भारतकोश
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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

४४२

  • रामचरितमानस *

तबहिं लखन रघुबर रुख जानी । पूछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी ॥ सुनत नारि नर भए दुखारी । पुलकित गात बिलोचन बारी ॥

उसी समय श्रीरामचन्द्रजीका रुख जानकर लक्ष्मणजीने कोमल वाणीसे लोगोंसे रास्ता पूछा । यह सुनते ही स्त्री-पुरुष दुःखी हो गये । उनके शरीर पुलकित हो गये और नेत्रोंमें [वियोगकी सम्भावनासे प्रेमका] जल भर आया ॥ ३ ॥

मिटा मोदु मन भए मलीने । बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने ॥ समुझि करम गति धीरजु कीन्हा । सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा ॥

उनका आनन्द मिट गया और मन ऐसे उदास हो गये मानो विधाता दी हुई सम्पत्ति छीने लेता हो । कर्मकी गति समझकर उन्होंने धैर्य धारण किया और अच्छी तरह निर्णय करके सुगम मार्ग बतला दिया ॥ ४ ॥

दो०—लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ ।

फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाड़ मन साथ ॥ ११८ ॥

तब लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित श्रीरघुनाथजीने गमन किया और सब लोगोंको प्रिय बचन कहकर लौटाया, किन्तु उनके मनोंको अपने साथ ही लगा लिया ॥ ११८ ॥

फिरत नारि नर अति पछिताहीं । दैअहि दोषु देहिं मन माहीं ॥ सहित बिषाद परसपर कहहीं । बिधि करतब उलटे सब अहहीं ॥

लौटते हुए वे स्त्री-पुरुष बहुत ही पछताते हैं और मन-ही-मन दैवको दोष देते हैं । परस्पर [बड़े ही] विषादके साथ कहते हैं कि विधाताके सभी काम उलटे हैं ॥ १ ॥

निपट निरंकुस निठुर निसंकू । जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू ॥ रुख कलपतरु सागरु खारा । तेहिं पठए बन राजकुमारा ॥

वह विधाता बिलकुल निरंकुश (स्वतन्त्र), निर्दय और निडर है, जिसने चन्द्रमाको रोगी (घटने-बढ़नेवाला) और कलंकी बनाया, कल्पवृक्षको पेड़ और समुद्रको खारा बनाया । उसीने इन राजकुमारोंको वनमें भेजा है ॥ २ ॥

जों पै इन्हहि दीन्ह बनबासू । कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू ॥ ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना । रचे बादि बिधि बाहन नाना ॥

जब विधाताने इनको वनवास दिया है, तब उसने भोग-विलास व्यर्थ ही बनाये । जब ये बिना जूतेके (नंगे ही पैरों) रास्तेमें चल रहे हैं, तब विधाता अनेकों वाहन (सवारियाँ) व्यर्थ ही रचे ॥ ३ ॥

ए महि परहिं डासि कुस पाता । सुभग सेज कत सृजत बिधाता ॥ तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा । धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४४३

जब ये कुश और पते बिछाकर जमीनपर ही पड़े रहते हैं, तब विधाता सुन्दर सेज (पलंग और बिछौने) किसलिये बनाता है? विधाताने जब इनको बड़े-बड़े पेड़ों [के नीचे] का निवास दिया, तब उज्ज्वल महलोंको बना-बनाकर उसने व्यर्थ ही परिश्रम किया ॥ ४ ॥

दो०— जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार।

बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार ॥ ११९ ॥

जो ये सुन्दर और अत्यन्त सुकुमार होकर मुनियोंके (बल्कल) वस्त्र पहनते और जटा धारण करते हैं, तो फिर करतार (विधाता) ने भाँति-भाँतिके गहने और कपड़े वृथा ही बनाये ॥ ११९ ॥

जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं ॥ एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए ॥

जो ये कन्द, मूल, फल खाते हैं तो जगत्में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं। कोई एक कहते हैं—ये स्वभावसे ही सुन्दर हैं [इनका सौन्दर्य-माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है]। ये अपने-आप प्रकट हुए हैं, ब्रह्माके बनाये नहीं हैं ॥ १ ॥

जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी ॥ देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी ॥

हमारे कानों, नेत्रों और मनके द्वारा अनुभवमें आनेवाली विधाताकी करनीको जहाँतक वेदोंने वर्णन करके कहा है, वहाँतक चौदहों लोकोंमें दृढ़ देखो, ऐसे पुरुष और ऐसी स्त्रियाँ कहाँ हैं? [कहीं भी नहीं हैं, इसीसे सिद्ध है कि ये विधाताके चौदहों लोकोंसे अलग हैं और अपनी महिमासे ही आप निर्मित हुए हैं] ॥ २ ॥

इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा ॥ कीन्ह बहुत श्रम एक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए ॥

इन्हें देखकर विधाताका मन अनुरक्त (मुग्ध) हो गया, तब वह भी इन्हींकी उपमाके योग्य दूसरे स्त्री-पुरुष बनाने लगा। उसने बहुत परिश्रम किया, परन्तु कोई उसकी अटकलमें ही नहीं आये (पूरे नहीं उतरे)। इसी ईर्ष्याके मारे उसने इनको जंगलमें लाकर छिपा दिया है ॥ ३ ॥

एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं ॥ ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे ॥

कोई एक कहते हैं—हम बहुत नहीं जानते। हाँ, अपनेको परम धन्य अवश्य मानते हैं [जो इनके दर्शन कर रहे हैं] और हमारी समझमें वे भी बड़े पुण्यवान् हैं जिन्होंने इनको देखा है, जो देख रहे हैं और जो देखेंगे ॥ ४ ॥

४४४

  • रामचरितमानस *

दो०—एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर ।

किमि चलिहहिं मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर ॥ १२० ॥

इस प्रकार प्रिय वचन कह-कहकर सब नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर लेते हैं और कहते हैं कि ये अत्यन्त सुकुमार शरीरवाले दुर्गम (कठिन) मार्गमें कैसे चलेंगे ॥ १२० ॥

