भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 433
  • अयोध्याकाण्ड *

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प्रयाग क्षेत्र ही दुर्गम, मजबूत और सुन्दर गढ़ (किला) है, जिसको स्वप्नमें भी [पापरूपी] शत्रु नहीं पा सके हैं। सम्पूर्ण तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक हैं, जो पापकी सेनाको कुचल डालनेवाले और बड़े रणधीर हैं ॥ ३ ॥

संगमु सिंहसनु सुठि सोहा । छत्रु अख्यवटु मुनि मनु मोहा ॥ चवैर जमुन अरु गंग तरंगा । देखि होहिं दुख दारिद भंगा ॥

[गङ्गा, यमुना और सरस्वतीका] सङ्गम ही उसका अत्यन्त सुशोभित सिंहसन है। अक्षयवट छत्र है, जो मुनियोंके भी मनको मोहित कर लेता है। यमुनाजी और गङ्गाजीकी तरंगें उसके [श्याम और श्वेत] चवैर हैं, जिनको देखकर ही दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाती है ॥ ४ ॥

दो०— सेवहिं सुकृती साधु सुचि पावहिं सब मनकाम ।

बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम ॥ १०५ ॥

पुण्यात्मा, पवित्र साधु उसकी सेवा करते हैं और सब मनोरथ पाते हैं। वेद और पुराणोंके समूह भाट हैं, जो उसके निर्मल गुणगणोंका बखान करते हैं ॥ १०५ ॥

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ । कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ ॥ अस तीरथपति देखि सुहावा । सुख सागर रघुबर सुखु पावा ॥

पापोंके समूहरूपी हाथीके मारनेके लिये सिंहरूप प्रयागराजका प्रभाव (महत्त्व—माहात्म्य) कौन कह सकता है। ऐसे सुहावने तीर्थराजका दर्शन कर सुखके समुद्र रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजीने भी सुख पाया ॥ १ ॥

कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई । श्रीमुख तीरथराज बड़ाई ॥ करि प्रनामु देखत बन बागा । कहत महातम अति अनुरागा ॥

उन्होंने अपने श्रीमुखसे सीताजी, लक्ष्मणजी और सखा गुहको तीर्थराजकी महिमा कहकर सुनायी। तदनन्तर प्रणाम करके, वन और बगीचोंको देखते हुए और बड़े प्रेमसे माहात्म्य कहते हुए— ॥ २ ॥

एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी । सुमिरत सकल सुमंगल देनी ॥ मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा । पूजि जथाबिधि तीरथ देवा ॥

इस प्रकार श्रीरामने आकर त्रिवेणीका दर्शन किया, जो स्मरण करनेसे ही सब सुन्दर मङ्गलोंको देनेवाली है। फिर आनन्दपूर्वक [त्रिवेणीमें] स्नान करके शिवजीकी सेवा (पूजा) की और विधिपूर्वक तीर्थदेवताओंका पूजन किया ॥ ३ ॥

तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए । करत दंडवत मुनि उर लाए ॥ मुनि मन मोद न कछु कहि जाई । ब्रह्मानंद रासि जनु पाई ॥