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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • अयोध्याकाण्ड *

४११

वही श्रीसीता और श्रीरामजी आज घास-फूसकी साथरीपर थके हुए बिना वस्त्रके ही सोये हैं। ऐसी दशामें वे देखे नहीं जाते। माता, पिता, कुटुम्बी, पुरवासी (प्रजा), मित्र, अच्छे शील-स्वभावके दास और दासियाँ—॥ २ ॥

जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई। महि सोवत तेड़ राम गोसाई॥ पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ॥

सब जिनकी अपने प्राणोंकी तरह सार-सँभार करते थे, वही प्रभु श्रीरामचन्द्रजी आज पृथ्वीपर सो रहे हैं। जिनके पिता जनकजी हैं, जिनका प्रभाव जगत्में प्रसिद्ध है; जिनके ससुर इन्द्रके मित्र रघुराज दशरथजी हैं, ॥ ३ ॥

रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही॥ सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू॥

और पति श्रीरामचन्द्रजी हैं, वही जानकीजी आज जमीनपर सो रही हैं। विधाता किसको प्रतिकूल नहीं होता! सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी क्या बनके योग्य हैं? लोग सच कहते हैं कि कर्म (भाग्य)ही प्रधान है ॥ ४ ॥

दो०—कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।

जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह॥ ११ ॥

कैकयराजकी लड़की नीचबुद्धि कैकेयीने बड़ी ही कुटिलता की, जिसने रघुनन्दन श्रीरामजीको और जानकीजीको सुखके समय दुःख दिया ॥ ११ ॥

भड़ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥ भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी॥

वह सूर्यकुलरूपी वृक्षके लिये कुल्हाड़ी हो गयी। उस कुबुद्धिने सम्पूर्ण विश्वको दुःखी कर दिया। श्रीराम-सीताको जमीनपर सीते हुए देखकर निषादको बड़ा दुःख हुआ ॥ १२ ॥

बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी॥ काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भाता॥

तब लक्ष्मणजी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके रससे सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले—हे भाई! कोई किसीको सुख-दुःखका देनेवाला नहीं है। सब अपने ही किये हुए कर्मोंका फल भोगते हैं ॥ २० ॥

जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा॥ जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपति बिपति करमु अरु कालू॥

४२०

  • रामचरितमानस *

संयोग (मिलना), वियोग (बिछुड़ना), भले-बुरे भोग, शत्रु, मित्र और उदासीन—ये सभी भ्रमके फंड़े हैं। जन्म-मृत्यु, सम्पत्ति-विपत्ति, कर्म और काल—जहाँतक जगत्के जंजाल हैं; ॥ ३ ॥

धरनि धामु धनु पुर परिवारू । सरगु नरकु जहँ लणि व्यवहारू ॥ देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं । मोह मूल परमारथु नाहीं ॥

धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँतक व्यवहार हैं जो देखने, सुनने और मनके अंदर विचारनेमें आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है। परमार्थतः ये नहीं हैं ॥ ४ ॥

दो०—सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ। जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ ॥ १२ ॥

जैसे स्वप्नमें राजा भिखारी हो जाय या कंगाल स्वर्गका स्वामी इन्द्र हो जाय, तो जागनेपर लाभ या हानि कुछ भी नहीं है; वैसे ही इस दृश्य-प्रपञ्चको हृदयसे देखना चाहिये ॥ १२ ॥

अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू । काहुहि बादि न देइअ दोसू ॥ मोह निसाँ सबु सोवनिहारा । देखिअ सपन अनेक प्रकारा ॥

ऐसा विचारकर क्रोध नहीं करना चाहिये और न किसीको व्यर्थ दोष ही देना चाहिये। सब लोग मोहरूपी रात्रिमें सोनेवाले हैं और सोते हुए उन्हें अनेकों प्रकारके स्वप्न दिखायी देते हैं ॥ १ ॥

एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी । परमारथी प्रपंच बियोगी ॥ जानिअ तबहिं जीव जग जागा । जब सब बिषय बिलास बिरागा ॥

इस जगत्रूपी रात्रिमें योगीलोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपञ्च (मायिक जगत्) से छूटे हुए हैं। जगत्में जीवको जागा हुआ तभी जानना चाहिये जब सम्पूर्ण भोग-विलासोंसे वैराग्य हो जाय ॥ २ ॥

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथ चरन अनुरागा ॥ सखा परम परमारथु एहू । मन क्रम बचन राम पद नेहू ॥

विवेक होनेपर मोहरूपी भ्रम भाग जाता है, तब (अज्ञानका नाश होनेपर) श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होता है। हे सखा! मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है ॥ ३ ॥

राम ब्रह्म परमारथ रूप। अविगत अलख अनादि अनूपा ॥ सकल विकार रहित गतभेदा । कहि नित नेति निरूपहिं वेदा ॥

श्रीरामजी परमार्थस्वरूप (परमवस्तु) परब्रह्म हैं। वे अविगत (जाननेमें न आनेवाले), अलख (स्थूल दृष्टिसे देखनेमें न आनेवाले), अनादि (आदिरहित), अनुपम (उपमारहित), सब विकारोंसे रहित और भेदशून्य हैं, वेद जिनका नित्य 'नेति-नेति' कहकर निरूपण करते हैं ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४२१

दो०—भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल । करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल ॥ १३ ॥

वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ और देवताओंके हितके लिये मनुष्यशरीर धारण करके लीलाएँ करते हैं, जिनके सुननेसे जगत्के जंजाल मिट जाते हैं ॥ १३ ॥

मासपारायण, पंद्रहवाँ विश्राम

सखा समुद्धि अस परिहरि मोहू । सिय रघुबीर चरन रत होहू ॥ कहत राम गुन भा भिनुसारा । जागे जग मंगल सुखदारा ॥

हे सखा! ऐसा समझ, मोहको त्यागकर श्रीसीतारामजीके चरणोंमें प्रेम करो। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके गुण कहते-कहते सबेरा हो गया! तब जगत्का मङ्गल करनेवाले और उसे सुख देनेवाले श्रीरामजी जागे ॥ १ ॥

सकल सौच करि राम नहावा । सुचि सुजान बट छीर मगावा ॥ अनुज सहित सिर जटा बनाए । देखि सुमंत्र नयन जल छाए ॥

शौचके सब कार्य करके [नित्य] पवित्र और सुजान श्रीरामचन्द्रजीने स्नान किया। फिर बड़का दूध मँगाया और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित उस दूधसे सिरपर जटाएँ बनायीं। यह देखकर सुमन्त्रजीके नेत्रोंमें जल छा गया ॥ २ ॥

हृदयँ दाहु अति बदन मलीना । कह कर जोरि बचन अति दीना ॥ नाथ कहेउ अस कोसलनाथा । लै रथु जाहु राम कें साथा ॥