नारि सनेह बिकल बस होहीं । चकई साँझ समय जनु सोहीं ॥ मृदु पद कमल कठिन मगु जानी । गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी ॥

स्त्रियाँ स्नेहवश विकल हो जाती हैं। मानो सन्ध्याके समय चकवी [भावी वियोगकी पीड़ासे] सोह रही हों (दुखी हो रही हों)। इनके चरणकमलोंको कोमल तथा मार्गको कठोर जानकर वे व्यथित हृदयसे उत्तम वाणी कहती हैं—॥ १ ॥

परसत मृदुल चरन अरुनारे । सकुचति महि जिमि हृदय हमारे ॥ जौँ जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा । कस न सुमनमय मारगु कीन्हा ॥

इनके कोमल और लाल-लाल चरणों (तलवों) को छूते ही पृथ्वी वैसे ही सकुचा जाती है जैसे हमारे हृदय सकुचा रहे हैं। जगदीश्वरने यदि इन्हें वनवास ही दिया, तो सारे रास्तेको पुष्पमय क्यों नहीं बना दिया? ॥ २ ॥

जौँ मागा पाइअ बिधि पाहीं । ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं ॥ जे नर नारि न अवसर आए । तिन्ह सिय रामु न देखन पाए ॥

यदि ब्रह्मासे माँगे मिले तो हे सखि! [हम तो उनसे माँगकर] इन्हें अपनी आँखोंमें ही रखें! जो स्त्री-पुरुष इस अवसरपर नहीं आये, वे श्रीसीतारामजीको नहीं देख सके ॥ ३ ॥

सुनि सुरुपु बूझहिं अकुलाई । अब लगि गए कहाँ लगि भाई ॥ समरथ धाइ बिलोकहिं जाई । प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई ॥

उनके सौन्दर्यको सुनकर वे व्याकुल होकर पूछते हैं कि भाई! अबतक वे कहाँतक गये होंगे? और जो समर्थ हैं वे दौड़ते हुए जाकर उनके दर्शन कर लेते हैं और जन्मका परम फल पाकर, विशेष आनन्दित होकर लौटते हैं ॥ ४ ॥

दो०—अबला बालक बूद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं ।

होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहाँ जाहिं ॥ १२१ ॥

[गर्भवती, प्रसूता आदि] अबला स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े [दर्शन न पानेसे] हाथ मलते और पछताते हैं। इस प्रकार जहाँ-जहाँ श्रीरामचन्द्रजी जाते हैं, वहाँ-वहाँ लोग प्रेमके वशमें हो जाते हैं ॥ १२१ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४४५

गावँ गावँ अस होइ अनंदू । देखि भानुकुल कैरव चंदू॥ जे कछु समाचार सुनि पावहिं । ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं॥

सूर्यकुलरूपी कुमुदिनीके प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमास्वरूप श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकर गाँव-गाँवमें ऐसा ही आनन्द हो रहा है। जो लोग [वनवास दिये जानेका] कुछ भी समाचार सुन पाते हैं, वे राजा-रानी [दशरथ-कैकेयी] को दोष लगाते हैं ॥ १ ॥

कहहिं एक अति भल नरनाहू । दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू॥ कहहिं परसपर लोग लोगाई । बातें सरल सनेह सुहाई॥

कोई एक कहते हैं कि राजा बहुत ही अच्छे हैं, जिन्होंने हमें अपने नेत्रोंका लाभ दिया। स्त्री-पुरुष सभी आपसमें सीधी, स्नेहभरी सुन्दर बातें कह रहे हैं ॥ २ ॥

ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए । धन्य सो नगर जहाँ तें आए॥ धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ । जहाँ जहाँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ॥

[कहते हैं—] वे माता-पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया। वह नगर धन्य है जहाँसे ये आये हैं। वह देश, पर्वत, वन और गाँव धन्य है, और वही स्थान धन्य है जहाँ-जहाँ ये जाते हैं ॥ ३ ॥

सुखु पायउ बिरंचि रचि तेही । ए जेहि के सब भाँति सनेही॥ राम लखन पथि कथा सुहाई । रही सकल मग कानन छाई॥

ब्रह्माने उसीको रचकर सुख पाया है जिसके ये (श्रीरामचन्द्रजी) सब प्रकारसे स्नेही हैं। पथिकरूप श्रीराम-लक्ष्मणकी सुन्दर कथा सारे रास्ते और जंगलमें छा गयी है ॥ ४ ॥

दो०— एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत । जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत ॥ १२२ ॥

रघुकुलरूपी कमलके खिलावेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार मार्गिके लोगोंको सुख देते हुए सीताजी और लक्ष्मणजीसहित वनको देखते हुए चले जा रहे हैं ॥ १२२ ॥

आगें रामु लखनु बने पाछें । तापस बेष बिराजत काछें॥ उभय बीच सिय सोहति कैसें । ब्रह्म जीव बिच माया जैसें॥

आगे श्रीरामजी हैं, पीछे लक्ष्मणजी सुशोभित हैं। तपस्वियोंके वेष बनाये दोनों बड़ी ही शोभा पा रहे हैं। दोनोंके बीचमें सीताजी कैसी सुशोभित हो रही हैं, जैसे ब्रह्म और जीवके बीचमें माया! ॥ १ ॥

बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई । जनु मधु मदन मध्य रति लसई॥ उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही । जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही॥

४४६

  • रामचरितमानस *

फिर जैसी छबि मेरे मनमें बस रही है, उसको कहता हूँ—मानो वसन्त-ऋतु और कामदेवके बीचमें रति (कामदेवकी स्त्री) शोभित हो। फिर अपने हृदयमें खोजकर उपमा कहता हूँ कि मानो बुध (चन्द्रमाके पुत्र) और चन्द्रमाके बीचमें रोहिणी (चन्द्रमाकी स्त्री) सोह रही हो॥ २॥

प्रभु पद रेख बीच बिच सीता । धरति चरन मग चलति सभीता॥ सीय राम पद अंक बराएँ । लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके [जमीनपर अङ्कित होनेवाले दोनों] चरणचिह्नोंके बीच-बीचमें पैर रखती हुई सीताजी [कहीं भगवान्के चरणचिह्नोंपर पैर न टिक जाय इस बातसे] डरती हुई मार्गमें चल रही हैं, और लक्ष्मणजी [मर्यादाकी रक्षाके लिये] सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी दोनोंके चरणचिह्नोंको बचाते हुए उन्हें दाहिने रखकर रास्ता चल रहे हैं॥ ३॥

