श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अयोध्याकाण्ड *
४२९
तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा । पूजि पारथिव नायउ माथा ॥ सियै सुरसरिहि कहेउ कर जोरी । मातु मनोरथ पुरउबि मोरी ॥
फिर रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने स्नान करके पार्थिवपूजा की और शिवजीको सिर नवाया। सीताजीने हाथ जोड़कर गङ्गाजीसे कहा—हे माता! मेरा मनोरथ पूरा कीजियेगा ॥ १ ॥
पति देवर सँग कुसल बहोरी । आइ करौं जेहिं पूजा तोरी ॥ सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी । भइ तब बिमल बारि बर बानी ॥
जिससे मैं पति और देवरके साथ कुशलपूर्वक लौट आकर तुम्हारी पूजा करूँ। सीताजीकी प्रेमरसमें सनी हुई विनती सुनकर तब गङ्गाजीके निर्मल जलमेंसे श्रेष्ठ वाणी हुई— ॥ २ ॥
सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही । तव प्रभाउ जग बिदित न केही ॥ लोकप होहिं बिलोकत तोरें । तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें ॥
हे रघुवीरकी प्रियतमा जानकी! सुनो, तुम्हारा प्रभाव जगत्में किसे नहीं मालूम है? तुम्हारे [कृपादृष्टिसे] देखते ही लोग लोकपाल हो जाते हैं। सब सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं ॥ ३ ॥
तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई । कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई ॥ तदपि देबि मैं देबि असीसा । सफल होन हित निज बागीसा ॥
तुमने जो मुझको बड़ी विनती सुनायी, यह तो मुझपर कृपा की और मुझे बड़ाई दी है। तो भी हे देवि! मैं अपनी वाणी सफल होनेके लिये तुम्हें आशीर्वाद दूँगी ॥ ४ ॥
दो०—प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।
पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ ॥ १०३ ॥
तुम अपने प्राणनाथ और देवरसहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटोगी। तुम्हारी सारी मनःकामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुन्दर यश जगत्भरमें छा जायगा ॥ १०३ ॥
गंग बचन सुनि मंगल मूला । मुदित सीय सुरसरि अनुकूला ॥ तब प्रभु गृहहि कहेउ घर जाहू । सुनत सूख मुखु भा उर दाहू ॥
मङ्गलके मूल गङ्गाजीके वचन सुनकर और देवनदीको अनुकूल देखकर सीताजी आनन्दित हुई। तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने निषादराज गृहसे कहा कि भैया! अब तुम घर जाओ। यह सुनते ही उसका मुँह सूख गया और हृदयमें दाह उत्पन्न हो गया ॥ १ ॥
दीन बचन गृह कह कर जोरी । बिनय सुनुहु रघुकुलमनि मोरी ॥ नाथ साथ रहि पंथु देखाई । करि दिन चारि चरन सेवकाई ॥
४३०
- रामचरितमानस *
गुह हाथ जोड़कर दीन वचन बोला—हे रघुकुलशिरोमणि! मेरी विनती सुनिये। मैं नाथ (आप)के साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, चार (कुछ)दिन चरणोंकी सेवा करके— ॥ २ ॥
जेहिं बन जाइ रहब रघुराई । परनकुटी मैं करबि सुहाई ॥ तब मोहि कहैं जसि देब रजाई । सोड़ करहिउँ रघुबीर दोहाई ॥
हे रघुराज! जिस वनमें आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुन्दर पर्णकुटी (पत्तोंकी कुटिया) बना दूँगा। तब मुझे आप जैसी आज्ञा देंगे, मुझे रघुवीर (आप) की दुहाई है, मैं वैसा ही करूँगा ॥ ३ ॥
सहज सनेह राम लखि तासू । संग लीन्ह गुह हृदयँ हुलासू ॥ पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे । करि परितोषु बिदा तब कीन्हे ॥
उसके स्वाभाविक प्रेमको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने उसको साथ ले लिया, इससे गुहके हृदयमें बड़ा आनन्द हुआ। फिर गुह (निषादराज) ने अपनी जातिके लोगोंको बुला लिया और उनका संतोष कराके तब उनको विदा किया ॥ ४ ॥
दो०— तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ ।
सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ ॥ १०४ ॥
तब प्रभु श्रीरघुनाथजी गणेशजी और शिवजीका स्मरण करके तथा गङ्गाजीको मस्तक नवाकर सखा निषादराज, छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित वनको चले ॥ १०४ ॥
तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू । लखन सरखों सब कीन्ह सुपासू ॥ प्रात प्रातकृत करि रघुराई । तीरथराजु दीख प्रभु जाई ॥
उस दिन पेड़के नीचे निवास हुआ। लक्ष्मणजी और सखा गुहने [विश्रामकी] सब सुव्यवस्था कर दी। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने सबेर प्रातःकालकी सब क्रियाएँ करके जाकर तीर्थोंके राजा प्रयागके दर्शन किये ॥ १ ॥
सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी । माधव सरिस मीतु हितकारी ॥ चारि पदारथ भरा भँडारू । पुन्य प्रदेस देस अति चारू ॥
उस राजाका सत्य मन्त्री है, श्रद्धा प्यारी स्त्री है और श्रीवेणीमाधवजी-सरीखे हितकारी मित्र हैं। चार पदार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) से भण्डार भरा है और वह पुण्यमय प्रान्त ही उस राजाका सुन्दर देश है ॥ २ ॥
छेत्रु अगम गढु गाढ़ सुहावा । सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा ॥ सेन सकल तीरथ बर बीरा । कलुष अनीक दलन रनधीरा ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४३१
प्रयाग क्षेत्र ही दुर्गम, मजबूत और सुन्दर गढ़ (किला) है, जिसको स्वप्नमें भी [पापरूपी] शत्रु नहीं पा सके हैं। सम्पूर्ण तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक हैं, जो पापकी सेनाको कुचल डालनेवाले और बड़े रणधीर हैं ॥ ३ ॥
संगमु सिंहसनु सुठि सोहा । छत्रु अख्यवटु मुनि मनु मोहा ॥ चवैर जमुन अरु गंग तरंगा । देखि होहिं दुख दारिद भंगा ॥
[गङ्गा, यमुना और सरस्वतीका] सङ्गम ही उसका अत्यन्त सुशोभित सिंहसन है। अक्षयवट छत्र है, जो मुनियोंके भी मनको मोहित कर लेता है। यमुनाजी और गङ्गाजीकी तरंगें उसके [श्याम और श्वेत] चवैर हैं, जिनको देखकर ही दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाती है ॥ ४ ॥
दो०— सेवहिं सुकृती साधु सुचि पावहिं सब मनकाम ।
बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम ॥ १०५ ॥
पुण्यात्मा, पवित्र साधु उसकी सेवा करते हैं और सब मनोरथ पाते हैं। वेद और पुराणोंके समूह भाट हैं, जो उसके निर्मल गुणगणोंका बखान करते हैं ॥ १०५ ॥
को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ । कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ ॥ अस तीरथपति देखि सुहावा । सुख सागर रघुबर सुखु पावा ॥