उनका हृदय अत्यन्त जलने लगा, मुँह मलिन (उदास) हो गया। वे हाथ जोड़कर अत्यन्त दीन वचन बोले—हे नाथ! मुझे कोसलनाथ दशरथजीने ऐसी आज्ञा दी थी कि तुम रथ लेकर श्रीरामजीके साथ जाओ; ॥ ३ ॥

बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई । आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई ॥ लखनु रामु सिय आनेहु फेरी । संसय सकल सँकोच निबेरी ॥

वन दिखाकर, गङ्गास्नान करकर दोनों भाइयोंको तुरंत लौटा लाना। सब संशय और संकोचको दूर करके लक्ष्मण, राम, सीताको फिरा लाना ॥ ४ ॥

दो०—नूप अस कहेउ गोसाईं जस कहइ करौं बलि सोइ । करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ ॥ १४ ॥

महाराजने ऐसा कहा था, अब प्रभु जैसा कहें, मैं वही करूँ; मैं आपकी बलिहारी हूँ। इस प्रकार विनती करके वे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें गिर पड़े और उन्होंने बालककी तरह रो दिया ॥ १४ ॥

४२२

  • रामचरितमानस *

तात कृपा करि कीजिअ सोई । जातें अवध अनाथ न होई ॥ मंत्रिहि राम उठाइ प्रबोध। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा ॥

[और कहा—] हे तात! कृपा करके वही कीजिये जिससे अयोध्या अनाथ न हो। श्रीरामजीने मन्त्रीको उठाकर धैर्य बँधाते हुए समझाया कि हे तात! आपने तो धर्मके सभी सिद्धान्तोंको छान डाला है ॥ १ ॥

सिबि दधीच हरिचंद नरेसा । सहे धरम हित कोटि कलेसा ॥ रंतिदेव बलि भूप सुजाना । धरमु धरेउ सहि संकट नाना ॥

शिवि, दधीचि और राजा हरिश्रद्दने धर्मके लिये करोड़ों (अनेकों) कष्ट सहे थे। बुद्धिमान् राजा रंतिदेव और बलि बहुत-से संकट सहकर भी धर्मको पकड़े रहे (उन्होंने धर्मका परित्याग नहीं किया) ॥ २ ॥

धरमु न दूसर सत्य समाना । आगम निगम पुरान बखाना ॥ मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा । तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा ॥

वेद, शास्त्र और पुराणोंमें कहा गया है कि सत्यके समान दूसरा धर्म नहीं है। मैंने उस धर्मको सहज ही पा लिया है। इस [सत्यरूपी धर्म] का त्याग करनेसे तीनों लोकोंमें अपयश छा जायगा ॥ ३ ॥

संभावित कहूँ अपजस लाहू । मरन कोटि सम दारुन दाहू ॥ तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ । दिऐँ उत्तरु फिरि पातकु लहऊँ ॥

प्रतिष्ठित पुरुषके लिये अपयशकी प्राप्ति करोड़ों मृत्युके समान भीषण सन्ताप देनेवाली है। हे तात! मैं आपसे अधिक क्या कहूँ! लौटकर उत्तर देनेमें भी पापका भागी होता हूँ ॥ ४ ॥

दो०—पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।

चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि ॥ १५ ॥

आप जाकर पिताजीके चरण पकड़कर करोड़ों नमस्कारके साथ ही हाथ जोड़कर विनती करियेगा कि हे तात! आप मेरी किसी बातकी चिन्ता न करें ॥ १५ ॥

तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें । बिनती करउँ तात कर जोरें ॥ सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें । दुख न पाव पितु सोच हमारें ॥

आप भी पिताके समान ही मेरे बड़े हितैषी हैं। हे तात! मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूँ कि आपका भी सब प्रकारसे वही कर्तव्य है जिसमें पिताजी हमलोगोंके सोचमें दुःख न पावें ॥ १ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४२३

सुनि रघुनाथ सचिव संबादू । भयउ सपरिजन बिकल निषादू ॥ पुनि कछु लखन कही कटु बानी । प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी ॥

श्रीरघुनाथजी और सुमन्त्रका यह संवाद सुनकर निषादराज कुटुम्बियोंसहित व्याकुल हो गया। फिर लक्ष्मणजीने कुछ कड़वी बात कही। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने उसे बहुत ही अनुचित जानकर उनको मना किया ॥ २ ॥

सकुचि राम निज सपथ देवाई । लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई ॥ कह सुमंत्र पुनि भूप सँदेसू । सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू ॥

श्रीरामचन्द्रजीने सकुचाकर, अपनी सौगंध दिलाकर सुमन्त्रजीसे कहा कि आप जाकर लक्ष्मणका यह सन्देश न कहियेगा। सुमन्त्रने फिर राजाका सन्देश कहा कि सीता वनके क्लेश न सह सकेंगी ॥ ३ ॥

जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया । सोइ रघुबरहि तुम्हि करनीया ॥ नतरु निपट अवलंब बिहीना । मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना ॥

अतएव जिस तरह सीता अयोध्याको लौट आवें, तुमको और श्रीरामचन्द्रजीको वही उपाय करना चाहिये। नहीं तो मैं बिलकुल ही बिना सहारेका होकर वैसे ही नहीं जीऊँगा जैसे बिना जलके मछली नहीं जीती ॥ ४ ॥

दो०—मड़कें ससुरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान । तहाँ तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान ॥ १६ ॥

सीताके मायके (पिताके घर) और ससुरालमें सब सुख हैं। जबतक यह विपत्ति दूर नहीं होती, तबतक वे जब जहाँ जी चाहे, वहीं सुखसे रहेंगी ॥ १६ ॥

बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती । आरति प्रीति न सो कहि जाती ॥ पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना । सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना ॥

राजाने जिस तरह (जिस दीनता और प्रेमसे) बिनती की है, वह दीनता और प्रेम कहा नहीं जा सकता। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने पिताका सन्देश सुनकर सीताजीको करोड़ों (अनेकों) प्रकारसे सीख दी ॥ १ ॥

सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू । फिरहु त सब कर मिटै खभारू ॥ सुनि पति बचन कहति बैदेही । सुनुहु प्रानपति परम सनेही ॥

[उन्होंने कहा—] जो तुम घर लौट जाओ, तो सास, ससुर, गुरु, प्रियजन एवं कुटुम्बी सबकी चिन्ता मिट जाय। पतिके वचन सुनकर जानकीजी कहती हैं—हे प्राणपति! हे परम स्नेही! सुनिये ॥ २ ॥

४२४

  • रामचरितमानस *

प्रभु करुणामय परम बिबेकी । तनु तजि रहति छाँह किमि छेँकी ॥ प्रभा जाइ कहैं भानु बिहाई । कहैं चंद्रिका चंदु तजि जाई ॥

