भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 424

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  • रामचरितमानस *

तात कृपा करि कीजिअ सोई । जातें अवध अनाथ न होई ॥ मंत्रिहि राम उठाइ प्रबोध। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा ॥

[और कहा—] हे तात! कृपा करके वही कीजिये जिससे अयोध्या अनाथ न हो। श्रीरामजीने मन्त्रीको उठाकर धैर्य बँधाते हुए समझाया कि हे तात! आपने तो धर्मके सभी सिद्धान्तोंको छान डाला है ॥ १ ॥

सिबि दधीच हरिचंद नरेसा । सहे धरम हित कोटि कलेसा ॥ रंतिदेव बलि भूप सुजाना । धरमु धरेउ सहि संकट नाना ॥

शिवि, दधीचि और राजा हरिश्रद्दने धर्मके लिये करोड़ों (अनेकों) कष्ट सहे थे। बुद्धिमान् राजा रंतिदेव और बलि बहुत-से संकट सहकर भी धर्मको पकड़े रहे (उन्होंने धर्मका परित्याग नहीं किया) ॥ २ ॥

धरमु न दूसर सत्य समाना । आगम निगम पुरान बखाना ॥ मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा । तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा ॥

वेद, शास्त्र और पुराणोंमें कहा गया है कि सत्यके समान दूसरा धर्म नहीं है। मैंने उस धर्मको सहज ही पा लिया है। इस [सत्यरूपी धर्म] का त्याग करनेसे तीनों लोकोंमें अपयश छा जायगा ॥ ३ ॥

संभावित कहूँ अपजस लाहू । मरन कोटि सम दारुन दाहू ॥ तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ । दिऐँ उत्तरु फिरि पातकु लहऊँ ॥

प्रतिष्ठित पुरुषके लिये अपयशकी प्राप्ति करोड़ों मृत्युके समान भीषण सन्ताप देनेवाली है। हे तात! मैं आपसे अधिक क्या कहूँ! लौटकर उत्तर देनेमें भी पापका भागी होता हूँ ॥ ४ ॥

दो०—पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।

चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि ॥ १५ ॥

आप जाकर पिताजीके चरण पकड़कर करोड़ों नमस्कारके साथ ही हाथ जोड़कर विनती करियेगा कि हे तात! आप मेरी किसी बातकी चिन्ता न करें ॥ १५ ॥

तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें । बिनती करउँ तात कर जोरें ॥ सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें । दुख न पाव पितु सोच हमारें ॥

आप भी पिताके समान ही मेरे बड़े हितैषी हैं। हे तात! मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूँ कि आपका भी सब प्रकारसे वही कर्तव्य है जिसमें पिताजी हमलोगोंके सोचमें दुःख न पावें ॥ १ ॥