राम लखन सिय प्रीति सुहाई । बचन अगोचर किमि कहि जाई॥ खग मृग मगन देखि छबि होहीं । लिए चोरि चित राम बटोहीं॥

श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीकी सुन्दर प्रीति वाणीका विषय नहीं है (अर्थात् अनिर्वचनीय है), अतः वह कैसे कही जा सकती है? पक्षी और पशु भी उस छविको देखकर (प्रेमानन्दमें) मग्न हो जाते हैं। पथिकरूप श्रीरामचन्द्रजीने उनके भी चित्त चुरा लिये हैं॥ ४॥

दो०—जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ ।

भव मगु अगमु अनंदु तेड़ बिनु श्रम रहे सिराइ॥ १२३॥

ज्यारे पथिक सीताजीसहित दोनों भाइयोंको जिन-जिन लोगोंने देखा, उन्होंने भवका अगम मार्ग (जन्म-मृत्युरूपी संसारमें भटकनेका भयानक मार्ग) बिना ही परिश्रम आनन्दके साथ तै कर लिया (अर्थात् वे आवागमनके चक्रसे सहज ही छूटकर मुक्त हो गये)॥ १२३॥

अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ । बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ॥ राम धाम पथ पाइहि सोई । जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई॥

आज भी जिसके हृदयमें स्वप्नमें भी कभी लक्ष्मण, सीता, राम तीनों बटोही आ बसें, तो वह भी श्रीरामजीके परमधामके उस मार्गको पा जायगा जिस मार्गको कभी कोई बिरले ही मुनि पाते हैं॥ १॥

तब रघुबीर श्रमित सिय जानी । देखि निकट बटु सीतल पानी॥ तहँ बसि कंद मूल फल खाई । प्रात नहाइ चले रघुराई॥

तब श्रीरामचन्द्रजी सीताजीको थकी हुई जानकर और समीप ही एक बड़का वृक्ष और ठंडा पानी देखकर उस दिन वहीं ठहर गये। कन्द, मूल, फल खाकर [रातभर वहाँ रहकर] प्रातःकाल स्नान करके श्रीरघुनाथजी आगे चले॥ २॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४४७

देखत बन सर सैल सुहाए । बालमीकि आश्रम प्रभु आए ॥ राम दीरख मुनि बासु सुहावन । सुंदर गिरि काननु जलु पावन ॥

सुन्दर वन, तालाब और पर्वत देखते हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी वाल्मीकिजीके आश्रममें आये। श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि मुनिका निवासस्थान बहुत सुन्दर है, जहाँ सुन्दर पर्वत, वन और पवित्र जल है ॥ ३ ॥

सरनि सरोज बिटप बन फूले । गुंजत मंजु मधुप रस भूले ॥ खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं । बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥

सरोवरोंमें कमल और वनोंमें वृक्ष फूल रहे हैं और मकरन्द-रसमें मस्त हुए भौर सुन्दर गुंजार कर रहे हैं। बहुत-से पक्षी और पशु कोलाहल कर रहे हैं और वैरसे रहित होकर प्रसन्न मनसे विचर रहे हैं ॥ ४ ॥

दो०— सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन । मुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन ॥ १२४ ॥

पवित्र और सुन्दर आश्रमको देखकर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी हर्षित हुए। रघुश्रेष्ठ श्रीरामजीका आगमन सुनकर मुनि वाल्मीकिजी उन्हें लेनेके लिये आगे आये ॥ १२४ ॥

मुनि कहूँ राम दंडवत कीन्हा । आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा ॥ देखि राम छवि नयन जुड़ाने । करि सनमानु आश्रमहिं आने ॥

श्रीरामचन्द्रजीने मुनिको दण्डवत् किया। विप्रश्रेष्ठ मुनिने उन्हें आशीर्वाद दिया। श्रीरामचन्द्रजीकी छवि देखकर मुनिके नेत्र शीतल हो गये। सम्मानपूर्वक मुनि उन्हें आश्रममें ले आये ॥ १ ॥

मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए । कंद मूल फल मधुर मगाए ॥ सिय सौमित्रि राम फल खाए । तब मुनि आश्रम दिए सुहाए ॥

श्रेष्ठ मुनि वाल्मीकिजीने प्राणप्रिय अतिथियोंको पाकर उनके लिये मधुर कन्द, मूल और फल मँगावाये। श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और रामचन्द्रजीने फलोंको खाया। तब मुनिने उनको [विश्राम करनेके लिये] सुन्दर स्थान बतला दिये ॥ २ ॥

बालमीकि मन आनँदु भारी । मंगल मूर्ति नयन निहारी ॥ तब कर कमल जोरि रघुराई । बोले बचन श्रवन सुखदाई ॥

[मुनि श्रीरामजीके पास बैठे हैं और उनकी] मङ्गल-मूर्तिको नेत्रोंसे देखकर वाल्मीकिजीके मनमें बड़ा भारी आनन्द हो रहा है। तब श्रीरघुनाथजी कमलसदृश हाथोंको जोड़कर, कानोंको सुख देनेवाले मधुर वचन बोले— ॥ ३ ॥

४४८

  • रामचरितमानस *

तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा । बिस्व बदर जिमि तुम्हरेँ हाथा ॥ अस कहि प्रभु सब कथा बखानी । जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी ॥

हे मुनिनाथ! आप त्रिकालदर्शी हैं। सम्पूर्ण विश्व आपके लिये हथेलीपर रखे हुए बेरके समान हैं। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने ऐसा कहकर फिर जिस-जिस प्रकारसे रानी कैकेयीने वनवास दिया, वह सब कथा विस्तारसे सुनायी ॥ ४ ॥

