श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 444, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
तबहिं लखन रघुबर रुख जानी । पूछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी ॥ सुनत नारि नर भए दुखारी । पुलकित गात बिलोचन बारी ॥
उसी समय श्रीरामचन्द्रजीका रुख जानकर लक्ष्मणजीने कोमल वाणीसे लोगोंसे रास्ता पूछा । यह सुनते ही स्त्री-पुरुष दुःखी हो गये । उनके शरीर पुलकित हो गये और नेत्रोंमें [वियोगकी सम्भावनासे प्रेमका] जल भर आया ॥ ३ ॥
मिटा मोदु मन भए मलीने । बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने ॥ समुझि करम गति धीरजु कीन्हा । सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा ॥
उनका आनन्द मिट गया और मन ऐसे उदास हो गये मानो विधाता दी हुई सम्पत्ति छीने लेता हो । कर्मकी गति समझकर उन्होंने धैर्य धारण किया और अच्छी तरह निर्णय करके सुगम मार्ग बतला दिया ॥ ४ ॥
दो०—लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ ।
फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाड़ मन साथ ॥ ११८ ॥
तब लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित श्रीरघुनाथजीने गमन किया और सब लोगोंको प्रिय बचन कहकर लौटाया, किन्तु उनके मनोंको अपने साथ ही लगा लिया ॥ ११८ ॥
फिरत नारि नर अति पछिताहीं । दैअहि दोषु देहिं मन माहीं ॥ सहित बिषाद परसपर कहहीं । बिधि करतब उलटे सब अहहीं ॥
लौटते हुए वे स्त्री-पुरुष बहुत ही पछताते हैं और मन-ही-मन दैवको दोष देते हैं । परस्पर [बड़े ही] विषादके साथ कहते हैं कि विधाताके सभी काम उलटे हैं ॥ १ ॥
निपट निरंकुस निठुर निसंकू । जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू ॥ रुख कलपतरु सागरु खारा । तेहिं पठए बन राजकुमारा ॥
वह विधाता बिलकुल निरंकुश (स्वतन्त्र), निर्दय और निडर है, जिसने चन्द्रमाको रोगी (घटने-बढ़नेवाला) और कलंकी बनाया, कल्पवृक्षको पेड़ और समुद्रको खारा बनाया । उसीने इन राजकुमारोंको वनमें भेजा है ॥ २ ॥
जों पै इन्हहि दीन्ह बनबासू । कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू ॥ ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना । रचे बादि बिधि बाहन नाना ॥
जब विधाताने इनको वनवास दिया है, तब उसने भोग-विलास व्यर्थ ही बनाये । जब ये बिना जूतेके (नंगे ही पैरों) रास्तेमें चल रहे हैं, तब विधाता अनेकों वाहन (सवारियाँ) व्यर्थ ही रचे ॥ ३ ॥
ए महि परहिं डासि कुस पाता । सुभग सेज कत सृजत बिधाता ॥ तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा । धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा ॥