पापोंके समूहरूपी हाथीके मारनेके लिये सिंहरूप प्रयागराजका प्रभाव (महत्त्व—माहात्म्य) कौन कह सकता है। ऐसे सुहावने तीर्थराजका दर्शन कर सुखके समुद्र रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजीने भी सुख पाया ॥ १ ॥
कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई । श्रीमुख तीरथराज बड़ाई ॥ करि प्रनामु देखत बन बागा । कहत महातम अति अनुरागा ॥
उन्होंने अपने श्रीमुखसे सीताजी, लक्ष्मणजी और सखा गुहको तीर्थराजकी महिमा कहकर सुनायी। तदनन्तर प्रणाम करके, वन और बगीचोंको देखते हुए और बड़े प्रेमसे माहात्म्य कहते हुए— ॥ २ ॥
एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी । सुमिरत सकल सुमंगल देनी ॥ मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा । पूजि जथाबिधि तीरथ देवा ॥
इस प्रकार श्रीरामने आकर त्रिवेणीका दर्शन किया, जो स्मरण करनेसे ही सब सुन्दर मङ्गलोंको देनेवाली है। फिर आनन्दपूर्वक [त्रिवेणीमें] स्नान करके शिवजीकी सेवा (पूजा) की और विधिपूर्वक तीर्थदेवताओंका पूजन किया ॥ ३ ॥
तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए । करत दंडवत मुनि उर लाए ॥ मुनि मन मोद न कछु कहि जाई । ब्रह्मानंद रासि जनु पाई ॥
४३२
- रामचरितमानस *
[स्नान, पूजन आदि सब करके] तब प्रभु श्रीरामजी भरद्वाजजीके पास आये। उन्हें दण्डवत् करते हुए ही मुनिने हृदयसे लगा लिया। मुनिके मनका आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो उन्हें ब्रह्मानन्दकी राशि मिल गयी हो ॥ ४ ॥
दो०— दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।
लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि ॥ १०६ ॥
मुनीश्वर भरद्वाजजीने आशीर्वाद दिया। उनके हृदयमें ऐसा जानकर अत्यन्त आनन्द हुआ कि आज विधाताने [श्रीसीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन कराकर] मानो हमारे सम्पूर्ण पुण्योंके फलको लाकर आँखोंके सामने कर दिया ॥ १०६ ॥
कुसल प्रस्त्र करि आसन दीन्है । पूजि प्रेम परिपूरन कीन्है ॥ कंद मूल फल अंकुर नीके । दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के ॥
कुशल पूछकर मुनिराजने उनको आसन दिये और प्रेमसहित पूजन करके उन्हें सन्तुष्ट कर दिया। फिर मानो अमृतके ही बने हों, ऐसे अच्छे-अच्छे कन्द, मूल, फल और अंकुर लाकर दिये ॥ १ ॥
सीय लखन जन सहित सुहाए । अति रुचि राम मूल फल खाए ॥ भए बिगतश्रम रामु सुखारे । भरद्वाज मृदु बचन उचारे ॥
सीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुहसहित श्रीरामचन्द्रजीने उन सुन्दर मूल-फलोंको बड़ी रुचिके साथ खाया। थकावट दूर होनेसे श्रीरामचन्द्रजी सुखी हो गये। तब भरद्वाजजीने उनसे कोमल वचन कहें— ॥ २ ॥
आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू । आजु सुफल जप जोग बिरागू ॥ सफल सकल सुभ साधन साजू । राम तुम्हहि अवलोकत आजू ॥
हे राम! आपका दर्शन करते ही आज मेरा तप, तीर्थसेवन और त्याग सफल हो गया। आज मेरा जप, योग और वैराग्य सफल हो गया और आज मेरे सम्पूर्ण शुभ साधनोंका समुदाय भी सफल हो गया ॥ ३ ॥
लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी । तुम्हरेँ दरस आस सब पूजी ॥ अब करि कृपा देहु बर एहुँ । निज पद सरसिज सहज सनेहुँ ॥
लाभकी सीमा और सुखकी सीमा [प्रभुके दर्शनको छोड़कर] दूसरी कुछ भी नहीं है। आपके दर्शनसे मेरी सब आशाएँ पूर्ण हो गयीं। अब कृपा करके यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें मेरा स्वाभाविक प्रेम हो ॥ ४ ॥
दो०— करम बचन मन छड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किऐँ कोटि उपचार ॥ १०७ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४३३
जबतक कर्म, वचन और मनसे छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तबतक करोड़ों उपाय करनेसे भी, स्वप्नमें भी वह सुख नहीं पाता ॥ १०७ ॥
मुनि मुनि बचन रामु सकुचाने । भाव भगति आनंद अघाने ॥ तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा । कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा ॥
मुनिके वचन सुनकर, उनकी भाव-भक्तिके कारण आनन्दसे तृप्त हुए भगवान् श्रीरामचन्द्रजी [लीलाकी दृष्टिसे] सकुचा गये। तब [अपने ऐश्वर्यको छिपाते हुए] श्रीरामचन्द्रजीने भरद्वाज मुनिका सुन्दर सुयश करोड़ों (अनेकों) प्रकारसे कहकर सबको सुनाया ॥ १ ॥
सो बड़ सो सब गुन गन गेहू । जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू ॥ मुनि रघुबीर परसपर नवहीं । बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं ॥
[उन्होंने कहा—] हे मुनीश्वर! जिसको आप आदर दें, वही बड़ा है और वही सब गुणसमूहोंका घर है। इस प्रकार श्रीरामजी और मुनि भरद्वाजजी दोनों परस्पर विनम्र हो रहे हैं और अनिर्वचनीय सुखका अनुभव कर रहे हैं ॥ २ ॥
यह सुधि पाड़ प्रयाग निवासी । बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी ॥ भरद्वाज आश्रम सब आए । देखन दसरथ सुअन सुहाए ॥
यह (श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीके आनेकी) खबर पाकर प्रयागनिवासी ब्रह्मचारी, तपस्वी, मुनि, सिद्ध और उदासी सब श्रीदशरथजीके सुन्दर पुत्रोंको देखनेके लिये भरद्वाजजीके आश्रमपर आये ॥ ३ ॥
राम प्रनाम कीन्ह सब काहू । मुदित भए लहि लोयन लाहू ॥ देहिं असीस परम सुखु पाई । फिरे सराहत सुंदरताई ॥
श्रीरामचन्द्रजीने सब किसीको प्रणाम किया। नेत्रोंका लाभ पाकर सब आनन्दित हो गये और परम सुख पाकर आशीर्वाद देने लगे। श्रीरामजीके सौन्दर्यकी सराहना करते हुए वे लौटे ॥ ४ ॥
दो०—राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ ।
चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ ॥ १०८ ॥
श्रीरामजीने रातको वहीं विश्राम किया और प्रातःकाल प्रयागराजका स्नान करके और प्रसन्नताके साथ मुनिको सिर नवाकर श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुहके साथ वे चले ॥ १०८ ॥
राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं । नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं ॥ मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं । सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं ॥
[चलते समय] बड़े प्रेमसे श्रीरामजीने मुनिसे कहा— हे नाथ! बताइये हम किस मार्गसे जायँ। मुनि मनमें हँसकर श्रीरामजीसे कहते हैं कि आपके लिये सभी मार्ग सुगम हैं ॥ १ ॥