दो०— तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।

मो कहँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ ॥ १२५ ॥

[और कहा—] हे प्रभो! पिताकी आज्ञा [का पालन], माताका हित और भरत-जैसे [स्नेही एवं धर्मात्मा] भाईका राजा होना और फिर मुझे आपके दर्शन होना, यह सब मेरे पुण्योंका प्रभाव है ॥ १२५ ॥

देखि पाय मुनिराय तुम्हारे । भए सुकृत सब सुफल हमारे ॥ अब जहँ राउर आयसु होई । मुनि उदबेगु न पावै कोई ॥

हे मुनिराज! आपके चरणोंका दर्शन करनेसे आज हमारे सब पुण्य सफल हो गये (हमें सारे पुण्योंका फल मिल गया)। अब जहाँ आपकी आज्ञा हो और जहाँ कोई भी मुनि उद्वेगको प्राप्त न हो— ॥ १ ॥

मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं । ते नरेस बिनु पावक दहहीं ॥ मंगल मूल बिप्र परितोषू । दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू ॥

क्योंकि जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्निके ही (अपने दुष्ट कर्मोंसे ही) जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणोंका संतोष सब मङ्गलोंकी जड़ है और भूदेव ब्राह्मणोंका क्रोध करोड़ों कुलोंको भस्म कर देता है ॥ २ ॥

अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ । सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ ॥ तहँ रचि रुचिर परन तून साला । बासु करौँ कछु काल कृपाला ॥

ऐसा हृदयमें समझकर—वह स्थान बतलाइये जहाँ मैं लक्ष्मण और सीतासहित जाऊँ। और वहाँ सुन्दर पत्तों और घासकी कुटी बनाकर, हे दयालु! कुछ समय निवास करूँ ॥ ३ ॥

सहज सरल सुनि रघुबर बानी । साधु साधु बोले मुनि ग्यानी ॥ कस न कहहु अस रघुकुलकेतू । तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू ॥

श्रीरामजीकी सहज ही सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि वाल्मीकि बोले—धन्य! धन्य! हे रघुकुलके ध्वजास्वरूप! आप ऐसा क्यों न कहेंगे? आप सदैव वेदकी मर्यादाका पालन (रक्षण) करते हैं ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४४९

छं०—श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी। जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाड़ कृपानिधान की ॥ जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी। सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी ॥

हे राम! आप वेदकी मर्यादाके रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी [आपकी स्वरूपभूता] माया हैं, जो कृपाके भण्डार आपकी रुख पाकर जगत्का सृजन, पालन और संहार करती हैं। जो हजार मस्तकवाले सर्पोंके स्वामी और पृथ्वीको अपने सिरपर धारण करनेवाले हैं, वही चराचरके स्वामी शेषजी लक्ष्मण हैं। देवताओंके कार्यके लिये आप राजाका शरीर धारण करके दुष्ट राक्षसोंकी सेनाका नाश करनेके लिये चले हैं।

सो०—राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर। अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ॥ १२६ ॥

हे राम! आपका स्वरूप वाणीके अगोचर, बुद्धिसे परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है। वेद निरन्तर उसका 'नेति-नेति' कहकर वर्णन करते हैं ॥ १२६ ॥

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे ॥ तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हि को जाननिहारा ॥

हे राम! जगत् दृश्य है, आप उसके देखनेवाले हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु और शङ्करको भी नचानेवाले हैं। जब वे भी आपके मर्मको नहीं जानते, तब और कौन आपको जाननेवाला है? ॥ १ ॥

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हि तुम्हइ होइ जाई ॥ तुम्हरिहि कृपां तुम्हि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन ॥

वही आपको जानता है जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनन्दन! हे भक्तोंके हृदयके शीतल करनेवाले चन्दन! आपकी ही कृपासे भक्त आपको जान पाते हैं ॥ २ ॥

चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी ॥ नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा ॥

आपकी देह चिदानन्दमय है (यह प्रकृतियज्ञ पञ्चमहाभूतोंकी बनी हुई कर्मबन्धनयुक्त, त्रिदेह-विशिष्ट मायिक नहीं है) और [उत्पत्ति-नाश, वृद्धि-क्षय आदि] सब विकारोंसे रहित है; इस रहस्यको अधिकारी पुरुष ही जानते हैं। आपने देवता और संतोंके कार्यके लिये [दिव्य] नर-शरीर धारण किया है और प्राकृत (प्रकृतिके तत्त्वोंसे निर्मित देहवाले, साधारण) राजाओंकी तरहसे कहते और करते हैं ॥ ३ ॥

४५०

  • रामचरितमानस *

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे । जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ॥ तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा । जस काछिअ तस चाहिअ नाचा ॥

हे राम! आपके चरित्रोंको देख और सुनकर मूर्ख लोग तो मोहको प्राप्त होते हैं और ज्ञानीजन सुखी होते हैं। आप जो कुछ कहते, करते हैं, वह सब सत्य (उचित) ही है; क्योंकि जैसा स्वाँग भरे वैसा ही नाचना भी तो चाहिये (इस समय आप मनुष्यरूपमें हैं, अतः मनुष्योचित व्यवहार करना ठीक ही है) ॥ ४ ॥

दो०— पूँछेहु मोहि कि रहौं कहैं मैं पूँछत सकुचाउँ । जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ ॥ १२७ ॥

आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ? परन्तु मैं यह पूछते सकुचाता हूँ कि जहाँ आप न हों, वह स्थान बता दीजिये। तब मैं आपके रहनेके लिये स्थान दिखाऊँ ॥ १२७ ॥

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने । सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने ॥ बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी । बानी मधुर अमिअ रस बोरी ॥

मुनिके प्रेमरससे सने हुए वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी [रहस्य खुल जानेके डरसे] सकुचाकर मनमें मुसकराये। बालमीकिजी हँसकर फिर अमृत-रसमें डुबोयी हुई मीठी वाणी बोले— ॥ १ ॥

सुनहु राम अब कहउँ निकेता । जहाँ बसहु सिय लखन समेता ॥ जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना । कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना ॥

हे रामजी! सुनिये, अब मैं वे स्थान बताता हूँ जहाँ आप सीताजी और लक्ष्मणजी-समेत निवास करिये। जिनके कान समुद्रकी भाँति आपकी सुन्दर कथारूपी अनेकों सुन्दर नदियोंसे— ॥ २ ॥