हे प्रभो! आप करुणामय और परम ज्ञानी हैं। [कृपा करके विचार तो कीजिये] शरीरको छोड़कर छाया अलग कैसे रोकी रह सकती है? सूर्यकी प्रभा सूर्यको छोड़कर कहाँ जा सकती है? और चाँदनी चन्द्रमाको त्यागकर कहाँ जा सकती है? ॥ ३ ॥

पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई । कहति सचिव सन गिरा सुहाई ॥ तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी । उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी ॥

इस प्रकार पतिको प्रेममयी विनती सुनाकर सीताजी मन्त्रीसे सुहावनी वाणी कहने लगीं—आप मेरे पिताजी और ससुरजीके समान मेरा हित करनेवाले हैं। आपको मैं बदलेमें उत्तर देती हूँ, यह बहुत ही अनुचित है ॥ ४ ॥

दो०—आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात ।

आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात ॥ १७ ॥

किन्तु हे तात! मैं आर्त होकर ही आपके सम्मुख हुई हूँ, आप बुरा न मानियेगा। आर्यपुत्र (स्वामी) के चरणकमलोंके बिना जगत्में जहाँतक नाते हैं सभी मेरे लिये व्यर्थ हैं ॥ १७ ॥

पितु बैभव बिलास मैं डीठा । नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा ॥ सुखनिधान अस पितु गृह मोरें । पिय बिहीन मन भाव न भोरें ॥

मैंने पिताजीके ऐश्वर्यकी छटा देखी है, जिनके चरण रखनेकी चौकीसे सर्वशिरोमणि राजाओंके मुकुट मिलते हैं (अर्थात् बड़े-बड़े राजा जिनके चरणोंमें प्रणाम करते हैं) ऐसे पिताका घर भी, जो सब प्रकारके सुखोंका भण्डार है, पतिके बिना मेरे मनको भूलकर भी नहीं भाता ॥ १ ॥

ससुर चक्कवइ कोसलराऊ । भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥ आगें होइ जेहि सुरपति लेई । अरध सिंघासन आसनु देई ॥

मेरे ससुर कोसलराज चक्रवर्ती सम्राट् हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें प्रकट है; इन्द्र भी आगे होकर जिनका स्वागत करता है और अपने आधे सिंहासनपर बैठनेके लिये स्थान देता है, ॥ २ ॥

ससुर एतादूस अवध निवासू । प्रिय परिवारु मातु सम सासू ॥ बिनु रघुपति पद पदुम परागा । मोहि केउ सपनेहूँ सुखद न लागा ॥

ऐसे [ऐश्वर्य और प्रभावशाली] ससुर; [उनकी राजधानी] अयोध्याका निवास; प्रिय कुटुम्बी और माताके समान सासुएँ—ये कोई भी श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंकी रजके बिना मुझे स्वप्नमें भी सुखदायक नहीं लगते ॥ ३ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४२५

अगम पंथ बनभूमि पहरा। करि केहरि सर सरित अपारा॥ कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा॥

दुर्गम रास्ते, जंगली धरती, पहाड़, हाथी, सिंह, अथाह तालाब एवं नदियाँ; कोल, भील, हिरन और पक्षी—प्राणपति (रघुनाथजी) के साथ रहते ये सभी मुझे सुख देनेवाले होंगे॥ ४॥

दो०—सासु ससुर सन मोरि हूँति बिनय करबि परि पार्यै।

मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभार्यै॥ ९८॥

अतः सास और ससुरके पाँव पड़कर, मेरी ओरसे विनती कीजियेगा कि वे मेरा कुछ भी सोच न करें; मैं वनमें स्वभावसे ही सुखी हूँ॥ ९८॥

प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा॥

नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें॥

वीरोंमें अग्रगण्य तथा धनुष और [बाणोंसे भरे] तरकश धारण किये मेरे प्राणनाथ और प्यारे देवर साथ हैं। इससे मुझे न रास्तेकी थकावट है, न भ्रम है, और न मेरे मनमें कोई दुःख ही है। आप मेरे लिये भूलकर भी सोच न करें॥ १॥

सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी॥

नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना॥

सुमन्त्र सीताजीकी शीतल वाणी सुनकर ऐसे व्याकुल हो गये, जैसे साँप मणि खो जानेपर। नेत्रोंसे कुछ सूझता नहीं, कानोंसे सुनायी नहीं देता। वे बहुत व्याकुल हो गये, कुछ कह नहीं सकते॥ २॥

राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। तदपि होति नहिं सीतलि छाती॥

जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उत्तर रघुनंदन दीन्हे॥

श्रीरामचन्द्रजीने उनका बहुत प्रकारसे समाधान किया। तो भी उनकी छाती ठंडी न हुई। साथ चलनेके लिये मन्त्रीने अनेकों यत्न किये (युक्तियाँ पेश कीं), पर रघुनन्दन श्रीरामजी [उन सब युक्तियोंका] यथोचित उत्तर देते गये॥ ३॥

मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करमगति कछु न बसाई॥

राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाई॥

श्रीरामजीकी आज्ञा मेटी नहीं जा सकती। कर्मकी गति कठिन है, उसपर कुछ भी वश नहीं चलता। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीके चरणोंमें सिर नवाकर सुमन्त्र इस तरह लौटे जैसे कोई व्यापारी अपना मूलधन (पूँजी) गँवाकर लौटे॥ ४॥

दो०—रथु हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं।

देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं॥ ९९॥

४२६

  • रामचरितमानस *

सुमन्त्रने रथको हाँका, घोड़े श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख-देखकर हिनहिनाते हैं। यह देखकर निषादलोग विषादके वश होकर सिर धुन-धुनकर (पीट-पीटकर) पछताते हैं ॥ १९ ॥

जासु बियोग बिकल पसु ऐसें । प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें ॥ बरबस राम सुमंत्रु पठाए । सुरसरि तीर आपु तब आए ॥

जिनके वियोगमें पशु इस प्रकार व्याकुल हैं, उनके वियोगमें प्रजा, माता और पिता कैसे जीते रहेंगे? श्रीरामचन्द्रजीने जबर्दस्ती सुमन्त्रको लौटाया। तब आप गङ्गाजीके तीरपर आये ॥ १ ॥

मागी नाव न केवटु आना । कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना ॥ चरन कमल रज कहँ सबु कहई । मानुष करनि मूरि कछु अहई ॥

श्रीरामने केवटसे नाव माँगी, पर वह लाता नहीं। वह कहने लगा—मैंने तुम्हारा मर्म (भेद) जान लिया। तुम्हारे चरणकमलोंकी धूलके लिये सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देनेवाली कोई जड़ी है, ॥ २ ॥

छुअत सिला भइ नारि सुहाई । पाहन तें न काठ कठिनाई ॥ तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई । बाट परइ मोरि नाव उड़ाई ॥