४३४
- रामचरितमानस *
साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए । सुनि मन मुदित पचासक आए ॥ सबन्हि राम पर प्रेम अपारा । सकल कहहिं मगु दीख हमारा ॥
फिर उनके साथके लिये मुनिने शिष्योंको बुलाया। [साथ जानेकी बात] सुनते ही चित्तमें हर्षित हो कोई पचास शिष्य आ गये। सभीका श्रीरामजीपर अपार प्रेम है। सभी कहते हैं कि मार्ग हमारा देखा हुआ है ॥ २ ॥
मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे । जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे ॥ करि प्रनामु रिषि आयसु पाई । प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई ॥
तब मुनिने [चुनकर] चार ब्रह्मचारियोंको साथ कर दिया, जिन्होंने बहुत जन्मोंतक सब सुकृत (पुण्य) किये थे। श्रीरघुनाथजी प्रणाम कर और ऋषिकी आज्ञा पाकर हृदयमें बड़े ही आनन्दित होकर चले ॥ ३ ॥
ग्राम निकट जब निकसहिं जाई । देखहिं दरसु नारि नर धाई ॥ होहिं सनाथ जनम फलु पाई । फिरहिं दुखित मनु संग पठाई ॥
जब वे किसी गाँवके पास होकर निकलते हैं तब स्त्री-पुरुष दौड़कर उनके रूपको देखने लगते हैं। जन्मका फल पाकर वे [सदाके अनाथ] सनाथ हो जाते हैं और मनको नाथके साथ भेजकर [शरीरसे साथ न रहनेके कारण] दुःखी होकर लौट आते हैं ॥ ४ ॥
दो०— बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाड़ मन काम ।
उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम ॥ १०९ ॥
तदनन्तर श्रीरामजीने विनती करके चारों ब्रह्मचारियोंको विदा किया; वे मनचाही वस्तु (अनन्य भक्ति) पाकर लौटे। यमुनाजीके पार उतरकर सबने यमुनाजीके जलमें स्नान किया, जो श्रीरामचन्द्रजीके शरीरके समान ही श्याम रंगका था ॥ १०९ ॥
सुनत तीरबासी नर नारी । धाए निज निज काज बिसारी ॥ लखन राम सिय सुंदरताई । देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई ॥
यमुनाजीके किनारेपर रहनेवाले स्त्री-पुरुष [यह सुनकर कि निषादके साथ दो परम सुन्दर सुकुमार नवयुवक और एक परम सुन्दरी स्त्री आ रही है] सब अपना-अपना काम भूलकर दौड़े और लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजीका सौन्दर्य देखकर अपने भाग्यकी बड़ाई करने लगे ॥ १ ॥
अति लालसा बसहिं मन माहीं । नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं ॥ जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने । तिन्ह करि जुगति रामु पहिचाने ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४३५
उनके मनमें [परिचय जाननेकी] बहुत-सी लालसाएँ भरी हैं। पर वे नाम-गाँव पूछते सकुचाते हैं। उन लोगोंमें जो वयोवृद्ध और चतुर थे; उन्होंने युक्तिसे श्रीरामचन्द्रजीको पहचान लिया ॥ २ ॥
सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई । बनहि चले पितु आयसु पाई ॥ सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं । रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं ॥
उन्होंने सब कथा सब लोगोंको सुनायी कि पिताकी आज्ञा पाकर ये वनको चले हैं। यह सुनकर सब लोग दुःखित हो पछता रहे हैं कि रानी और राजाने अच्छा नहीं किया ॥ ३ ॥
तेहि अवसर एक तापसु आवा । तेजपुंज लघुबयस सुहावा ॥ कबि अलखित गति बेषु बिरागी । मन क्रम बचन राम अनुरागी ॥
उसी अवसरपर वहाँ एक तपस्वी आया, जो तेजका पुञ्ज, छोटी अवस्थाका और सुन्दर था। उसकी गति कवि नहीं जानते [अथवा वह कवि था जो अपना परिचय नहीं देना चाहता]। वह वैरागीके वेषमें था और मन, वचन तथा कर्मसे श्रीरामचन्द्रजीका प्रेमी था ॥ ४ ॥
[इस तेजःपुञ्ज तापसके प्रसंगको कुछ टीकाकार क्षेपक मानते हैं और कुछ लोगोंके देखनेमें यह अप्रासंगिक और ऊपरसे जोड़ा हुआ-सा जान भी पड़ता है, परन्तु यह सभी प्राचीन प्रतियोंमें है। गुसाईजी अलौकिक अनुभवों पुरुष थे। पता नहीं, यहाँ इस प्रसंगके रखनेमें क्या रहस्य है; परन्तु यह क्षेपक तो नहीं है। इस तापसको जब 'कबि अलखित गति' कहते हैं, तब निश्चयपूर्वक कौन क्या कह सकता है। हमारी समझसे ये तापस या तो श्रीहनुमान्जी थे अथवा ध्यानस्थ तुलसीदासजी!]
दो०— सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि । परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि ॥ ११० ॥
अपने इष्टदेवको पहचानकर उसके नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर पुलकित हो गया। वह दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसकी [प्रेमविह्वल] दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ११० ॥
राम सप्रेम पुलकि उर लावा । परम रंक जनु पारसु पावा ॥ मनहुँ प्रेम परमारथु दोऊ । मिलत धरें तन कह सबु कोऊ ॥
श्रीरामजीने प्रेमपूर्वक पुलकित होकर उसको हृदयसे लगा लिया। [उसे इतना आनन्द हुआ] मानो कोई महादरिद्री मनुष्य पारस पा गया हो। सब कोई [देखनेवाले] कहने लगे कि मानो प्रेम और परमार्थ (परम तत्त्व) दोनों शरीर धारण करके मिल रहे हैं ॥ १ ॥
बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा । लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा ॥ पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा । जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा ॥
४३६
- रामचरितमानस *
फिर वह लक्ष्मणजीके चरणों लगा। उन्होंने प्रेमसे उमँगकर उसको उठा लिया। फिर उसने सीताजीकी चरणधूलिको अपने सिरपर धारण किया। माता सीताजीने भी उसको अपना छोटा बच्चा जानकर आशीर्वाद दिया ॥ २ ॥
कीन्ह निषाद दंडवत तेही । मिलेउ मुदित लखि राम सनेही ॥ पिअत नयन पुट रूपु पियूषा । मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा ॥
फिर निषादराजने उसको दण्डवत् की। श्रीरामचन्द्रजीका प्रेमी जानकर वह उस (निषाद) से आनन्दित होकर मिला। वह तपस्वी अपने नेत्ररूपी दोनोंसे श्रीरामजीकी सौन्दर्य-सुधाका पान करने लगा और ऐसा आनन्दित हुआ जैसे कोई भूखा आदमी सुन्दर भोजन पाकर आनन्दित होता है ॥ ३ ॥
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे । जिन्ह पठए बन बालक ऐसे ॥ राम लखन सिय रूपु निहारी । होहिं सनेह बिकल नर नारी ॥
[इधर गाँवकी स्त्रियाँ कह रही हैं—] हे सखी! कहो तो, वे माता-पिता कैसे हैं जिन्होंने ऐसे (सुन्दर सुकुमार) बालकोंको वनमें भेज दिया है। श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके रूपको देखकर सब स्त्री-पुरुष स्नेहसे व्याकुल हो जाते हैं ॥ ४ ॥
