भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 421
  • अयोध्याकाण्ड *

४११

वही श्रीसीता और श्रीरामजी आज घास-फूसकी साथरीपर थके हुए बिना वस्त्रके ही सोये हैं। ऐसी दशामें वे देखे नहीं जाते। माता, पिता, कुटुम्बी, पुरवासी (प्रजा), मित्र, अच्छे शील-स्वभावके दास और दासियाँ—॥ २ ॥

जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई। महि सोवत तेड़ राम गोसाई॥ पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ॥

सब जिनकी अपने प्राणोंकी तरह सार-सँभार करते थे, वही प्रभु श्रीरामचन्द्रजी आज पृथ्वीपर सो रहे हैं। जिनके पिता जनकजी हैं, जिनका प्रभाव जगत्में प्रसिद्ध है; जिनके ससुर इन्द्रके मित्र रघुराज दशरथजी हैं, ॥ ३ ॥

रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही॥ सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू॥

और पति श्रीरामचन्द्रजी हैं, वही जानकीजी आज जमीनपर सो रही हैं। विधाता किसको प्रतिकूल नहीं होता! सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी क्या बनके योग्य हैं? लोग सच कहते हैं कि कर्म (भाग्य)ही प्रधान है ॥ ४ ॥

दो०—कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।

जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह॥ ११ ॥

कैकयराजकी लड़की नीचबुद्धि कैकेयीने बड़ी ही कुटिलता की, जिसने रघुनन्दन श्रीरामजीको और जानकीजीको सुखके समय दुःख दिया ॥ ११ ॥

भड़ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥ भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी॥

वह सूर्यकुलरूपी वृक्षके लिये कुल्हाड़ी हो गयी। उस कुबुद्धिने सम्पूर्ण विश्वको दुःखी कर दिया। श्रीराम-सीताको जमीनपर सीते हुए देखकर निषादको बड़ा दुःख हुआ ॥ १२ ॥

बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी॥ काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भाता॥

तब लक्ष्मणजी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके रससे सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले—हे भाई! कोई किसीको सुख-दुःखका देनेवाला नहीं है। सब अपने ही किये हुए कर्मोंका फल भोगते हैं ॥ २० ॥

जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा॥ जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपति बिपति करमु अरु कालू॥