भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 432

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  • रामचरितमानस *

गुह हाथ जोड़कर दीन वचन बोला—हे रघुकुलशिरोमणि! मेरी विनती सुनिये। मैं नाथ (आप)के साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, चार (कुछ)दिन चरणोंकी सेवा करके— ॥ २ ॥

जेहिं बन जाइ रहब रघुराई । परनकुटी मैं करबि सुहाई ॥ तब मोहि कहैं जसि देब रजाई । सोड़ करहिउँ रघुबीर दोहाई ॥

हे रघुराज! जिस वनमें आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुन्दर पर्णकुटी (पत्तोंकी कुटिया) बना दूँगा। तब मुझे आप जैसी आज्ञा देंगे, मुझे रघुवीर (आप) की दुहाई है, मैं वैसा ही करूँगा ॥ ३ ॥

सहज सनेह राम लखि तासू । संग लीन्ह गुह हृदयँ हुलासू ॥ पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे । करि परितोषु बिदा तब कीन्हे ॥

उसके स्वाभाविक प्रेमको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने उसको साथ ले लिया, इससे गुहके हृदयमें बड़ा आनन्द हुआ। फिर गुह (निषादराज) ने अपनी जातिके लोगोंको बुला लिया और उनका संतोष कराके तब उनको विदा किया ॥ ४ ॥

दो०— तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ ।

सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ ॥ १०४ ॥

तब प्रभु श्रीरघुनाथजी गणेशजी और शिवजीका स्मरण करके तथा गङ्गाजीको मस्तक नवाकर सखा निषादराज, छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित वनको चले ॥ १०४ ॥

तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू । लखन सरखों सब कीन्ह सुपासू ॥ प्रात प्रातकृत करि रघुराई । तीरथराजु दीख प्रभु जाई ॥

उस दिन पेड़के नीचे निवास हुआ। लक्ष्मणजी और सखा गुहने [विश्रामकी] सब सुव्यवस्था कर दी। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने सबेर प्रातःकालकी सब क्रियाएँ करके जाकर तीर्थोंके राजा प्रयागके दर्शन किये ॥ १ ॥

सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी । माधव सरिस मीतु हितकारी ॥ चारि पदारथ भरा भँडारू । पुन्य प्रदेस देस अति चारू ॥

उस राजाका सत्य मन्त्री है, श्रद्धा प्यारी स्त्री है और श्रीवेणीमाधवजी-सरीखे हितकारी मित्र हैं। चार पदार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) से भण्डार भरा है और वह पुण्यमय प्रान्त ही उस राजाका सुन्दर देश है ॥ २ ॥

छेत्रु अगम गढु गाढ़ सुहावा । सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा ॥ सेन सकल तीरथ बर बीरा । कलुष अनीक दलन रनधीरा ॥