दो०— तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह । राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेई कीन्ह ॥ १११ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीने सखा गुहको अनेकों तरहसे [घर लौट जानेके लिये] समझाया। श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसने अपने घरको गमन किया ॥ १११ ॥
पुनि सियँ राम लखन कर जोरी । जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी ॥ चले ससीय मुदित दोउ भाई । रबितनुजा कड़ करत बड़ाई ॥
फिर सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मणजीने हाथ जोड़कर यमुनाजीको पुनः प्रणाम किया और सूर्यकन्या यमुनाजीकी बड़ाई करते हुए सीताजीसहित दोनों भाई प्रसन्नतापूर्वक आगे चले ॥ १ ॥
पथिक अनेक मिलहिं मग जाता । कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता ॥ राज लखन सब अंग तुम्हारें । देखि सोचु अति हृदय हमारें ॥
रास्तेमें जाते हुए उन्हें अनेकों यात्री मिलते हैं। वे दोनों भाइयोंको देखकर उनसे प्रेमपूर्वक कहते हैं कि तुम्हारे सब अङ्गोंमें राजचिह्न देखकर हमारे हृदयमें बड़ा सोच होता है ॥ २ ॥
मारग चलहु पयादेहि पाएँ । ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ ॥ अगमु पंथु गिरि कानन भारी । तेहि महाँ साथ नारि सुकुमारी ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४३७
[ऐसे राजचिह्नोंके होते हुए भी] तुमलोग रास्तेमें पैदल ही चल रहे हो, इससे हमारी समझमें आता है कि ज्योतिष-शास्त्र झूठा ही है। भारी जंगल और बड़े-बड़े पहाड़ोंका दुर्गम रास्ता है। तिसपर तुम्हारे साथ सुकुमारी स्त्री हैं ॥ ३ ॥
करि केहरि बन जाइ न जोई । हम सँग चलहिं जो आयसु होई ॥ जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई । फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई ॥
हाथी और सिंहोंसे भरा यह भयानक वन देखातक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें। आप जहाँतक जायँगे वहाँतक पहुँचाकर, फिर आपको प्रणाम करके हम लौट आवेंगे ॥ ४ ॥
दो०— एहि बिधि पहुँछिहँ प्रेम बस पुलक गात जलु नैन ।
कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन ॥ ११२ ॥
इस प्रकार वे यात्री प्रेमवश पुलकितशरीर हो और नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भरकर पूछते हैं। किन्तु कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनययुक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं ॥ ११२ ॥
जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं । तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं ॥
केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए । धन्य पुन्यमय परम सुहाए ॥
जो गाँव और पुरवे रास्तेमें बसे हैं, नागों और देवताओंके नगर उनको देखकर प्रशंसापूर्वक ईर्ष्या करते और ललचाते हुए कहते हैं कि किस पुण्यवान्ने किस शुभ घड़ीमें इनको बसाया था, जो आज ये इतने धन्य और पुण्यमय तथा परम सुन्दर हो रहे हैं ॥ १ ॥
जहाँ जहाँ राम चरन चलि जाहीं । तिन्ह समान अमरावति नाहीं ॥
पुन्यपुंज मग निकट निवासी । तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी ॥
जहाँ-जहाँ श्रीरामचन्द्रजीके चरण चले जाते हैं, उनके समान इन्द्रकी पुरी अमरावती भी नहीं है। रास्तेके समीप बसनेवाले भी बड़े पुण्यात्मा हैं—स्वर्गमें रहनेवाले देवता भी उनकी सराहना करते हैं— ॥ २ ॥
जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि । सीता लखन सहित घनस्यामहि ॥
जे सर सरित राम अवगाहहिं । तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं ॥
जो नेत्र भरकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित घनश्याम श्रीरामजीके दर्शन करते हैं, जिन तालाबों और नदियोंमें श्रीरामजी स्नान कर लेते हैं, देवसरोवर और देवनदियाँ भी उनकी बड़ाई करती हैं ॥ ३ ॥
जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई । करहिं कलपतरु तासु बड़ाई ॥
परसि राम पद पदुम परागा । मानति भूमि भूरि निज भागा ॥
जिस वृक्षके नीचे प्रभु जा बैठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंकी रजका स्पर्श करके पृथ्वी अपना बड़ा सौभाग्य मानती है ॥ ४ ॥
४३८
- रामचरितमानस *
दो०— छौहं करहिं घन बिबुधगन बरषहिं सुमन सिहाहिं। देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं ॥ ११३ ॥
रास्तेमें बादल छाया करते हैं और देवता फूल बरसाते और सिहाते हैं। पर्वत, वन और पशु-पक्षियोंको देखते हुए श्रीरामजी रास्तेमें चले जा रहे हैं ॥ ११३ ॥
सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई ॥ सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृह काजु बिसारी ॥
सीताजी और लक्ष्मणजीसहित श्रीरघुनाथजी जब किसी गाँवके पास जा निकलते हैं तब उनका आना सुनते ही बालक-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सब अपने घर और काम-काजको भूलकर तुरंत उन्हें देखनेके लिये चल देते हैं ॥ १ ॥
राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी ॥ सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा ॥
श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीका रूप देखकर, नेत्रोंका [परम] फल पाकर वे सुखी होते हैं। दोनों भाइयोंको देखकर सब प्रेमानन्दमें मग्न हो गये। उनके नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर पुलकित हो गये ॥ २ ॥
बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी ॥ एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं ॥
उनकी दशा वर्णन नहीं की जाती। मानो दृष्टिोंने चिन्तामणिकी ढेरी पा ली हो। वे एक-एकको पुकारकर सीख देते हैं कि इसी क्षण नेत्रोंका लाभ ले लो ॥ ३ ॥
रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे ॥ एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी ॥
कोई श्रीरामचन्द्रजीको देखकर ऐसे अनुरागमें भर गये हैं कि वे उन्हें देखते हुए उनके साथ लगे चले जा रहे हैं। कोई नेत्रमार्गसे उनकी छविको हृदयमें लाकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणीसे शिथिल हो जाते हैं (अर्थात् उनके शरीर, मन और वाणीका व्यवहार बंद हो जाता है) ॥ ४ ॥
दो०— एक देखि बट छौहं भलि डासि मृदुल तून पात। कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात ॥ ११४ ॥