जिसके छूते ही पत्थरकी शिला सुन्दरी स्त्री हो गयी [मेरी नाव तो काठकी है]। काठ पत्थरसे कठोर तो होता नहीं। मेरी नाव भी मुनिकी स्त्री हो जायगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जायगी, मैं लुट जाऊँगा [अथवा रास्ता रुक जायगा जिससे आप पार न हो सकेंगे और मेरी रोजी मारी जायगी] (मेरी कमाने-खानेकी राह ही मारी जायगी) ॥ ३ ॥

एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू । नहिं जानउँ कछु अउर कबारू ॥ जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू । मोहि पद पदुम पखारन कहहू ॥

मैं तो इसी नावसे सारे परिवारका पालन-पोषण करता हूँ। दूसरा कोई धंधा नहीं जानता। हे प्रभु! यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरण-कमल पखारने (धो लेने) के लिये कह दो ॥ ४ ॥

छं०—पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं । मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं ॥ बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं । तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४२७

हे नाथ! मैं चरणकमल धोकर आपलोगोंको नावपर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे कुछ उतराई नहीं चाहता। हे राम! मुझे आपकी दुहाई और दशरथजीकी सौगंध है, मैं सब सच-सच कहता हूँ। लक्ष्मण भले ही मुझे तीर मारें, पर जबतक मैं पैरोंको पखार न लूँगा, तबतक हे तुलसीदासके नाथ! हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूँगा।

सो०— सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे। बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन ॥ १०० ॥

केवटके प्रेममें लपेटे हुए अटपटे वचन सुनकर करुणाधाम श्रीरामचन्द्रजी जानकीजी और लक्ष्मणजीकी ओर देखकर हँसे ॥ १०० ॥

कृपासिंधु बोले मुसुकाई । सोड़ करु जेहिं तव नाव न जाई ॥ बेगि आनु जल पाय पखास् । होत बिलंबु उतारहि पारु ॥

कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी केवटसे मुसकराकर बोले—भाई! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाय। जल्दी पानी ला और पैर धो ले। देर हो रही है, पार उतार दे ॥ १ ॥

जासु नाम सुमिरत एक बारा । उतरहिं नर भवसिंधु अपारा ॥ सोड़ कृपालु केवटहि निहोरा । जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा ॥

एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागरके पार उतर जाते हैं, और जिन्होंने [वामनावतारमें] जगत्को तीन पगसे भी छोटा कर दिया था (दो ही पगमें त्रिलोकीको नाप लिया था), वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी [गङ्गाजीसे पार उतारनेके लिये] केवटका निहोरा कर रहे हैं! ॥ २ ॥

पद नख निरखि देवसरि हरषी । सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी ॥ केवट राम रजायसु पावा । पानि कठवता भरि लेइ आवा ॥

प्रभुके इन वचनोंको सुनकर गङ्गाजीकी बुद्धि मोहसे खिंच गयी थी [कि ये साक्षात् भगवान् होकर भी पार उतारनेके लिये केवटका निहोरा कैसे कर रहे हैं]। परन्तु [समीप आनेपर अपनी उत्पत्तिके स्थान] पदनखोंको देखते ही [उन्हें पहचानकर] देवनदी गङ्गाजी हर्षित हो गयीं। (वे समझ गयीं कि भगवान् नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया; और इन चरणोंका स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होऊँगी, यह विचारकर वे हर्षित हो गयीं।) केवट श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर कठौतेमें भरकर जल ले आया ॥ ३ ॥

अति आनंद उमगि अनुरागा । चरन सरोज पखारन लागा ॥ बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं । एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं ॥

४२८

  • रामचरितमानस *

अत्यन्त आनन्द और प्रेममें उमँगकर वह भगवान्के चरणकमल धोने लगा। सब देवता फूल बरसाकर सिहाने लगे कि इसके समान पुण्यकी राशि कोई नहीं है ॥४॥

दो०—पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।

पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार ॥ १०१ ॥

चरणोंको धोकर और सारे परिवारसहित स्वयं उस जल (चरणोदक) को पीकर पहले [उस महान् पुण्यके द्वारा] अपने पितरोंको भवसागरसे पारकर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्रीरामचन्द्रको गङ्गाजीके पार ले गया ॥१०१॥

उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता। सीय रामु गुह लखन समेता ॥ केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा ॥

निषादराज और लक्ष्मणजीसहित श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी [नावसे] उतरकर गङ्गाजीकी रेत (बालू)में खड़े हो गये। तब केवटने उतरकर दण्डवत् की। [उसको दण्डवत् करते देखकर] प्रभुको संकोच हुआ कि इसको कुछ दिया नहीं ॥१॥

पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी ॥ कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई ॥

पतिके हृदयकी जाननेवाली सीताजीने आनन्दभरे मनसे अपनी रत्नजटित अँगूठी [अँगुलीसे] उतारी। कृपालु श्रीरामचन्द्रजीने केवटसे कहा, नावकी उतराई लो। केवटने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिये ॥२॥

नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा ॥ बहुत काल मैं कीन्हि मजुरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी ॥

[उसने कहा—] हे नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रताकी आग आज बुझ गयी है। मैंने बहुत समयतक मजदूरी की। विधाताने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी ॥३॥

अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें ॥ फिरती बार मोहि जो देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा ॥

हे नाथ! हे दीनदयाल! आपकी कृपासे अब मुझे कुछ नहीं चाहिये। लौटती बार आप मुझे जो कुछ देंगे, वह प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा ॥४॥

दो०—बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।

बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ ॥ १०२ ॥

प्रभु श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीने बहुत आग्रह [या यत्न] किया, पर केवट कुछ नहीं लेता। तब करुणाके धाम भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने निर्मल भक्तिका वरदान देकर उसे विदा किया ॥१०२॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४२९

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा । पूजि पारथिव नायउ माथा ॥ सियै सुरसरिहि कहेउ कर जोरी । मातु मनोरथ पुरउबि मोरी ॥

फिर रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने स्नान करके पार्थिवपूजा की और शिवजीको सिर नवाया। सीताजीने हाथ जोड़कर गङ्गाजीसे कहा—हे माता! मेरा मनोरथ पूरा कीजियेगा ॥ १ ॥

पति देवर सँग कुसल बहोरी । आइ करौं जेहिं पूजा तोरी ॥ सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी । भइ तब बिमल बारि बर बानी ॥

जिससे मैं पति और देवरके साथ कुशलपूर्वक लौट आकर तुम्हारी पूजा करूँ। सीताजीकी प्रेमरसमें सनी हुई विनती सुनकर तब गङ्गाजीके निर्मल जलमेंसे श्रेष्ठ वाणी हुई— ॥ २ ॥

सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही । तव प्रभाउ जग बिदित न केही ॥ लोकप होहिं बिलोकत तोरें । तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें ॥

