलके वीर श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त प्रेमसे चरणोंमें सिर नवाकर उठकर विदा माँगी— ॥ १ ॥
पितु असीस आयसु मोहि दीजै । हरष समय बिसमउ कत कीजै ॥ तात किऐ प्रिय प्रेम प्रमादू । जसु जग जाइ होइ अपबादू ॥
हे पिताजी! मुझे आशीर्वाद और आज्ञा दीजिये। हर्षके समय आप शोक क्यों कर रहे हैं? हे तात! प्रियके प्रेमवश प्रमाद (कर्तव्यकर्ममें त्रुटि) करनेसे जगत्में यश जाता रहेगा और निन्दा होगी ॥ २ ॥
सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ । बैठारे रघुपति गहि बाहाँ ॥ सुनहु तात तुम्ह कहूँ मुनि कहहीं । रामु चराचर नायक अहहीं ॥
यह सुनकर स्नेहवश राजाने उठकर श्रीरघुनाथजीकी बाँह पकड़कर उन्हें बैठा लिया और कहा— हे तात! सुनो, तुम्हारे लिये मुनिलोग कहते हैं कि श्रीराम चराचरके स्वामी हैं ॥ ३ ॥
सुभ अरु असुभ करम अनुहारी । ईसु देइ फलु हृदयँ बिचारी ॥ करइ जो करम पाव फल सोई । निगम नीति असि कह सबु कोई ॥
शुभ और अशुभ कर्मोंके अनुसार ईश्वर हृदयमें विचारकर फल देता है। जो कर्म करता है वही फल पाता है। ऐसी वेदकी नीति है, यह सब कोई कहते हैं ॥ ४ ॥
दो०—औरु कऐ अपराधु कोउ और पाव फल भोगु ।
अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु ॥ ७७ ॥