भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 420

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  • रामचरितमानस *

फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको सोते जानकर लक्ष्मणजी उठे और कोमल वाणीसे मन्त्री सुमन्त्रजीको सोनेके लिये कहकर वहाँसे कुछ दूरपर धनुष-बाणसे सजकर, वीरासनसे बैठकर जागने (पहरा देने) लगे ॥ १ ॥

गुहँ बोलाइ पाहसू प्रतीती । ठावँ ठावँ राखे अति प्रीती ॥ आपु लखन पहिँ बैठेउ जाई । कटि भाथी सर चाप चढ़ाई ॥

गुहने विश्वासपात्र पहेरदारोंको बुलाकर अत्यन्त प्रेमसे जगह-जगह नियुक्त कर दिया। और आप कमरमें तरकस बाँधकर तथा धनुषपर बाण चढ़ाकर लक्ष्मणजीके पास जा बैठे ॥ २ ॥

सोवत प्रभुहि निहारि निषादू । भयउ प्रेम बस हृदयँ बिषादू ॥ तनु पुलकित जलु लोचन बहई । बचन सप्रेम लखन सन कहई ॥

प्रभुको जमीनपर सोते देखकर प्रेमवश निषादराजके हृदयमें विषाद हो आया। उसका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगा। वह प्रेमसहित लक्ष्मणजीसे वचन कहने लगा— ॥ ३ ॥

भूपति भवन सुभायँ सुहावा । सुरपति सदनु न पटतर पावा ॥ मनिमय रचित चारु चौबारे । जनु रतिपति निज हाथ सँवारे ॥

महाराज दशरथजीका महल तो स्वभावसे ही सुन्दर है, इन्द्रभवन भी जिसकी समानता नहीं पा सकता। उसमें सुन्दर मणियोंके रचे चौबारे (छतके ऊपर बँगले) हैं, जिन्हें मानो रतिके पति कामदेवने अपने ही हाथों सजाकर बनाया है; ॥ ४ ॥

दो०—सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुवास । पलँग मंजु मनि दीप जहँ सब बिधि सकल सुपास ॥ १० ॥

जो पवित्र, बड़े ही विलक्षण, सुन्दर भोगपदार्थोंसे पूर्ण और फूलोंकी सुगन्धसे सुवासित है; जहाँ सुन्दर पलँग और मणियोंके दीपक हैं तथा सब प्रकारका पूरा आराम है; ॥ १० ॥

बिबिध बसन उपधान तुराई । छीर फेन मृदु बिसद सुहाई ॥ तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं । निज छबि रति मनोज मदु हरहीं ॥

जहाँ [ओढ़ने-बिछानेके] अनेकों वस्त्र, तकिये और गदे हैं, जो दूधके फेनके समान कोमल, निर्मल (उज्ज्वल) और सुन्दर हैं; वहाँ (उन चौबारोंमें) श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी रातको सोया करते थे और अपनी शोभासे रति और कामदेवके गर्वको हरण करते थे ॥ ११ ॥

ते सिय रामु साथरीं सोए । श्रमित बसन बिनु जाहिँ न जोए ॥ मातु पिता परिजन पुरबासी । सखा सुसील दास अरु दासी ॥