हे रघुवीरकी प्रियतमा जानकी! सुनो, तुम्हारा प्रभाव जगत्में किसे नहीं मालूम है? तुम्हारे [कृपादृष्टिसे] देखते ही लोग लोकपाल हो जाते हैं। सब सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं ॥ ३ ॥

तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई । कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई ॥ तदपि देबि मैं देबि असीसा । सफल होन हित निज बागीसा ॥

तुमने जो मुझको बड़ी विनती सुनायी, यह तो मुझपर कृपा की और मुझे बड़ाई दी है। तो भी हे देवि! मैं अपनी वाणी सफल होनेके लिये तुम्हें आशीर्वाद दूँगी ॥ ४ ॥

दो०—प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।

पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ ॥ १०३ ॥

तुम अपने प्राणनाथ और देवरसहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटोगी। तुम्हारी सारी मनःकामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुन्दर यश जगत्भरमें छा जायगा ॥ १०३ ॥

गंग बचन सुनि मंगल मूला । मुदित सीय सुरसरि अनुकूला ॥ तब प्रभु गृहहि कहेउ घर जाहू । सुनत सूख मुखु भा उर दाहू ॥

मङ्गलके मूल गङ्गाजीके वचन सुनकर और देवनदीको अनुकूल देखकर सीताजी आनन्दित हुई। तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने निषादराज गृहसे कहा कि भैया! अब तुम घर जाओ। यह सुनते ही उसका मुँह सूख गया और हृदयमें दाह उत्पन्न हो गया ॥ १ ॥

दीन बचन गृह कह कर जोरी । बिनय सुनुहु रघुकुलमनि मोरी ॥ नाथ साथ रहि पंथु देखाई । करि दिन चारि चरन सेवकाई ॥

४३०

  • रामचरितमानस *

गुह हाथ जोड़कर दीन वचन बोला—हे रघुकुलशिरोमणि! मेरी विनती सुनिये। मैं नाथ (आप)के साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, चार (कुछ)दिन चरणोंकी सेवा करके— ॥ २ ॥

जेहिं बन जाइ रहब रघुराई । परनकुटी मैं करबि सुहाई ॥ तब मोहि कहैं जसि देब रजाई । सोड़ करहिउँ रघुबीर दोहाई ॥

हे रघुराज! जिस वनमें आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुन्दर पर्णकुटी (पत्तोंकी कुटिया) बना दूँगा। तब मुझे आप जैसी आज्ञा देंगे, मुझे रघुवीर (आप) की दुहाई है, मैं वैसा ही करूँगा ॥ ३ ॥

सहज सनेह राम लखि तासू । संग लीन्ह गुह हृदयँ हुलासू ॥ पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे । करि परितोषु बिदा तब कीन्हे ॥

उसके स्वाभाविक प्रेमको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने उसको साथ ले लिया, इससे गुहके हृदयमें बड़ा आनन्द हुआ। फिर गुह (निषादराज) ने अपनी जातिके लोगोंको बुला लिया और उनका संतोष कराके तब उनको विदा किया ॥ ४ ॥

दो०— तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ ।

सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ ॥ १०४ ॥

तब प्रभु श्रीरघुनाथजी गणेशजी और शिवजीका स्मरण करके तथा गङ्गाजीको मस्तक नवाकर सखा निषादराज, छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित वनको चले ॥ १०४ ॥

तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू । लखन सरखों सब कीन्ह सुपासू ॥ प्रात प्रातकृत करि रघुराई । तीरथराजु दीख प्रभु जाई ॥

उस दिन पेड़के नीचे निवास हुआ। लक्ष्मणजी और सखा गुहने [विश्रामकी] सब सुव्यवस्था कर दी। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने सबेर प्रातःकालकी सब क्रियाएँ करके जाकर तीर्थोंके राजा प्रयागके दर्शन किये ॥ १ ॥

सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी । माधव सरिस मीतु हितकारी ॥ चारि पदारथ भरा भँडारू । पुन्य प्रदेस देस अति चारू ॥

उस राजाका सत्य मन्त्री है, श्रद्धा प्यारी स्त्री है और श्रीवेणीमाधवजी-सरीखे हितकारी मित्र हैं। चार पदार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) से भण्डार भरा है और वह पुण्यमय प्रान्त ही उस राजाका सुन्दर देश है ॥ २ ॥

छेत्रु अगम गढु गाढ़ सुहावा । सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा ॥ सेन सकल तीरथ बर बीरा । कलुष अनीक दलन रनधीरा ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४३१

प्रयाग क्षेत्र ही दुर्गम, मजबूत और सुन्दर गढ़ (किला) है, जिसको स्वप्नमें भी [पापरूपी] शत्रु नहीं पा सके हैं। सम्पूर्ण तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक हैं, जो पापकी सेनाको कुचल डालनेवाले और बड़े रणधीर हैं ॥ ३ ॥

संगमु सिंहसनु सुठि सोहा । छत्रु अख्यवटु मुनि मनु मोहा ॥ चवैर जमुन अरु गंग तरंगा । देखि होहिं दुख दारिद भंगा ॥

[गङ्गा, यमुना और सरस्वतीका] सङ्गम ही उसका अत्यन्त सुशोभित सिंहसन है। अक्षयवट छत्र है, जो मुनियोंके भी मनको मोहित कर लेता है। यमुनाजी और गङ्गाजीकी तरंगें उसके [श्याम और श्वेत] चवैर हैं, जिनको देखकर ही दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाती है ॥ ४ ॥

दो०— सेवहिं सुकृती साधु सुचि पावहिं सब मनकाम ।

बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम ॥ १०५ ॥

पुण्यात्मा, पवित्र साधु उसकी सेवा करते हैं और सब मनोरथ पाते हैं। वेद और पुराणोंके समूह भाट हैं, जो उसके निर्मल गुणगणोंका बखान करते हैं ॥ १०५ ॥

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ । कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ ॥ अस तीरथपति देखि सुहावा । सुख सागर रघुबर सुखु पावा ॥

पापोंके समूहरूपी हाथीके मारनेके लिये सिंहरूप प्रयागराजका प्रभाव (महत्त्व—माहात्म्य) कौन कह सकता है। ऐसे सुहावने तीर्थराजका दर्शन कर सुखके समुद्र रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजीने भी सुख पाया ॥ १ ॥

कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई । श्रीमुख तीरथराज बड़ाई ॥ करि प्रनामु देखत बन बागा । कहत महातम अति अनुरागा ॥

उन्होंने अपने श्रीमुखसे सीताजी, लक्ष्मणजी और सखा गुहको तीर्थराजकी महिमा कहकर सुनायी। तदनन्तर प्रणाम करके, वन और बगीचोंको देखते हुए और बड़े प्रेमसे माहात्म्य कहते हुए— ॥ २ ॥

एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी । सुमिरत सकल सुमंगल देनी ॥ मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा । पूजि जथाबिधि तीरथ देवा ॥

