भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 413
  • अयोध्याकाण्ड *

४११

मूर्छा दूर हुई, तब राजा जागे और सुमन्त्रको बुलाकर ऐसा कहने लगे—श्रीराम वनको चले गये, पर मेरे प्राण नहीं जा रहे हैं। न जाने ये किस सुखके लिये शरीरमें टिक रहे हैं ॥ ३ ॥

एहि तें कवन व्यथा बलवाना । जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना ॥ पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू । लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू ॥

इससे अधिक बलवती और कौन-सी व्यथा होगी जिस दुःखको पाकर प्राण शरीरको छोड़ेंगे। फिर धीरज धरकर राजाने कहा—हे सखा! तुम रथ लेकर श्रीरामके साथ जाओ ॥ ४ ॥

दो०—सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि ।

रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गाएँ दिन चारि ॥ ८१ ॥

अत्यन्त सुकुमार दोनों कुमारोंको और सुकुमारी जानकीको रथमें चढ़ाकर, वन दिखलाकर चार दिनके बाद लौट आना ॥ ८१ ॥

जों नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई । सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई ॥ तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी । फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी ॥

यदि धैर्यवान् दोनों भाई न लौटें—क्योंकि श्रीरघुनाथजी प्रणके सच्चे और दृढ़तासे नियमका पालन करनेवाले हैं—तो तुम हाथ जोड़कर विनती करना कि हे प्रभो! जनककुमारी सीताजीको तो लौटा दीजिये ॥ १ ॥

जब सिय कानन देखि डेराई । कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई ॥ सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू । पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू ॥

जब सीता वनको देखकर डरें, तब मौका पाकर मेरी यह सीख उनसे कहना कि तुम्हारे सास और ससुरने ऐसा सन्देश कहा है कि हे पुत्री! तुम लौट चलो, वनमें बहुत क्लेश हैं ॥ २ ॥

पितुगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी । रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी ॥ एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा । फिरइ त होइ प्रान अवलंबा ॥

कभी पिताके घर, कभी ससुराल, जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहीं रहना। इस प्रकार तुम बहुत-से उपाय करना। यदि सीताजी लौट आयीं तो मेरे प्राणोंको सहारा हो जायगा ॥ ३ ॥

नाहिं त मोर मरनु परिनामा । कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा ॥ अस कहि मुरुछि परा महि राऊ । रामु लखनु सिय आनि देखाऊ ॥

नहीं तो अन्तमें मेरा मरण ही होगा। विधाताके विपरीत होनेपर कुछ वश नहीं चलता। हा! राम, लक्ष्मण और सीताको लाकर दिखाओ। ऐसा कहकर राजा मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४ ॥