भरहिं निरंतर होहिं न पूरे । तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे ॥ लोचन चातक जिन्ह करि राखे । रहहिं दरस जलधर अभिलाषे ॥

निरन्तर भरते रहते हैं, परन्तु कभी पूरे (तृप्त) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिये सुन्दर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रोंको चातक बना रखा है, जो आपके दर्शनरूपी मेघके लिये सदा लालायित रहते हैं; ॥ ३ ॥

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी । रूप बिंदु जल होहिं सुखारी ॥ तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक । बसहु बंधु सिय सह रघुनायक ॥

तथा जो भारी-भारी नदियों, समुद्रों और झीलोंका निरादर करते हैं और आपके सौन्दर्य [रूपी मेघ] के एक बूँद जलसे सुखी हो जाते हैं (अर्थात् आपके दिव्य सच्चिदानन्दमय स्वरूपके किसी एक अङ्गकी जरा-सी भी झोंकीके सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत्के, अर्थात् पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोकतकके सौन्दर्यका तिरस्कार करते हैं), हे रघुनाथजी! उन लोगोंके हृदयरूपी सुखदायी भवनोंमें आप भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित निवास कीजिये ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४५१

दो०—जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।

मुक्ताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु॥ १२८॥

आपके यशरूपी निर्मल मानसरोवरमें जिसकी जीभ हंसिनी बनी हुई आपके गुणसमूहरूपी मोतियोंको चुगती रहती है, हे रामजी! आप उसके हृदयमें बसिये॥ १२८॥

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा । सादर जासु लहइ नित नासा॥ तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं । प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥

जिसकी नासिका प्रभु (आप) के पवित्र और सुगन्धित [पुष्पादि] सुन्दर प्रसादको नित्य आदरेके साथ ग्रहण करती (सूँघती) है, और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसादरूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं;॥ १॥

सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी । प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी॥ कर नित करहिं राम पद पूजा । राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा॥

जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणोंको देखकर बड़ी नम्रताके साथ प्रेमसहित झुक जाते हैं; जिनके हाथ नित्य श्रीरामचन्द्रजी (आप) के चरणोंकी पूजा करते हैं, और जिनके हृदयमें श्रीरामचन्द्रजी (आप) का ही भरोसा है, दूसरा नहीं;॥ २॥

चरन राम तीरथ चलि जाहीं । राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥ मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा । पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा॥

तथा जिनके चरण श्रीरामचन्द्रजी (आप) के तीर्थोंमें चलकर जाते हैं; हे रामजी! आप उनके मनमें निवास कीजिये। जो नित्य आपके [रामनामरूप] मंत्रराजको जपते हैं और परिवार (परिकर)-सहित आपकी पूजा करते हैं॥ ३॥

तरपन होम करहिं बिधि नाना । बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना॥ तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी । सकल भायँ सेवहिं सनमानी॥

जो अनेकों प्रकारसे तर्पण और हवन करते हैं, तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराकर बहुत दान देते हैं; तथा जो गुरुको हृदयमें आपसे भी अधिक (बड़ा) जानकर सर्वभावसे सम्मान करके उनकी सेवा करते हैं;॥ ४॥

दो०—सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।

तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥ १२९॥

और ये सब कर्म करके सबका एकमात्र यही फल माँगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें हमारी प्रीति हो; उन लोगोंके मनरूपी मन्दिरोंमें सीताजी और रघुकुलको आनन्दित करनेवाले आप दोनों बसिये॥ १२९॥

४५२

  • रामचरितमानस *

काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥ जिन्ह कें कपट दंभ नहीं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥

जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है; न लोभ है, न क्षोभ है; न राग है, न द्वेष है; और न कपट, दम्भ और माया ही है—हे रघुराज! आप उनके हृदयमें निवास कीजिये॥ १ ॥

सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥ कहहिं सत्य प्रिय वचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥

जो सबके प्रिय और सबका हित करनेवाले हैं, जिन्हें दुःख और सुख तथा प्रशंसा (बड़ाई) और गाली (निन्दा) समान हैं, जो विचारकर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं तथा जो जागते-सोते आपकी ही शरण हैं,॥ २ ॥

तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥ जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥

और आपको छोड़कर जिनके दूसरी कोई गति (आश्रय) नहीं है, हे रामजी! आप उनके मनमें बसिये। जो परायी स्त्रीको जन्म देनेवाली माताके समान जानते हैं और पराया धन जिन्हें विषसे भी भारी विष है;॥ ३ ॥

जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥ जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे॥

जो दूसरेकी सम्पत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरेकी विपत्ति देखकर विशेष रूपसे दुःखी होते हैं, और हे रामजी! जिन्हें आप प्राणोंके समान प्यारे हैं, उनके मन आपके रहनेयोग्य शुभ भवन हैं॥ ४ ॥

दो०— स्वामिसखापितुमातुगुरजिन्हकेसबतुम्हतात।

मनमंदिरतिन्हकेंबसहुसीयसहितदोडभात॥ १३०॥

हे तात! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं, उनके मनरूपी मन्दिरमें सीतासहित आप दोनों भाई निवास कीजिये॥ १३०॥

अवगुनतजिसबकेगुनगहहीं। बिप्रधेनुहितसंकटसहहीं॥ नीतिनिपुनजिन्हकड़जगलीका। घरतुम्हारतिन्हकरमनुनीका॥

जो अवगुणोंको छोड़कर सबके गुणोंको ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौके लिये संकट सहते हैं, नीति-निपुणतामें जिनकी जगत्में मर्यादा है, उनका सुन्दर मन आपका घर है॥ १ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४५३

गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा । जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा ॥ राम भगत प्रिय लागहिं जेही । तेहि उर बसहु सहित बैदेही ॥

जो गुणोंको आपका और दोषोंको अपना समझता है, जिसे सब प्रकारसे आपका ही भरोसा है, और रामभक्त जिसे प्यारे लगते हैं, उसके हृदयमें आप सीतासहित निवास कीजिये ॥ २ ॥

जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई । प्रिय परिवार सदन सुखदाई ॥ सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई । तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई ॥

जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देनेवाला घर—सबको छोड़कर जो केवल आपको ही हृदयमें धारण किये रहता है, हे रघुनाथजी! आप उसके हृदयमें रहिये ॥ ३ ॥

सरगु नरकु अपबरगु समाना । जहाँ तहाँ देख धरँ धनु बाना ॥ करम बचन मन राउर चेरा । राम करहु तेहि कँ उर डेरा ॥

स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टिमें समान हैं, क्योंकि वह जहाँ-तहाँ (सब जगह) केवल धनुष-बाण धारण किये आपको ही देखता है; और जो कर्मसे, वचनसे और मनसे आपका दास है, हे रामजी! आप उसके हृदयमें डेरा कीजिये ॥ ४ ॥

दो०—जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुह सन सहज सनेहु ।

बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु ॥ १३१ ॥

जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिये और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मनमें निरन्तर निवास कीजिये; वह आपका अपना घर है ॥ १३१ ॥

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए । बचन सप्रेम राम मन भाए ॥ कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक । आश्रम कहउँ समय सुखदायक ॥

इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजीने श्रीरामचन्द्रजीको घर दिखाये। उनके प्रेमपूर्ण वचन श्रीरामजीके मनको अच्छे लगे। फिर मुनिने कहा—हे सूर्यकुलके स्वामी! सुनिये, अब मैं इस समयके लिये सुखदायक आश्रम कहता हूँ (निवासस्थान बतलाता हूँ) ॥ १ ॥

चित्रकूट गिरि करहु निवासू । तहाँ तुम्हार सब भाँति सुपासू ॥ सैलु सुहावन कानन चारू । करि केहरि मृग बिहग बिहारू ॥

आप चित्रकूट पर्वतपर निवास कीजिये, वहाँ आपके लिये सब प्रकारकी सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुन्दर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियोंका विहारस्थल है ॥ २ ॥

नदी पुनीत पुरान बखानी । अत्रिप्रिया निज तप बल आनी ॥ सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि । जो सब पातक पोतक डाकिनि ॥

४५४

  • रामचरितमानस *

वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणोंने प्रशंसा की है, और जिसको अत्रि ऋषिकी पत्नी अनसूयाजी अपने तपोबलसे लायी थीं। वह गङ्गाजीकी धारा है, उसका मन्दाकिनी नाम है। वह सब पापरूपी बालकोंको खा डालनेके लिये डाकिनी (डाइन) रूप है ॥ ३ ॥

अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं । करहिं जोग जप तप तन कसहीं ॥ चलहु सफल श्रम सब कर करहू । राम देहु गौरव गिरिबरहू ॥

अत्रि आदि बहुत-से श्रेष्ठ मुनि वहाँ निवास करते हैं, जो योग, जप और तप करते हुए शरीरको कसते हैं। हे रामजी! चलिये, सबके परिश्रमको सफल कीजिये और पर्वतश्रेष्ठ चित्रकूटको भी गौरव दीजिये ॥ ४ ॥

दो०—चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ।

आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ ॥ १३२ ॥

महामुनि वाल्मीकिजीने चित्रकूटकी अपरिमित महिमा बखानकर कही। तब सीताजीसहित दोनों भाइयोंने आकर श्रेष्ठ नदी मन्दाकिनीमें स्नान किया ॥ १३२ ॥

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू । करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू ॥ लखन दीख पय उत्तर करारा । चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा ॥

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—लक्ष्मण! बड़ा अच्छा घाट है। अब यहाँ कहीं ठहरनेकी व्यवस्था करो। तब लक्ष्मणजीने पयस्विनी नदीके उत्तरके ऊँचे किनारेको देखा [और कहा कि—] इसके चारों ओर धनुषके-जैसा एक नाला फिरा हुआ है ॥ १ ॥

नदी पनच सर सम दम दाना । सकल कलुष कलि साउज नाना ॥ चित्रकूट जनु अचल अहेरी । चुकड़ न घात मार मुठभेरी ॥

नदी (मन्दाकिनी) उस धनुषकी प्रत्यञ्जा (डोरी) है और शम, दम, दान बाण हैं। कलियुगके समस्त पाप उसके अनेकों हिसक पशु [रूप निशाने] हैं। चित्रकूट ही मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चूकता नहीं, और जो सामनेसे मारता है ॥ २ ॥

अस कहि लखन ठाउँ देखरावा । थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा ॥ रमेउ राम मनु देवन्ह जाना । चले सहित सुर थपति प्रधाना ॥

ऐसा कहकर लक्ष्मणजीने स्थान दिखलाया। स्थानको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने सुख पाया। जब देवताओंने जाना कि श्रीरामचन्द्रजीका मन यहाँ रम गया तब वे देवताओंके प्रधान थवई (मकान बनानेवाले) विश्वकर्माको साथ लेकर चले ॥ ३ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४५५

कोल किरात बेष सब आए । रचे परन तून सदन सुहाए ॥ बरनि न जाहिं मंजु दुड़ साला । एक ललित लघु एक बिसाला ॥

सब देवता कोल-भीलोंके वेषमें आये और उन्होंने [दिव्य] पत्तों और घासोंके सुन्दर घर बना दिये। दो ऐसी सुन्दर कुटियाँ बनायीं जिनका वर्णन नहीं हो सकता। उनमें एक बड़ी सुन्दर छोटी-सी थी और दूसरी बड़ी थी ॥ ४ ॥

दो०—लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।

सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत ॥ १३३ ॥

लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर घास-पत्तोंके घरमें शोभायमान हैं। मानो कामदेव मुनिका वेष धारण करके पत्नी रति और वसन्त-ऋतुके साथ सुशोभित हो ॥ १३३ ॥

मासपारायण, सत्रहवाँ विश्राम

अमर नाग किंनर दिसिपाला । चित्रकूट आए तेहि काला ॥ राम प्रनामु कीन्ह सब काहू । मुदित देव लहि लोचन लाहू ॥

उस समय देवता, नाग, किन्नर और दिव्यपाल चित्रकूटमें आये और श्रीरामचन्द्रजीने सब किसीको प्रणाम किया। देवता नेत्रोंका लाभ पाकर आनन्दित हुए ॥ १ ॥