इस प्रकार श्रीरामने आकर त्रिवेणीका दर्शन किया, जो स्मरण करनेसे ही सब सुन्दर मङ्गलोंको देनेवाली है। फिर आनन्दपूर्वक [त्रिवेणीमें] स्नान करके शिवजीकी सेवा (पूजा) की और विधिपूर्वक तीर्थदेवताओंका पूजन किया ॥ ३ ॥

तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए । करत दंडवत मुनि उर लाए ॥ मुनि मन मोद न कछु कहि जाई । ब्रह्मानंद रासि जनु पाई ॥

४३२

  • रामचरितमानस *

[स्नान, पूजन आदि सब करके] तब प्रभु श्रीरामजी भरद्वाजजीके पास आये। उन्हें दण्डवत् करते हुए ही मुनिने हृदयसे लगा लिया। मुनिके मनका आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो उन्हें ब्रह्मानन्दकी राशि मिल गयी हो ॥ ४ ॥

दो०— दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।

लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि ॥ १०६ ॥

मुनीश्वर भरद्वाजजीने आशीर्वाद दिया। उनके हृदयमें ऐसा जानकर अत्यन्त आनन्द हुआ कि आज विधाताने [श्रीसीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन कराकर] मानो हमारे सम्पूर्ण पुण्योंके फलको लाकर आँखोंके सामने कर दिया ॥ १०६ ॥

कुसल प्रस्त्र करि आसन दीन्है । पूजि प्रेम परिपूरन कीन्है ॥ कंद मूल फल अंकुर नीके । दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के ॥

कुशल पूछकर मुनिराजने उनको आसन दिये और प्रेमसहित पूजन करके उन्हें सन्तुष्ट कर दिया। फिर मानो अमृतके ही बने हों, ऐसे अच्छे-अच्छे कन्द, मूल, फल और अंकुर लाकर दिये ॥ १ ॥

सीय लखन जन सहित सुहाए । अति रुचि राम मूल फल खाए ॥ भए बिगतश्रम रामु सुखारे । भरद्वाज मृदु बचन उचारे ॥

सीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुहसहित श्रीरामचन्द्रजीने उन सुन्दर मूल-फलोंको बड़ी रुचिके साथ खाया। थकावट दूर होनेसे श्रीरामचन्द्रजी सुखी हो गये। तब भरद्वाजजीने उनसे कोमल वचन कहें— ॥ २ ॥

आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू । आजु सुफल जप जोग बिरागू ॥ सफल सकल सुभ साधन साजू । राम तुम्हहि अवलोकत आजू ॥

हे राम! आपका दर्शन करते ही आज मेरा तप, तीर्थसेवन और त्याग सफल हो गया। आज मेरा जप, योग और वैराग्य सफल हो गया और आज मेरे सम्पूर्ण शुभ साधनोंका समुदाय भी सफल हो गया ॥ ३ ॥

लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी । तुम्हरेँ दरस आस सब पूजी ॥ अब करि कृपा देहु बर एहुँ । निज पद सरसिज सहज सनेहुँ ॥

लाभकी सीमा और सुखकी सीमा [प्रभुके दर्शनको छोड़कर] दूसरी कुछ भी नहीं है। आपके दर्शनसे मेरी सब आशाएँ पूर्ण हो गयीं। अब कृपा करके यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें मेरा स्वाभाविक प्रेम हो ॥ ४ ॥

दो०— करम बचन मन छड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।

तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किऐँ कोटि उपचार ॥ १०७ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४३३

जबतक कर्म, वचन और मनसे छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तबतक करोड़ों उपाय करनेसे भी, स्वप्नमें भी वह सुख नहीं पाता ॥ १०७ ॥

मुनि मुनि बचन रामु सकुचाने । भाव भगति आनंद अघाने ॥ तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा । कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा ॥

मुनिके वचन सुनकर, उनकी भाव-भक्तिके कारण आनन्दसे तृप्त हुए भगवान् श्रीरामचन्द्रजी [लीलाकी दृष्टिसे] सकुचा गये। तब [अपने ऐश्वर्यको छिपाते हुए] श्रीरामचन्द्रजीने भरद्वाज मुनिका सुन्दर सुयश करोड़ों (अनेकों) प्रकारसे कहकर सबको सुनाया ॥ १ ॥

सो बड़ सो सब गुन गन गेहू । जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू ॥ मुनि रघुबीर परसपर नवहीं । बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं ॥

[उन्होंने कहा—] हे मुनीश्वर! जिसको आप आदर दें, वही बड़ा है और वही सब गुणसमूहोंका घर है। इस प्रकार श्रीरामजी और मुनि भरद्वाजजी दोनों परस्पर विनम्र हो रहे हैं और अनिर्वचनीय सुखका अनुभव कर रहे हैं ॥ २ ॥

यह सुधि पाड़ प्रयाग निवासी । बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी ॥ भरद्वाज आश्रम सब आए । देखन दसरथ सुअन सुहाए ॥

यह (श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीके आनेकी) खबर पाकर प्रयागनिवासी ब्रह्मचारी, तपस्वी, मुनि, सिद्ध और उदासी सब श्रीदशरथजीके सुन्दर पुत्रोंको देखनेके लिये भरद्वाजजीके आश्रमपर आये ॥ ३ ॥

राम प्रनाम कीन्ह सब काहू । मुदित भए लहि लोयन लाहू ॥ देहिं असीस परम सुखु पाई । फिरे सराहत सुंदरताई ॥

श्रीरामचन्द्रजीने सब किसीको प्रणाम किया। नेत्रोंका लाभ पाकर सब आनन्दित हो गये और परम सुख पाकर आशीर्वाद देने लगे। श्रीरामजीके सौन्दर्यकी सराहना करते हुए वे लौटे ॥ ४ ॥

दो०—राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ ।

चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ ॥ १०८ ॥

श्रीरामजीने रातको वहीं विश्राम किया और प्रातःकाल प्रयागराजका स्नान करके और प्रसन्नताके साथ मुनिको सिर नवाकर श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुहके साथ वे चले ॥ १०८ ॥

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं । नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं ॥ मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं । सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं ॥

[चलते समय] बड़े प्रेमसे श्रीरामजीने मुनिसे कहा— हे नाथ! बताइये हम किस मार्गसे जायँ। मुनि मनमें हँसकर श्रीरामजीसे कहते हैं कि आपके लिये सभी मार्ग सुगम हैं ॥ १ ॥

४३४

  • रामचरितमानस *

साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए । सुनि मन मुदित पचासक आए ॥ सबन्हि राम पर प्रेम अपारा । सकल कहहिं मगु दीख हमारा ॥

