श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 411, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
४०९
सीताजी संकोचवश उत्तर नहीं देतीं। इन बातोंको सुनकर कैकेयी तमककर उठी। उसने मुनियोंके वस्त्र, आभूषण (माला, मेखला आदि) और बर्तन (कमण्डलु आदि) लाकर श्रीरामचन्द्रजीके आगे रख दिये और कोमल वाणीसे कहा— ॥ १ ॥
नृपहि प्रानप्रिय तुम्ह रघुबीरा । सील सनेह न छाड़िहि भीरा ॥ सुकृतु सुजसु परलोकु नसाऊ । तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ ॥
हे रघुवीर! राजाको तुम प्राणोंके समान प्रिय हो। भीरु (प्रेमवश दुर्बल हृदयके) राजा शील और स्नेह नहीं छोड़ेंगे! पुण्य, सुन्दर यश और परलोक चाहे नष्ट हो जाय, पर तुम्हें बन जानेको वे कभी न कहेंगे ॥ २ ॥
अस बिचारि सोड़ करहु जो भावा । राम जननि सिख सुनि सुखु पावा ॥ भूपहि बचन बानसम लागे । करहिं न प्रान पयान अभागे ॥
ऐसा विचारकर जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो। माताकी सीख सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने [बड़ा] सुख पाया। परन्तु राजाको ये वचन बाणके समान लगे। [वे सोचने लगे] अब भी अभागे प्राण [क्यों] नहीं निकलते! ॥ ३ ॥
लोग बिकल मुरुछित नरनाहू । काह करिअ कछु सूझ न काहू ॥ रामु तुरत मुनि बेषु बनाई । चले जनक जननिहि सिरु नाई ॥
राजा मूर्च्छित हो गये, लोग व्याकुल हैं। किसीको कुछ सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें। श्रीरामचन्द्रजी तुरंत मुनिका वेष बनाकर और माता-पिताको सिर नवाकर चल दिये ॥ ४ ॥
दो०—सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत । बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत ॥ ७९ ॥
वनका सब साज-सामान सजकर (वनके लिये आवश्यक वस्तुओंको साथ लेकर) श्रीरामचन्द्रजी स्त्री (श्रीसीताजी) और भाई (लक्ष्मणजी)-सहित, ब्राह्मण और गुरुके चरणोंकी वन्दना करके सबको अचेत करके चले ॥ ७९ ॥
निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े । देखे लोग बिरह दव दाढ़े ॥ कहि प्रिय बचन सकल समुझाए । बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए ॥
राजमहलसे निकलकर श्रीरामचन्द्रजी वसिष्ठजीके दरवाजेपर जा खड़े हुए और देखा कि सब लोग विरहकी अग्निमें जल रहे हैं। उन्होंने प्रिय वचन कहकर सबको समझाया। फिर श्रीरामचन्द्रजीने ब्राह्मणोंकी मण्डलीको बुलाया ॥ १ ॥
गुर सन कहि बरषासन दीन्हे । आदर दान विनय बस कीन्हे ॥ जाचक दान मान संतोषे । मीत पुनीत प्रेम परितोषे ॥