बरषि सुमन कह देव समाजू । नाथ सनाथ भए हम आजू ॥ करि बिनती दुख दुसह सुनाए । हरषित निज निज सदन सिधाए ॥

फूलोंकी वर्षा करके देवसमाजने कहा—हे नाथ! आज [आपका दर्शन पाकर] हम सनाथ हो गये। फिर बिनती करके उन्होंने अपने दुःसह दुःख सुनाये और [दुःखोंके नाशका आश्वासन पाकर] हर्षित होकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ २ ॥

चित्रकूट रघुनंदनु छाए । समाचार सुनि सुनि मुनि आए ॥ आवत देखि मुदित मुनिबंदा । कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा ॥

श्रीरघुनाथजी चित्रकूटमें आ बसे हैं, यह समाचार सुन-सुनकर बहुत-से मुनि आये। रघुकुलके चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीने मुदित हुई मुनिमण्डलीको आते देखकर दण्डवत् प्रणाम किया ॥ ३ ॥

मुनि रघुबरहि लाड़ उर लेहीं । सुफल होन हित आसिष देहीं ॥ सिय सौमित्रि राम छबि देखहिं । साधन सकल सफल करि लेखहिं ॥

मुनिगण श्रीरामजीको हृदयसे लगा लेते हैं और सफल होनेके लिये आशीर्वाद देते हैं। वे सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखते हैं और अपने सारे साधनोंको सफल हुआ समझते हैं ॥ ४ ॥

४५६

  • रामचरितमानस *

दो०—जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।

करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद ॥ १३४ ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने यथायोग्य सम्मान करके मुनिमण्डलीको विदा किया। [श्रीरामचन्द्रजीके आ जानेसे] वे सब अपने-अपने आश्रमोंमें अब स्वतन्त्रताके साथ योग, जप, यज्ञ और तप करने लगे ॥ १३४ ॥

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई ॥

कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना ॥

यह (श्रीरामजीके आगमनका) समाचार जब कोल-भीलोंने पाया, तो वे ऐसे हर्षित हुए मानो नवों निधियाँ उनके घरहीपर आ गयीं हों। वे दोनोंमें कन्द, मूल, फल भर-भरकर चले। मानो दरिद्र सोना लूटने चले हों ॥ १ ॥

तिन्ह महाँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहिं मगु जाता ॥

कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई ॥

उनमेंसे जो दोनों भाइयोंको [पहले] देख चुके थे, उनसे दूसरे लोग रास्तेमें जाते हुए पूछते हैं। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीकी सुन्दरता कहते-सुनते सबने आकर श्रीरघुनाथजीके दर्शन किये ॥ २ ॥

करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे ॥

चित्र लिखे जनु जहाँ तहाँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े ॥

भेंट आगे रखकर वे लोग जोहार करते हैं और अत्यन्त अनुरागके साथ प्रभुको देखते हैं। वे मुग्ध हुए जहाँ-के-तहाँ मानो चित्रलिखे-से खड़े हैं। उनके शरीर पुलकित हैं और नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंके जलकी बाढ़ आ रही है ॥ ३ ॥

राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने ॥

प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी ॥

श्रीरामजीने उन सबको प्रेममें मग्न जाना, और प्रिय वचन कहकर सबका सम्मान किया। वे बार-बार प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको जोहार करते हुए हाथ जोड़कर विनीत वचन कहते हैं— ॥ ४ ॥

दो०—अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।

भाग हमारें आगमनु राउर कोसलराय ॥ १३५ ॥

हे नाथ! प्रभु (आप) के चरणोंका दर्शन पाकर अब हम सब सनाथ हो गये। हे कोसलराज! हमारे ही भाग्यसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है ॥ १३५ ॥

धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहाँ जहाँ नाथ पाउ तुम्ह धारा ॥

धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४५७

हे नाथ! जहाँ-जहाँ आपने अपने चरण रखे हैं, वे पृथ्वी, वन, मार्ग और पहाड़ धन्य हैं, वे वनमें विचरनेवाले पक्षी और पशु धन्य हैं, जो आपको देखकर सफलजन्म हो गये ॥ १ ॥

हम सब धन्य सहित परिवारा । दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा ॥ कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी । इहाँ सकल रितु रहब सुखारी ॥

हम सब भी अपने परिवारसहित धन्य हैं, जिन्होंने नेत्र भरकर आपका दर्शन किया। आपने बड़ी अच्छी जगह विचारकर निवास किया है। यहाँ सभी ऋतुओंमें आप सुखी रहियेगा ॥ २ ॥

हम सब भाँति करब सेवकाई । करि केहरि अहि बाध बराई ॥ बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा । सब हमार प्रभु पग पग जोहा ॥

हमलोग सब प्रकारसे हाथी, सिंह, सर्प और बाघोंसे बचाकर आपकी सेवा करेंगे। हे प्रभो! यहाँके बीहड़ वन, पहाड़, गुफाएँ और खोह (दर्) सब पग-पग हमारे देखे हुए हैं ॥ ३ ॥

तहाँ तहाँ तुम्हहि अहेर खेलाउब । सर निरझर जलठाउँ देखाउब ॥ हम सेवक परिवार समेता । नाथ न सकुचब आयसु देता ॥

हम वहाँ-वहाँ (उन-उन स्थानोंमें) आपको शिकार खिलावेंगे और तालाब, झरने आदि जलाशयोंको दिखावेंगे। हम कुटुम्बसमेत आपके सेवक हैं। हे नाथ! इसलिये हमें आज्ञा देनेमें संकोच न कीजियेगा ॥ ४ ॥

दो०—बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन । बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन ॥ १३६ ॥

जो वेदोंके वचन और मुनियोंके मनको भी अगम हैं, वे करुणाके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भीलोंके वचन इस तरह सुन रहे हैं जैसे पिता बालकोंके वचन सुनता है ॥ १३६ ॥

रामहि केवल प्रेमु पिआरा । जानि लेउ जो जाननिहारा ॥ राम सकल बनचर तब तोषे । कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे ॥