कोई बड़की सुन्दर छाया देखकर, वहाँ नरम घास और पत्ते बिछाकर कहते हैं कि क्षणभर यहाँ बैठकर थकावट मिटा लीजिये। फिर चाहे अभी चले जाइयेगा, चाहे सबेरे ॥ ११४ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४३१
एक कलस भरि आनहिं पानी । अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी ॥ सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी । राम कृपाल सुसील बिसेषी ॥
कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल वाणीसे कहते हैं—नाथ! आचमन तो कर लीजिये। उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका अत्यन्त प्रेम देखकर दयालु और परम सुशील श्रीरामचन्द्रजीने— ॥ १ ॥
जानी श्रमित सीय मन माहीं । घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं ॥ मुदित नारि नर देखहिं सोभा । रूप अनूप नयन मनु लोभा ॥
मनमें सीताजीको थकी हुई जानकर घड़ीभर बड़की छायामें विश्राम किया। स्त्री-पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूपने उनके नेत्र और मनोंको लुभा लिया है ॥ २ ॥
एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा । रामचंद्र मुख चंद चकोरा ॥ तरुन तमाल बरन तनु सोहा । देखत कोटि मदन मनु मोहा ॥
सब लोग टकटकी लगाये श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको चकोरकी तरह (तन्मय होकर) देखते हुए चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजीका नवीन तमाल वृक्षके रंगका (श्याम) शरीर अत्यन्त शोभा दे रहा है, जिसे देखते ही करोड़ों कामदेवोंके मन मोहित हो जाते हैं ॥ ३ ॥
दामिनि बरन लखन सुठि नीके । नख सिख सुभग भावते जी के ॥ मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा । सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा ॥
बिजलीके-से रंगके लक्ष्मणजी बहुत ही भले मालूम होते हैं। वे नखसे शिखातक सुन्दर हैं, और मनको बहुत भाते हैं। दोनों मुनियोंके (वल्लल आदि) वस्त्र पहने हैं और कमरमें तरकस कसे हुए हैं। कमलके समान हाथोंमें धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं ॥ ४ ॥
दो०—जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल ।
सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल ॥ ११५ ॥
उनके सिरोंपर सुन्दर जटाओंके मुकुट हैं; वक्षःस्थल, भुजा और नेत्र विशाल हैं और शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखोंपर पसीनेकी बूँदोंका समूह शोभित हो रहा है ॥ ११५ ॥
बरनि न जाइ मनोहर जोरी । सोभा बहुत थोरि मति मोरी ॥ राम लखन सिय सुंदरताई । सब चितवहिं चित मन मति लाई ॥
उस मनोहर जोड़ीका वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि शोभा बहुत अधिक है, और मेरी बुद्धि थोड़ी है। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीकी सुन्दरताको सब लोग मन, चित और बुद्धि तीनोंको लगाकर देख रहे हैं ॥ १ ॥
४४०
- रामचरितमानस *
थके नारि नर प्रेम पिआसे । मनहुँ मूगी मूग देखि दिआ से ॥ सीय समीप ग्रामतिय जाहीं । पूछत अति सनेहँ सकुचाहीं ॥
प्रेमके प्यासे [वे गाँवोंके] स्त्री-पुरुष [इनके सौन्दर्य-माधुर्यकी छटा देखकर] ऐसे थकित रह गये जैसे दीपकको देखकर हिरनी और हिरन [निस्तब्ध रह जाते हैं] ! गाँवोंकी स्त्रियाँ सीताजीके पास जाती हैं; परन्तु अत्यन्त स्नेहके कारण पूछते सकुचाती हैं ॥ २ ॥
बार बार सब लागहिं पाएँ । कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ ॥ राजकुमारि बिनय हम करहीं । तिय सुभार्थ कछु पूछत डरहीं ॥
बार-बार सब उनके पाँव लगतीं और सहज ही सीधे-सादे कोमल वचन कहती हैं—हे राजकुमारी ! हम विनती करती (कुछ निवेदन करना चाहती) हैं, परन्तु स्त्री-स्वभावके कारण कुछ पूछते हुए डरती हैं ॥ ३ ॥
स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी । बिलगु न मानब जानि गवौरी ॥ राजकुअर दोउ सहज सलोने । इन्ह तें लही दुति मरकत सोने ॥
हे स्वामिनि ! हमारी ढिठाई क्षमा कीजियेगा और हमको गँवारी जानकर बुरा न मानियेगा। ये दोनों राजकुमार स्वभावसे ही लावण्यमय (परम सुन्दर) हैं। मरकतमणि (पत्ते) और सुवर्णने कान्ति इन्हींसे पायी है (अर्थात् मरकतमणिमें और स्वर्णमें जो हरित और स्वर्णवर्णकी आभा है वह इनकी हरिताभनील और स्वर्णकान्तिके एक कणके बराबर भी नहीं है) ॥ ४ ॥
दो०— स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।
सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन ॥ ११६ ॥
श्याम और गौर वर्ण है, सुन्दर किशोर अवस्था है; दोनों ही परम सुन्दर और शोभाके धाम हैं। शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान इनके मुख और शरद-ऋतुके कमलके समान इनके नेत्र हैं ॥ ११६ ॥
मासपारायण, सोलहवाँ विश्राम
नवाह्नपारायण, चौथा विश्राम
कोटि मनोज लजावनिहारे । सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे ॥
सुनि सनेहमय मंजुल बानी । सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी ॥
हे सुमुखि ! कहो तो अपनी सुन्दरतासे करोड़ों कामदेवोंको लजानेवाले ये तुम्हारे कौन हैं ? उनकी ऐसी प्रेममयी सुन्दर वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं और मन-ही-मन मुसकरायीं ॥ १ ॥
तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी । दुहुँ सकोच सकुचति बरबरनी ॥
सकुचि सप्रेम बाल मूग नयनी । बोली मधुर बचन पिकबयनी ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४४१
उत्तम (गौर) वर्णवाली सीताजी उनको देखकर [संकोचवश] पृथ्वीकी ओर देखती हैं। वे दोनों ओरके संकोचसे सकुचा रही हैं (अर्थात् न बतानेमें ग्रामकी स्त्रियोंको दुःख होनेका संकोच है और बतानेमें लज्जारूप संकोच)। हिरणके बच्चेके सदृश नेत्रवाली और कोकिलकी-सी वाणीवाली सीताजी सकुचाकर प्रेमसहित मधुर वचन बोलीं— ॥ २ ॥
सहज सुभाय सुभग तन गोरै । नामु लखनु लघु देवर मोरै ॥ बहरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी । पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी ॥
ये जो सहजस्वभाव, सुन्दर और गोरै शरीरके हैं, उनका नाम लक्ष्मण है; ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीताजीने [लज्जावश] अपने चन्द्रमुखको आँचलसे ढककर और प्रियतम (श्रीरामजी) की ओर निहारकर भौँहें टेढ़ी करके, ॥ ३ ॥
खंजन मंजु तिरिछे नयननि । निज पति कहेउ तिन्हहि सियै सयननि ॥ भई मुदित सब ग्रामबधूर्ती । रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं ॥
