श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 426, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
प्रभु करुणामय परम बिबेकी । तनु तजि रहति छाँह किमि छेँकी ॥ प्रभा जाइ कहैं भानु बिहाई । कहैं चंद्रिका चंदु तजि जाई ॥
हे प्रभो! आप करुणामय और परम ज्ञानी हैं। [कृपा करके विचार तो कीजिये] शरीरको छोड़कर छाया अलग कैसे रोकी रह सकती है? सूर्यकी प्रभा सूर्यको छोड़कर कहाँ जा सकती है? और चाँदनी चन्द्रमाको त्यागकर कहाँ जा सकती है? ॥ ३ ॥
पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई । कहति सचिव सन गिरा सुहाई ॥ तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी । उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी ॥
इस प्रकार पतिको प्रेममयी विनती सुनाकर सीताजी मन्त्रीसे सुहावनी वाणी कहने लगीं—आप मेरे पिताजी और ससुरजीके समान मेरा हित करनेवाले हैं। आपको मैं बदलेमें उत्तर देती हूँ, यह बहुत ही अनुचित है ॥ ४ ॥
दो०—आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात ।
आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात ॥ १७ ॥
किन्तु हे तात! मैं आर्त होकर ही आपके सम्मुख हुई हूँ, आप बुरा न मानियेगा। आर्यपुत्र (स्वामी) के चरणकमलोंके बिना जगत्में जहाँतक नाते हैं सभी मेरे लिये व्यर्थ हैं ॥ १७ ॥
पितु बैभव बिलास मैं डीठा । नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा ॥ सुखनिधान अस पितु गृह मोरें । पिय बिहीन मन भाव न भोरें ॥
मैंने पिताजीके ऐश्वर्यकी छटा देखी है, जिनके चरण रखनेकी चौकीसे सर्वशिरोमणि राजाओंके मुकुट मिलते हैं (अर्थात् बड़े-बड़े राजा जिनके चरणोंमें प्रणाम करते हैं) ऐसे पिताका घर भी, जो सब प्रकारके सुखोंका भण्डार है, पतिके बिना मेरे मनको भूलकर भी नहीं भाता ॥ १ ॥
ससुर चक्कवइ कोसलराऊ । भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥ आगें होइ जेहि सुरपति लेई । अरध सिंघासन आसनु देई ॥
मेरे ससुर कोसलराज चक्रवर्ती सम्राट् हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें प्रकट है; इन्द्र भी आगे होकर जिनका स्वागत करता है और अपने आधे सिंहासनपर बैठनेके लिये स्थान देता है, ॥ २ ॥
ससुर एतादूस अवध निवासू । प्रिय परिवारु मातु सम सासू ॥ बिनु रघुपति पद पदुम परागा । मोहि केउ सपनेहूँ सुखद न लागा ॥
ऐसे [ऐश्वर्य और प्रभावशाली] ससुर; [उनकी राजधानी] अयोध्याका निवास; प्रिय कुटुम्बी और माताके समान सासुएँ—ये कोई भी श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंकी रजके बिना मुझे स्वप्नमें भी सुखदायक नहीं लगते ॥ ३ ॥