श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 410, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें४०८
- रामचरितमानस *
[किन्तु इस अवसरपर तो इसके विपरीत हो रहा है,] अपराध तो कोई और ही करे और उसके फलका भोग कोई और ही पावे। भगवान्की लीला बड़ी ही विचित्र है, उसे जाननेयोग्य जगत्में कौन है ? ॥ ७७ ॥
रायँ राम राखन हित लागी । बहुत उपाय किए छलु त्यागी ॥ लखी राम रुख रहत न जाने । धरम धुंधर धीर सयाने ॥
राजाने इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीको रखनेके लिये छल छोड़कर बहुत-से उपाय किये। पर जब उन्होंने धर्मधुरन्धर, धीर और बुद्धिमान् श्रीरामजीका रुख देख लिया और वे रहते हुए न जान पड़े, ॥ १ ॥
तब नृप सीय लाड़ उर लीन्ही । अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही ॥ कहि बन के दुख दुसह सुनाए । सासु ससुर पितु सुख समुझाए ॥
तब राजाने सीताजीको हृदयसे लगा लिया और बड़े प्रेमसे बहुत प्रकारकी शिक्षा दी। वनके दुःसह दुःख कहकर सुनाये। फिर सास, ससुर तथा पिताके [पास रहनेके] सुखोंको समझाया। ॥ २ ॥
सिय मनु राम चरन अनुरागा । घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा ॥ औरउ सबहिं सीय समुझाई । कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई ॥
परन्तु सीताजीका मन श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें अनुरक्त था। इसलिये उन्हें घर अच्छा नहीं लगा और न वन भयानक लगा। फिर और सब लोगोंने भी वनमें विपत्तियोंकी अधिकता बता-बताकर सीताजीको समझाया ॥ ३ ॥
सचिव नारि गुर नारि सयानी । सहित सनेह कहहिं मृदु बानी ॥ तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू । करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू ॥
मन्त्री सुमन्त्रजीकी पत्नी और गुरु वसिष्ठजीकी स्त्री अरुन्धतीजी तथा और भी चतुर स्त्रियाँ स्नेहके साथ कोमल वाणीसे कहती हैं कि तुमको तो [राजाने] वनवास दिया नहीं है। इसलिये जो ससुर, गुरु और सास कहें, तुम तो वही करो ॥ ४ ॥
दो० — सिखसीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि ।
सरद चंद चंदिनि लगत जनु चकई अकुलानि ॥ ७८ ॥
यह शीतल, हितकारी, मधुर और कोमल सीख सुननेपर सीताजीको अच्छी नहीं लगी। [वे इस प्रकार व्याकुल हो गयीं] मानो शरद-ऋतुके चन्द्रमाकी चाँदनी लगते ही चकई व्याकुल हो उठी हो ॥ ७८ ॥
सीय सकुच बस उत्तरु न देई । सो सुनि तमकि उठी कैकेई ॥ मुनि पट भूषन भाजन आनी । आगें धरि बोली मृदु बानी ॥