भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 414

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  • रामचरितमानस *

दो०—पाड़ रजायसु नाड़ सिरु रथु अति बेग बनाइ।

गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ ॥ ८२ ॥

सुमन्त्रजी राजाकी आज्ञा पाकर, सिर नवाकर और बहुत जल्दी रथ जुड़वाकर वहाँ गये जहाँ नगरके बाहर सीताजीसहित दोनों भाई थे ॥ ८२ ॥

तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए ॥

चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई ॥

तब (वहाँ पहुँचकर) सुमन्त्रने राजाके वचन श्रीरामचन्द्रजीको सुनाये और बिनती करके उनको रथपर चढ़ाया। सीताजीसहित दोनों भाई रथपर चढ़कर हृदयमें अयोध्याको सिर नवाकर चले ॥ १ ॥

चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा ॥

कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं ॥

श्रीरामचन्द्रजीको जाते हुए और अयोध्याको अनाथ [होते हुए] देखकर सब लोग व्याकुल होकर उनके साथ हो लिये। कृपाके समुद्र श्रीरामजी उन्हें बहुत तरहसे समझाते हैं, तो वे [अयोध्याकी ओर] लौट जाते हैं; परन्तु प्रेमवश फिर लौट आते हैं ॥ २ ॥

लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी ॥

घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपाहिं एकहि एक निहारी ॥

अयोध्यापुरी बड़ी डरावनी लग रही है। मानो अन्धकारमयी कालरात्रि ही हो। नगरके नर-नारी भयानक जन्तुओंके समान एक-दूसरेको देखकर डर रहे हैं ॥ ३ ॥

घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता ॥

बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोबर देखि न जाहीं ॥

घर श्मशान, कुटुम्बी भूत-प्रेत और पुत्र, हितैषी और मित्र मानो यमराजके दूत हैं। बगीचोंमें वृक्ष और बेलें कुम्हला रही हैं। नदी और तालाब ऐसे भयानक लगते हैं कि उनकी ओर देखा भी नहीं जाता ॥ ४ ॥

दो०—हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।

पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर ॥ ८३ ॥

करोड़ों घोड़े, हाथी, खेलनेके लिये पाले हुए हिरन, नगरके [गाय, बैल, बकरी आदि] पशु, पपीहें, मोर, कोयल, चकवे, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर— ॥ ८३ ॥

राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहाँ तहाँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े ॥

नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी ॥