श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 425, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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सुनि रघुनाथ सचिव संबादू । भयउ सपरिजन बिकल निषादू ॥ पुनि कछु लखन कही कटु बानी । प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी ॥
श्रीरघुनाथजी और सुमन्त्रका यह संवाद सुनकर निषादराज कुटुम्बियोंसहित व्याकुल हो गया। फिर लक्ष्मणजीने कुछ कड़वी बात कही। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने उसे बहुत ही अनुचित जानकर उनको मना किया ॥ २ ॥
सकुचि राम निज सपथ देवाई । लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई ॥ कह सुमंत्र पुनि भूप सँदेसू । सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू ॥
श्रीरामचन्द्रजीने सकुचाकर, अपनी सौगंध दिलाकर सुमन्त्रजीसे कहा कि आप जाकर लक्ष्मणका यह सन्देश न कहियेगा। सुमन्त्रने फिर राजाका सन्देश कहा कि सीता वनके क्लेश न सह सकेंगी ॥ ३ ॥
जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया । सोइ रघुबरहि तुम्हि करनीया ॥ नतरु निपट अवलंब बिहीना । मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना ॥
अतएव जिस तरह सीता अयोध्याको लौट आवें, तुमको और श्रीरामचन्द्रजीको वही उपाय करना चाहिये। नहीं तो मैं बिलकुल ही बिना सहारेका होकर वैसे ही नहीं जीऊँगा जैसे बिना जलके मछली नहीं जीती ॥ ४ ॥
दो०—मड़कें ससुरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान । तहाँ तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान ॥ १६ ॥
सीताके मायके (पिताके घर) और ससुरालमें सब सुख हैं। जबतक यह विपत्ति दूर नहीं होती, तबतक वे जब जहाँ जी चाहे, वहीं सुखसे रहेंगी ॥ १६ ॥
बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती । आरति प्रीति न सो कहि जाती ॥ पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना । सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना ॥
राजाने जिस तरह (जिस दीनता और प्रेमसे) बिनती की है, वह दीनता और प्रेम कहा नहीं जा सकता। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने पिताका सन्देश सुनकर सीताजीको करोड़ों (अनेकों) प्रकारसे सीख दी ॥ १ ॥
सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू । फिरहु त सब कर मिटै खभारू ॥ सुनि पति बचन कहति बैदेही । सुनुहु प्रानपति परम सनेही ॥
[उन्होंने कहा—] जो तुम घर लौट जाओ, तो सास, ससुर, गुरु, प्रियजन एवं कुटुम्बी सबकी चिन्ता मिट जाय। पतिके वचन सुनकर जानकीजी कहती हैं—हे प्राणपति! हे परम स्नेही! सुनिये ॥ २ ॥