भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 431
  • अयोध्याकाण्ड *

४२९

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा । पूजि पारथिव नायउ माथा ॥ सियै सुरसरिहि कहेउ कर जोरी । मातु मनोरथ पुरउबि मोरी ॥

फिर रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने स्नान करके पार्थिवपूजा की और शिवजीको सिर नवाया। सीताजीने हाथ जोड़कर गङ्गाजीसे कहा—हे माता! मेरा मनोरथ पूरा कीजियेगा ॥ १ ॥

पति देवर सँग कुसल बहोरी । आइ करौं जेहिं पूजा तोरी ॥ सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी । भइ तब बिमल बारि बर बानी ॥

जिससे मैं पति और देवरके साथ कुशलपूर्वक लौट आकर तुम्हारी पूजा करूँ। सीताजीकी प्रेमरसमें सनी हुई विनती सुनकर तब गङ्गाजीके निर्मल जलमेंसे श्रेष्ठ वाणी हुई— ॥ २ ॥

सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही । तव प्रभाउ जग बिदित न केही ॥ लोकप होहिं बिलोकत तोरें । तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें ॥

हे रघुवीरकी प्रियतमा जानकी! सुनो, तुम्हारा प्रभाव जगत्में किसे नहीं मालूम है? तुम्हारे [कृपादृष्टिसे] देखते ही लोग लोकपाल हो जाते हैं। सब सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं ॥ ३ ॥

तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई । कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई ॥ तदपि देबि मैं देबि असीसा । सफल होन हित निज बागीसा ॥

तुमने जो मुझको बड़ी विनती सुनायी, यह तो मुझपर कृपा की और मुझे बड़ाई दी है। तो भी हे देवि! मैं अपनी वाणी सफल होनेके लिये तुम्हें आशीर्वाद दूँगी ॥ ४ ॥

दो०—प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।

पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ ॥ १०३ ॥

तुम अपने प्राणनाथ और देवरसहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटोगी। तुम्हारी सारी मनःकामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुन्दर यश जगत्भरमें छा जायगा ॥ १०३ ॥

गंग बचन सुनि मंगल मूला । मुदित सीय सुरसरि अनुकूला ॥ तब प्रभु गृहहि कहेउ घर जाहू । सुनत सूख मुखु भा उर दाहू ॥

मङ्गलके मूल गङ्गाजीके वचन सुनकर और देवनदीको अनुकूल देखकर सीताजी आनन्दित हुई। तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने निषादराज गृहसे कहा कि भैया! अब तुम घर जाओ। यह सुनते ही उसका मुँह सूख गया और हृदयमें दाह उत्पन्न हो गया ॥ १ ॥

दीन बचन गृह कह कर जोरी । बिनय सुनुहु रघुकुलमनि मोरी ॥ नाथ साथ रहि पंथु देखाई । करि दिन चारि चरन सेवकाई ॥