खंजन पक्षीके-से सुन्दर नेत्रोंको तिरछा करके सीताजीने इशारेसे उन्हें कहा कि ये (श्रीरामचन्द्रजी) मेरे पति हैं। यह जानकर गाँवकी सब युवती स्त्रियाँ इस प्रकार आनन्दित हुईं मानो कंगालोंने धनकी राशियाँ लूट ली हों ॥ ४ ॥
दो०— अति सप्रेम सिय पार्यै परि बहुबिधि देहिं असीस । सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस ॥ ११७ ॥
वे अत्यन्त प्रेमसे सीताजीके पैरों पड़कर बहुत प्रकारसे आशिष देती हैं (शुभ कामना करती हैं) कि जबतक शेषजीके सिरपर पृथ्वी रहे, तबतक तुम सदा सुहागिनी बनी रहो, ॥ ११७ ॥
पारबती सम पतिप्रिय होहू । देबि न हम पर छाड़ब छोहू ॥ पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी । जौँ एहि मारग फिरिअ बहोरी ॥
और पार्वतीजीके समान अपने पतिकी प्यारी होओ। हे देवि! हमपर कृपा न छोड़ना (बनाये रखना)। हम बार-बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं जिसमें आप फिर इसी रास्ते लौटें, ॥ १ ॥
दरसनु देब जानि निज दासी । लखीं सीर्यै सब प्रेम पिआसी ॥ मधुर बचन कहि कहि परितोर्षी । जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोर्षीं ॥
और हमें अपनी दासी जानकर दर्शन दें। सीताजीने उन सबको प्रेमकी प्यासी देखा, और मधुर वचन कह-कहकर उनका भलीभाँति सन्तोष किया। मानो चाँदनीने कुमुदिनियोंको खिलाकर पुष्ट कर दिया हो ॥ २ ॥
४४२
- रामचरितमानस *
तबहिं लखन रघुबर रुख जानी । पूछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी ॥ सुनत नारि नर भए दुखारी । पुलकित गात बिलोचन बारी ॥
उसी समय श्रीरामचन्द्रजीका रुख जानकर लक्ष्मणजीने कोमल वाणीसे लोगोंसे रास्ता पूछा । यह सुनते ही स्त्री-पुरुष दुःखी हो गये । उनके शरीर पुलकित हो गये और नेत्रोंमें [वियोगकी सम्भावनासे प्रेमका] जल भर आया ॥ ३ ॥
मिटा मोदु मन भए मलीने । बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने ॥ समुझि करम गति धीरजु कीन्हा । सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा ॥
उनका आनन्द मिट गया और मन ऐसे उदास हो गये मानो विधाता दी हुई सम्पत्ति छीने लेता हो । कर्मकी गति समझकर उन्होंने धैर्य धारण किया और अच्छी तरह निर्णय करके सुगम मार्ग बतला दिया ॥ ४ ॥
दो०—लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ ।
फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाड़ मन साथ ॥ ११८ ॥
तब लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित श्रीरघुनाथजीने गमन किया और सब लोगोंको प्रिय बचन कहकर लौटाया, किन्तु उनके मनोंको अपने साथ ही लगा लिया ॥ ११८ ॥
फिरत नारि नर अति पछिताहीं । दैअहि दोषु देहिं मन माहीं ॥ सहित बिषाद परसपर कहहीं । बिधि करतब उलटे सब अहहीं ॥
लौटते हुए वे स्त्री-पुरुष बहुत ही पछताते हैं और मन-ही-मन दैवको दोष देते हैं । परस्पर [बड़े ही] विषादके साथ कहते हैं कि विधाताके सभी काम उलटे हैं ॥ १ ॥
निपट निरंकुस निठुर निसंकू । जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू ॥ रुख कलपतरु सागरु खारा । तेहिं पठए बन राजकुमारा ॥
वह विधाता बिलकुल निरंकुश (स्वतन्त्र), निर्दय और निडर है, जिसने चन्द्रमाको रोगी (घटने-बढ़नेवाला) और कलंकी बनाया, कल्पवृक्षको पेड़ और समुद्रको खारा बनाया । उसीने इन राजकुमारोंको वनमें भेजा है ॥ २ ॥
जों पै इन्हहि दीन्ह बनबासू । कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू ॥ ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना । रचे बादि बिधि बाहन नाना ॥
जब विधाताने इनको वनवास दिया है, तब उसने भोग-विलास व्यर्थ ही बनाये । जब ये बिना जूतेके (नंगे ही पैरों) रास्तेमें चल रहे हैं, तब विधाता अनेकों वाहन (सवारियाँ) व्यर्थ ही रचे ॥ ३ ॥
ए महि परहिं डासि कुस पाता । सुभग सेज कत सृजत बिधाता ॥ तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा । धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४४३
जब ये कुश और पते बिछाकर जमीनपर ही पड़े रहते हैं, तब विधाता सुन्दर सेज (पलंग और बिछौने) किसलिये बनाता है? विधाताने जब इनको बड़े-बड़े पेड़ों [के नीचे] का निवास दिया, तब उज्ज्वल महलोंको बना-बनाकर उसने व्यर्थ ही परिश्रम किया ॥ ४ ॥
दो०— जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार।
बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार ॥ ११९ ॥
जो ये सुन्दर और अत्यन्त सुकुमार होकर मुनियोंके (बल्कल) वस्त्र पहनते और जटा धारण करते हैं, तो फिर करतार (विधाता) ने भाँति-भाँतिके गहने और कपड़े वृथा ही बनाये ॥ ११९ ॥
जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं ॥ एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए ॥
जो ये कन्द, मूल, फल खाते हैं तो जगत्में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं। कोई एक कहते हैं—ये स्वभावसे ही सुन्दर हैं [इनका सौन्दर्य-माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है]। ये अपने-आप प्रकट हुए हैं, ब्रह्माके बनाये नहीं हैं ॥ १ ॥
जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी ॥ देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी ॥
हमारे कानों, नेत्रों और मनके द्वारा अनुभवमें आनेवाली विधाताकी करनीको जहाँतक वेदोंने वर्णन करके कहा है, वहाँतक चौदहों लोकोंमें दृढ़ देखो, ऐसे पुरुष और ऐसी स्त्रियाँ कहाँ हैं? [कहीं भी नहीं हैं, इसीसे सिद्ध है कि ये विधाताके चौदहों लोकोंसे अलग हैं और अपनी महिमासे ही आप निर्मित हुए हैं] ॥ २ ॥
इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा ॥ कीन्ह बहुत श्रम एक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए ॥
इन्हें देखकर विधाताका मन अनुरक्त (मुग्ध) हो गया, तब वह भी इन्हींकी उपमाके योग्य दूसरे स्त्री-पुरुष बनाने लगा। उसने बहुत परिश्रम किया, परन्तु कोई उसकी अटकलमें ही नहीं आये (पूरे नहीं उतरे)। इसी ईर्ष्याके मारे उसने इनको जंगलमें लाकर छिपा दिया है ॥ ३ ॥
एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं ॥ ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे ॥
कोई एक कहते हैं—हम बहुत नहीं जानते। हाँ, अपनेको परम धन्य अवश्य मानते हैं [जो इनके दर्शन कर रहे हैं] और हमारी समझमें वे भी बड़े पुण्यवान् हैं जिन्होंने इनको देखा है, जो देख रहे हैं और जो देखेंगे ॥ ४ ॥