फिर उनके साथके लिये मुनिने शिष्योंको बुलाया। [साथ जानेकी बात] सुनते ही चित्तमें हर्षित हो कोई पचास शिष्य आ गये। सभीका श्रीरामजीपर अपार प्रेम है। सभी कहते हैं कि मार्ग हमारा देखा हुआ है ॥ २ ॥

मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे । जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे ॥ करि प्रनामु रिषि आयसु पाई । प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई ॥

तब मुनिने [चुनकर] चार ब्रह्मचारियोंको साथ कर दिया, जिन्होंने बहुत जन्मोंतक सब सुकृत (पुण्य) किये थे। श्रीरघुनाथजी प्रणाम कर और ऋषिकी आज्ञा पाकर हृदयमें बड़े ही आनन्दित होकर चले ॥ ३ ॥

ग्राम निकट जब निकसहिं जाई । देखहिं दरसु नारि नर धाई ॥ होहिं सनाथ जनम फलु पाई । फिरहिं दुखित मनु संग पठाई ॥

जब वे किसी गाँवके पास होकर निकलते हैं तब स्त्री-पुरुष दौड़कर उनके रूपको देखने लगते हैं। जन्मका फल पाकर वे [सदाके अनाथ] सनाथ हो जाते हैं और मनको नाथके साथ भेजकर [शरीरसे साथ न रहनेके कारण] दुःखी होकर लौट आते हैं ॥ ४ ॥

दो०— बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाड़ मन काम ।

उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम ॥ १०९ ॥

तदनन्तर श्रीरामजीने विनती करके चारों ब्रह्मचारियोंको विदा किया; वे मनचाही वस्तु (अनन्य भक्ति) पाकर लौटे। यमुनाजीके पार उतरकर सबने यमुनाजीके जलमें स्नान किया, जो श्रीरामचन्द्रजीके शरीरके समान ही श्याम रंगका था ॥ १०९ ॥

सुनत तीरबासी नर नारी । धाए निज निज काज बिसारी ॥ लखन राम सिय सुंदरताई । देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई ॥

यमुनाजीके किनारेपर रहनेवाले स्त्री-पुरुष [यह सुनकर कि निषादके साथ दो परम सुन्दर सुकुमार नवयुवक और एक परम सुन्दरी स्त्री आ रही है] सब अपना-अपना काम भूलकर दौड़े और लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजीका सौन्दर्य देखकर अपने भाग्यकी बड़ाई करने लगे ॥ १ ॥

अति लालसा बसहिं मन माहीं । नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं ॥ जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने । तिन्ह करि जुगति रामु पहिचाने ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४३५

उनके मनमें [परिचय जाननेकी] बहुत-सी लालसाएँ भरी हैं। पर वे नाम-गाँव पूछते सकुचाते हैं। उन लोगोंमें जो वयोवृद्ध और चतुर थे; उन्होंने युक्तिसे श्रीरामचन्द्रजीको पहचान लिया ॥ २ ॥

सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई । बनहि चले पितु आयसु पाई ॥ सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं । रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं ॥

उन्होंने सब कथा सब लोगोंको सुनायी कि पिताकी आज्ञा पाकर ये वनको चले हैं। यह सुनकर सब लोग दुःखित हो पछता रहे हैं कि रानी और राजाने अच्छा नहीं किया ॥ ३ ॥

तेहि अवसर एक तापसु आवा । तेजपुंज लघुबयस सुहावा ॥ कबि अलखित गति बेषु बिरागी । मन क्रम बचन राम अनुरागी ॥

उसी अवसरपर वहाँ एक तपस्वी आया, जो तेजका पुञ्ज, छोटी अवस्थाका और सुन्दर था। उसकी गति कवि नहीं जानते [अथवा वह कवि था जो अपना परिचय नहीं देना चाहता]। वह वैरागीके वेषमें था और मन, वचन तथा कर्मसे श्रीरामचन्द्रजीका प्रेमी था ॥ ४ ॥

[इस तेजःपुञ्ज तापसके प्रसंगको कुछ टीकाकार क्षेपक मानते हैं और कुछ लोगोंके देखनेमें यह अप्रासंगिक और ऊपरसे जोड़ा हुआ-सा जान भी पड़ता है, परन्तु यह सभी प्राचीन प्रतियोंमें है। गुसाईजी अलौकिक अनुभवों पुरुष थे। पता नहीं, यहाँ इस प्रसंगके रखनेमें क्या रहस्य है; परन्तु यह क्षेपक तो नहीं है। इस तापसको जब 'कबि अलखित गति' कहते हैं, तब निश्चयपूर्वक कौन क्या कह सकता है। हमारी समझसे ये तापस या तो श्रीहनुमान्जी थे अथवा ध्यानस्थ तुलसीदासजी!]

दो०— सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि । परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि ॥ ११० ॥

अपने इष्टदेवको पहचानकर उसके नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर पुलकित हो गया। वह दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसकी [प्रेमविह्वल] दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ११० ॥

राम सप्रेम पुलकि उर लावा । परम रंक जनु पारसु पावा ॥ मनहुँ प्रेम परमारथु दोऊ । मिलत धरें तन कह सबु कोऊ ॥

श्रीरामजीने प्रेमपूर्वक पुलकित होकर उसको हृदयसे लगा लिया। [उसे इतना आनन्द हुआ] मानो कोई महादरिद्री मनुष्य पारस पा गया हो। सब कोई [देखनेवाले] कहने लगे कि मानो प्रेम और परमार्थ (परम तत्त्व) दोनों शरीर धारण करके मिल रहे हैं ॥ १ ॥

बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा । लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा ॥ पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा । जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा ॥

४३६

  • रामचरितमानस *

फिर वह लक्ष्मणजीके चरणों लगा। उन्होंने प्रेमसे उमँगकर उसको उठा लिया। फिर उसने सीताजीकी चरणधूलिको अपने सिरपर धारण किया। माता सीताजीने भी उसको अपना छोटा बच्चा जानकर आशीर्वाद दिया ॥ २ ॥

कीन्ह निषाद दंडवत तेही । मिलेउ मुदित लखि राम सनेही ॥ पिअत नयन पुट रूपु पियूषा । मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा ॥

फिर निषादराजने उसको दण्डवत् की। श्रीरामचन्द्रजीका प्रेमी जानकर वह उस (निषाद) से आनन्दित होकर मिला। वह तपस्वी अपने नेत्ररूपी दोनोंसे श्रीरामजीकी सौन्दर्य-सुधाका पान करने लगा और ऐसा आनन्दित हुआ जैसे कोई भूखा आदमी सुन्दर भोजन पाकर आनन्दित होता है ॥ ३ ॥

ते पितु मातु कहहु सखि कैसे । जिन्ह पठए बन बालक ऐसे ॥ राम लखन सिय रूपु निहारी । होहिं सनेह बिकल नर नारी ॥