४४४
- रामचरितमानस *
दो०—एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर ।
किमि चलिहहिं मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर ॥ १२० ॥
इस प्रकार प्रिय वचन कह-कहकर सब नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर लेते हैं और कहते हैं कि ये अत्यन्त सुकुमार शरीरवाले दुर्गम (कठिन) मार्गमें कैसे चलेंगे ॥ १२० ॥
नारि सनेह बिकल बस होहीं । चकई साँझ समय जनु सोहीं ॥ मृदु पद कमल कठिन मगु जानी । गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी ॥
स्त्रियाँ स्नेहवश विकल हो जाती हैं। मानो सन्ध्याके समय चकवी [भावी वियोगकी पीड़ासे] सोह रही हों (दुखी हो रही हों)। इनके चरणकमलोंको कोमल तथा मार्गको कठोर जानकर वे व्यथित हृदयसे उत्तम वाणी कहती हैं—॥ १ ॥
परसत मृदुल चरन अरुनारे । सकुचति महि जिमि हृदय हमारे ॥ जौँ जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा । कस न सुमनमय मारगु कीन्हा ॥
इनके कोमल और लाल-लाल चरणों (तलवों) को छूते ही पृथ्वी वैसे ही सकुचा जाती है जैसे हमारे हृदय सकुचा रहे हैं। जगदीश्वरने यदि इन्हें वनवास ही दिया, तो सारे रास्तेको पुष्पमय क्यों नहीं बना दिया? ॥ २ ॥
जौँ मागा पाइअ बिधि पाहीं । ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं ॥ जे नर नारि न अवसर आए । तिन्ह सिय रामु न देखन पाए ॥
यदि ब्रह्मासे माँगे मिले तो हे सखि! [हम तो उनसे माँगकर] इन्हें अपनी आँखोंमें ही रखें! जो स्त्री-पुरुष इस अवसरपर नहीं आये, वे श्रीसीतारामजीको नहीं देख सके ॥ ३ ॥
सुनि सुरुपु बूझहिं अकुलाई । अब लगि गए कहाँ लगि भाई ॥ समरथ धाइ बिलोकहिं जाई । प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई ॥
उनके सौन्दर्यको सुनकर वे व्याकुल होकर पूछते हैं कि भाई! अबतक वे कहाँतक गये होंगे? और जो समर्थ हैं वे दौड़ते हुए जाकर उनके दर्शन कर लेते हैं और जन्मका परम फल पाकर, विशेष आनन्दित होकर लौटते हैं ॥ ४ ॥
दो०—अबला बालक बूद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं ।
होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहाँ जाहिं ॥ १२१ ॥
[गर्भवती, प्रसूता आदि] अबला स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े [दर्शन न पानेसे] हाथ मलते और पछताते हैं। इस प्रकार जहाँ-जहाँ श्रीरामचन्द्रजी जाते हैं, वहाँ-वहाँ लोग प्रेमके वशमें हो जाते हैं ॥ १२१ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४४५
गावँ गावँ अस होइ अनंदू । देखि भानुकुल कैरव चंदू॥ जे कछु समाचार सुनि पावहिं । ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं॥
सूर्यकुलरूपी कुमुदिनीके प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमास्वरूप श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकर गाँव-गाँवमें ऐसा ही आनन्द हो रहा है। जो लोग [वनवास दिये जानेका] कुछ भी समाचार सुन पाते हैं, वे राजा-रानी [दशरथ-कैकेयी] को दोष लगाते हैं ॥ १ ॥
कहहिं एक अति भल नरनाहू । दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू॥ कहहिं परसपर लोग लोगाई । बातें सरल सनेह सुहाई॥
कोई एक कहते हैं कि राजा बहुत ही अच्छे हैं, जिन्होंने हमें अपने नेत्रोंका लाभ दिया। स्त्री-पुरुष सभी आपसमें सीधी, स्नेहभरी सुन्दर बातें कह रहे हैं ॥ २ ॥
ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए । धन्य सो नगर जहाँ तें आए॥ धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ । जहाँ जहाँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ॥
[कहते हैं—] वे माता-पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया। वह नगर धन्य है जहाँसे ये आये हैं। वह देश, पर्वत, वन और गाँव धन्य है, और वही स्थान धन्य है जहाँ-जहाँ ये जाते हैं ॥ ३ ॥
सुखु पायउ बिरंचि रचि तेही । ए जेहि के सब भाँति सनेही॥ राम लखन पथि कथा सुहाई । रही सकल मग कानन छाई॥
ब्रह्माने उसीको रचकर सुख पाया है जिसके ये (श्रीरामचन्द्रजी) सब प्रकारसे स्नेही हैं। पथिकरूप श्रीराम-लक्ष्मणकी सुन्दर कथा सारे रास्ते और जंगलमें छा गयी है ॥ ४ ॥
दो०— एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत । जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत ॥ १२२ ॥
रघुकुलरूपी कमलके खिलावेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार मार्गिके लोगोंको सुख देते हुए सीताजी और लक्ष्मणजीसहित वनको देखते हुए चले जा रहे हैं ॥ १२२ ॥
आगें रामु लखनु बने पाछें । तापस बेष बिराजत काछें॥ उभय बीच सिय सोहति कैसें । ब्रह्म जीव बिच माया जैसें॥
आगे श्रीरामजी हैं, पीछे लक्ष्मणजी सुशोभित हैं। तपस्वियोंके वेष बनाये दोनों बड़ी ही शोभा पा रहे हैं। दोनोंके बीचमें सीताजी कैसी सुशोभित हो रही हैं, जैसे ब्रह्म और जीवके बीचमें माया! ॥ १ ॥
बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई । जनु मधु मदन मध्य रति लसई॥ उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही । जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही॥
४४६
- रामचरितमानस *
फिर जैसी छबि मेरे मनमें बस रही है, उसको कहता हूँ—मानो वसन्त-ऋतु और कामदेवके बीचमें रति (कामदेवकी स्त्री) शोभित हो। फिर अपने हृदयमें खोजकर उपमा कहता हूँ कि मानो बुध (चन्द्रमाके पुत्र) और चन्द्रमाके बीचमें रोहिणी (चन्द्रमाकी स्त्री) सोह रही हो॥ २॥
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता । धरति चरन मग चलति सभीता॥ सीय राम पद अंक बराएँ । लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ॥
प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके [जमीनपर अङ्कित होनेवाले दोनों] चरणचिह्नोंके बीच-बीचमें पैर रखती हुई सीताजी [कहीं भगवान्के चरणचिह्नोंपर पैर न टिक जाय इस बातसे] डरती हुई मार्गमें चल रही हैं, और लक्ष्मणजी [मर्यादाकी रक्षाके लिये] सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी दोनोंके चरणचिह्नोंको बचाते हुए उन्हें दाहिने रखकर रास्ता चल रहे हैं॥ ३॥
राम लखन सिय प्रीति सुहाई । बचन अगोचर किमि कहि जाई॥ खग मृग मगन देखि छबि होहीं । लिए चोरि चित राम बटोहीं॥