[इधर गाँवकी स्त्रियाँ कह रही हैं—] हे सखी! कहो तो, वे माता-पिता कैसे हैं जिन्होंने ऐसे (सुन्दर सुकुमार) बालकोंको वनमें भेज दिया है। श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके रूपको देखकर सब स्त्री-पुरुष स्नेहसे व्याकुल हो जाते हैं ॥ ४ ॥

दो०— तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह । राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेई कीन्ह ॥ १११ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने सखा गुहको अनेकों तरहसे [घर लौट जानेके लिये] समझाया। श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसने अपने घरको गमन किया ॥ १११ ॥

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी । जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी ॥ चले ससीय मुदित दोउ भाई । रबितनुजा कड़ करत बड़ाई ॥

फिर सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मणजीने हाथ जोड़कर यमुनाजीको पुनः प्रणाम किया और सूर्यकन्या यमुनाजीकी बड़ाई करते हुए सीताजीसहित दोनों भाई प्रसन्नतापूर्वक आगे चले ॥ १ ॥

पथिक अनेक मिलहिं मग जाता । कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता ॥ राज लखन सब अंग तुम्हारें । देखि सोचु अति हृदय हमारें ॥

रास्तेमें जाते हुए उन्हें अनेकों यात्री मिलते हैं। वे दोनों भाइयोंको देखकर उनसे प्रेमपूर्वक कहते हैं कि तुम्हारे सब अङ्गोंमें राजचिह्न देखकर हमारे हृदयमें बड़ा सोच होता है ॥ २ ॥

मारग चलहु पयादेहि पाएँ । ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ ॥ अगमु पंथु गिरि कानन भारी । तेहि महाँ साथ नारि सुकुमारी ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४३७

[ऐसे राजचिह्नोंके होते हुए भी] तुमलोग रास्तेमें पैदल ही चल रहे हो, इससे हमारी समझमें आता है कि ज्योतिष-शास्त्र झूठा ही है। भारी जंगल और बड़े-बड़े पहाड़ोंका दुर्गम रास्ता है। तिसपर तुम्हारे साथ सुकुमारी स्त्री हैं ॥ ३ ॥

करि केहरि बन जाइ न जोई । हम सँग चलहिं जो आयसु होई ॥ जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई । फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई ॥

हाथी और सिंहोंसे भरा यह भयानक वन देखातक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें। आप जहाँतक जायँगे वहाँतक पहुँचाकर, फिर आपको प्रणाम करके हम लौट आवेंगे ॥ ४ ॥

दो०— एहि बिधि पहुँछिहँ प्रेम बस पुलक गात जलु नैन ।

कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन ॥ ११२ ॥

इस प्रकार वे यात्री प्रेमवश पुलकितशरीर हो और नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भरकर पूछते हैं। किन्तु कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनययुक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं ॥ ११२ ॥

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं । तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं ॥

केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए । धन्य पुन्यमय परम सुहाए ॥

जो गाँव और पुरवे रास्तेमें बसे हैं, नागों और देवताओंके नगर उनको देखकर प्रशंसापूर्वक ईर्ष्या करते और ललचाते हुए कहते हैं कि किस पुण्यवान्ने किस शुभ घड़ीमें इनको बसाया था, जो आज ये इतने धन्य और पुण्यमय तथा परम सुन्दर हो रहे हैं ॥ १ ॥

जहाँ जहाँ राम चरन चलि जाहीं । तिन्ह समान अमरावति नाहीं ॥

पुन्यपुंज मग निकट निवासी । तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी ॥

जहाँ-जहाँ श्रीरामचन्द्रजीके चरण चले जाते हैं, उनके समान इन्द्रकी पुरी अमरावती भी नहीं है। रास्तेके समीप बसनेवाले भी बड़े पुण्यात्मा हैं—स्वर्गमें रहनेवाले देवता भी उनकी सराहना करते हैं— ॥ २ ॥

जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि । सीता लखन सहित घनस्यामहि ॥

जे सर सरित राम अवगाहहिं । तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं ॥

जो नेत्र भरकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित घनश्याम श्रीरामजीके दर्शन करते हैं, जिन तालाबों और नदियोंमें श्रीरामजी स्नान कर लेते हैं, देवसरोवर और देवनदियाँ भी उनकी बड़ाई करती हैं ॥ ३ ॥

जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई । करहिं कलपतरु तासु बड़ाई ॥

परसि राम पद पदुम परागा । मानति भूमि भूरि निज भागा ॥

जिस वृक्षके नीचे प्रभु जा बैठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंकी रजका स्पर्श करके पृथ्वी अपना बड़ा सौभाग्य मानती है ॥ ४ ॥

४३८

  • रामचरितमानस *

दो०— छौहं करहिं घन बिबुधगन बरषहिं सुमन सिहाहिं। देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं ॥ ११३ ॥

रास्तेमें बादल छाया करते हैं और देवता फूल बरसाते और सिहाते हैं। पर्वत, वन और पशु-पक्षियोंको देखते हुए श्रीरामजी रास्तेमें चले जा रहे हैं ॥ ११३ ॥

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई ॥ सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृह काजु बिसारी ॥

सीताजी और लक्ष्मणजीसहित श्रीरघुनाथजी जब किसी गाँवके पास जा निकलते हैं तब उनका आना सुनते ही बालक-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सब अपने घर और काम-काजको भूलकर तुरंत उन्हें देखनेके लिये चल देते हैं ॥ १ ॥

राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी ॥ सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा ॥

श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीका रूप देखकर, नेत्रोंका [परम] फल पाकर वे सुखी होते हैं। दोनों भाइयोंको देखकर सब प्रेमानन्दमें मग्न हो गये। उनके नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर पुलकित हो गये ॥ २ ॥

बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी ॥ एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं ॥

उनकी दशा वर्णन नहीं की जाती। मानो दृष्टिोंने चिन्तामणिकी ढेरी पा ली हो। वे एक-एकको पुकारकर सीख देते हैं कि इसी क्षण नेत्रोंका लाभ ले लो ॥ ३ ॥

रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे ॥ एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी ॥

कोई श्रीरामचन्द्रजीको देखकर ऐसे अनुरागमें भर गये हैं कि वे उन्हें देखते हुए उनके साथ लगे चले जा रहे हैं। कोई नेत्रमार्गसे उनकी छविको हृदयमें लाकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणीसे शिथिल हो जाते हैं (अर्थात् उनके शरीर, मन और वाणीका व्यवहार बंद हो जाता है) ॥ ४ ॥

दो०— एक देखि बट छौहं भलि डासि मृदुल तून पात। कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात ॥ ११४ ॥

कोई बड़की सुन्दर छाया देखकर, वहाँ नरम घास और पत्ते बिछाकर कहते हैं कि क्षणभर यहाँ बैठकर थकावट मिटा लीजिये। फिर चाहे अभी चले जाइयेगा, चाहे सबेरे ॥ ११४ ॥