श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीकी सुन्दर प्रीति वाणीका विषय नहीं है (अर्थात् अनिर्वचनीय है), अतः वह कैसे कही जा सकती है? पक्षी और पशु भी उस छविको देखकर (प्रेमानन्दमें) मग्न हो जाते हैं। पथिकरूप श्रीरामचन्द्रजीने उनके भी चित्त चुरा लिये हैं॥ ४॥
दो०—जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ ।
भव मगु अगमु अनंदु तेड़ बिनु श्रम रहे सिराइ॥ १२३॥
ज्यारे पथिक सीताजीसहित दोनों भाइयोंको जिन-जिन लोगोंने देखा, उन्होंने भवका अगम मार्ग (जन्म-मृत्युरूपी संसारमें भटकनेका भयानक मार्ग) बिना ही परिश्रम आनन्दके साथ तै कर लिया (अर्थात् वे आवागमनके चक्रसे सहज ही छूटकर मुक्त हो गये)॥ १२३॥
अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ । बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ॥ राम धाम पथ पाइहि सोई । जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई॥
आज भी जिसके हृदयमें स्वप्नमें भी कभी लक्ष्मण, सीता, राम तीनों बटोही आ बसें, तो वह भी श्रीरामजीके परमधामके उस मार्गको पा जायगा जिस मार्गको कभी कोई बिरले ही मुनि पाते हैं॥ १॥
तब रघुबीर श्रमित सिय जानी । देखि निकट बटु सीतल पानी॥ तहँ बसि कंद मूल फल खाई । प्रात नहाइ चले रघुराई॥
तब श्रीरामचन्द्रजी सीताजीको थकी हुई जानकर और समीप ही एक बड़का वृक्ष और ठंडा पानी देखकर उस दिन वहीं ठहर गये। कन्द, मूल, फल खाकर [रातभर वहाँ रहकर] प्रातःकाल स्नान करके श्रीरघुनाथजी आगे चले॥ २॥
- अयोध्याकाण्ड *
४४७
देखत बन सर सैल सुहाए । बालमीकि आश्रम प्रभु आए ॥ राम दीरख मुनि बासु सुहावन । सुंदर गिरि काननु जलु पावन ॥
सुन्दर वन, तालाब और पर्वत देखते हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी वाल्मीकिजीके आश्रममें आये। श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि मुनिका निवासस्थान बहुत सुन्दर है, जहाँ सुन्दर पर्वत, वन और पवित्र जल है ॥ ३ ॥
सरनि सरोज बिटप बन फूले । गुंजत मंजु मधुप रस भूले ॥ खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं । बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥
सरोवरोंमें कमल और वनोंमें वृक्ष फूल रहे हैं और मकरन्द-रसमें मस्त हुए भौर सुन्दर गुंजार कर रहे हैं। बहुत-से पक्षी और पशु कोलाहल कर रहे हैं और वैरसे रहित होकर प्रसन्न मनसे विचर रहे हैं ॥ ४ ॥
दो०— सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन । मुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन ॥ १२४ ॥
पवित्र और सुन्दर आश्रमको देखकर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी हर्षित हुए। रघुश्रेष्ठ श्रीरामजीका आगमन सुनकर मुनि वाल्मीकिजी उन्हें लेनेके लिये आगे आये ॥ १२४ ॥
मुनि कहूँ राम दंडवत कीन्हा । आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा ॥ देखि राम छवि नयन जुड़ाने । करि सनमानु आश्रमहिं आने ॥
श्रीरामचन्द्रजीने मुनिको दण्डवत् किया। विप्रश्रेष्ठ मुनिने उन्हें आशीर्वाद दिया। श्रीरामचन्द्रजीकी छवि देखकर मुनिके नेत्र शीतल हो गये। सम्मानपूर्वक मुनि उन्हें आश्रममें ले आये ॥ १ ॥
मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए । कंद मूल फल मधुर मगाए ॥ सिय सौमित्रि राम फल खाए । तब मुनि आश्रम दिए सुहाए ॥
श्रेष्ठ मुनि वाल्मीकिजीने प्राणप्रिय अतिथियोंको पाकर उनके लिये मधुर कन्द, मूल और फल मँगावाये। श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और रामचन्द्रजीने फलोंको खाया। तब मुनिने उनको [विश्राम करनेके लिये] सुन्दर स्थान बतला दिये ॥ २ ॥
बालमीकि मन आनँदु भारी । मंगल मूर्ति नयन निहारी ॥ तब कर कमल जोरि रघुराई । बोले बचन श्रवन सुखदाई ॥
[मुनि श्रीरामजीके पास बैठे हैं और उनकी] मङ्गल-मूर्तिको नेत्रोंसे देखकर वाल्मीकिजीके मनमें बड़ा भारी आनन्द हो रहा है। तब श्रीरघुनाथजी कमलसदृश हाथोंको जोड़कर, कानोंको सुख देनेवाले मधुर वचन बोले— ॥ ३ ॥
४४८
- रामचरितमानस *
तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा । बिस्व बदर जिमि तुम्हरेँ हाथा ॥ अस कहि प्रभु सब कथा बखानी । जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी ॥
हे मुनिनाथ! आप त्रिकालदर्शी हैं। सम्पूर्ण विश्व आपके लिये हथेलीपर रखे हुए बेरके समान हैं। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने ऐसा कहकर फिर जिस-जिस प्रकारसे रानी कैकेयीने वनवास दिया, वह सब कथा विस्तारसे सुनायी ॥ ४ ॥
दो०— तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।
मो कहँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ ॥ १२५ ॥
[और कहा—] हे प्रभो! पिताकी आज्ञा [का पालन], माताका हित और भरत-जैसे [स्नेही एवं धर्मात्मा] भाईका राजा होना और फिर मुझे आपके दर्शन होना, यह सब मेरे पुण्योंका प्रभाव है ॥ १२५ ॥
देखि पाय मुनिराय तुम्हारे । भए सुकृत सब सुफल हमारे ॥ अब जहँ राउर आयसु होई । मुनि उदबेगु न पावै कोई ॥
हे मुनिराज! आपके चरणोंका दर्शन करनेसे आज हमारे सब पुण्य सफल हो गये (हमें सारे पुण्योंका फल मिल गया)। अब जहाँ आपकी आज्ञा हो और जहाँ कोई भी मुनि उद्वेगको प्राप्त न हो— ॥ १ ॥
मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं । ते नरेस बिनु पावक दहहीं ॥ मंगल मूल बिप्र परितोषू । दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू ॥
क्योंकि जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्निके ही (अपने दुष्ट कर्मोंसे ही) जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणोंका संतोष सब मङ्गलोंकी जड़ है और भूदेव ब्राह्मणोंका क्रोध करोड़ों कुलोंको भस्म कर देता है ॥ २ ॥
अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ । सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ ॥ तहँ रचि रुचिर परन तून साला । बासु करौँ कछु काल कृपाला ॥
ऐसा हृदयमें समझकर—वह स्थान बतलाइये जहाँ मैं लक्ष्मण और सीतासहित जाऊँ। और वहाँ सुन्दर पत्तों और घासकी कुटी बनाकर, हे दयालु! कुछ समय निवास करूँ ॥ ३ ॥
सहज सरल सुनि रघुबर बानी । साधु साधु बोले मुनि ग्यानी ॥ कस न कहहु अस रघुकुलकेतू । तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू ॥
श्रीरामजीकी सहज ही सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि वाल्मीकि बोले—धन्य! धन्य! हे रघुकुलके ध्वजास्वरूप! आप ऐसा क्यों न कहेंगे? आप सदैव वेदकी मर्यादाका पालन (रक्षण) करते हैं ॥ ४ ॥