श्रीरामचन्द्रजीको केवल प्रेम प्यारा है; जो जाननेवाला हो (जानना चाहता हो), वह जान ले। तब श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमसे परिपुष्ट हुए (प्रेमपूर्ण) कोमल वचन कहकर उन सब वनमें विचरण करनेवाले लोगोंको संतुष्ट किया ॥ १ ॥

बिदा किए सिर नाड़ सिधाए । प्रभु गुन कहत सुनत घर आए ॥ एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई । बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई ॥

फिर उनको विदा किया। वे सिर नवाकर चले और प्रभुके गुण कहते-सुनते घर आये। इस प्रकार देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले दोनों भाई सीताजीसमेत वनमें निवास करने लगे ॥ २ ॥

४५८

  • रामचरितमानस *

जब तें आइ रहे रघुनायकू । तब तें भयउ बनु मंगलदायकू ॥ फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना । मंजु बलित बर बेलि बिताना ॥

जबसे श्रीरघुनाथजी वनमें आकर रहे तबसे वन मङ्गलदायक हो गया । अनेकों प्रकारके वृक्ष फूलते और फलते हैं और उनपर लिपटी हुई सुन्दर बेलोंके मण्डप तने हैं ॥ ३ ॥

सुरतरु सरिस सुभायै सुहाए । मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए ॥ गुंज मंजुतर मधुकर श्रेनी । त्रिबिध बयारि बहड़ सुख देनी ॥

वे कल्पवृक्षके समान स्वाभाविक ही सुन्दर हैं । मानो वे देवताओंके वन (नन्दनवन) को छोड़कर आये हों। भौरोंकी पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर गुंजार करती हैं और सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा चलती रहती है ॥ ४ ॥

दो०—नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर ।

भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर ॥ १३७ ॥

नीलकण्ठ, कोयल, तोते, पपीहे, चक्के और चकोर आदि पक्षी कानोंको सुख देनेवाली और चितको चुरानेवाली तरह-तरहकी बोलियाँ बोलते हैं ॥ १३७ ॥

करि केहरि कपि कोल कुरंगा । बिगतबैर बिचरहिं सब संगा ॥ फिरत अहेर राम छबि देखी । होहिं मुदित मृगबृंद बिसेषी ॥

हाथी, सिंह, बंदर, सूअर और हिरन—ये सब वैर छोड़कर साथ-साथ विचरते हैं। शिकारके लिये फिरते हुए श्रीरामचन्द्रजीकी छबिको देखकर पशुओंके समूह विशेष आनन्दित होते हैं ॥ १ ॥

बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं । देखि रामबनु सकल सिहाहीं ॥ सुरसरि सरसड़ दिनकर कन्या । मेकलसुता गोदावरि धन्या ॥

जगत्में जहाँतक (जितने) देवताओंके वन हैं, सब श्रीरामजीके वनको देखकर सिहाते हैं। गङ्गा, सरस्वती, सूर्यकुमारी यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि धन्य (पुण्यमयी) नदियाँ, ॥ २ ॥

सब सर सिंधु नदीं नद नाना । मंदाकिनि कर करहिं बखाना ॥ उदय अस्त गिरि अरु कैलासू । मंदर मेरु सकल सुरबासू ॥

सारे तालाब, समुद्र, नदी और अनेकों नद सब मन्दाकिनीकी बड़ाई करते हैं। उदयाचल, अस्ताचल, कैलास, मन्दराचल और सुमेरु आदि सब, जो देवताओंके रहनेके स्थान हैं, ॥ ३ ॥

सैल हिमाचल आदिक जेते । चित्रकूट जसु गावहिं तेते ॥ बिधि मुदित मन सुखु न समाई । श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४५१

और हिमालय आदि जितने पर्वत हैं, सभी चित्रकूटका यश गाते हैं। विन्ध्याचल बड़ा आनन्दित है, उसके मनमें सुख समाता नहीं; क्योंकि उसने बिना परिश्रम ही बहुत बड़ी बड़ाई पा ली है ॥ ४ ॥

दो० — चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तून जाति।

पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति ॥ १३८ ॥

चित्रकूटके पक्षी, पशु, बेल, वृक्ष, तृण-अंकुरादिकी सभी जातियाँ पुण्यकी राशि हैं और धन्य हैं—देवता दिन-रात ऐसा कहते हैं ॥ १३८ ॥

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी । पाइ जनम फल होहिं बिसोकी ॥

परसि चरन रज अचर सुखारी । भए परम पद के अधिकारी ॥

आँखोंवाले जीव श्रीरामचन्द्रजीको देखकर जन्मका फल पाकर शोकरहित हो जाते हैं, और अचर (पर्वत, वृक्ष, भूमि, नदी आदि) भगवान्की चरण-रजका स्पर्श पाकर सुखी होते हैं। यों सभी परमपद (मोक्ष) के अधिकारी हो गये ॥ १ ॥

सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन । मंगलमय अति पावन पावन ॥

महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू । सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू ॥

वह वन और पर्वत स्वाभाविक ही सुन्दर, मङ्गलमय और अत्यन्त पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाला है। उसकी महिमा किस प्रकार कही जाय, जहाँ सुखके समुद्र श्रीरामजीने निवास किया है ॥ २ ॥

पय पयोधि तजि अवध बिहाई । जहँ सिय लखनु रामु रहे आई ॥

कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन । जौँ सत सहस होहिं सहसानन ॥

क्षीरसागरको त्यागकर और अयोध्याको छोड़कर जहाँ सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजी आकर रहे, उस वनकी जैसी परम शोभा है, उसको हजार मुखवाले जो लाख शेषजी हों तो वे भी नहीं कह सकते ॥ ३ ॥

सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं । डाबर कमठ कि मंदर लेहीं ॥

सेवहिं लखनु करम मन बानी । जाइ न सीलु सनेहु बखानी ॥

उसे भला, मैं किस प्रकारसे वर्णन करके कह सकता हूँ। कहीं पोखरेका [शुद्ध] कछुआ भी मन्दराचल उठा सकता है? लक्ष्मणजी मन, वचन और कर्मसे श्रीरामचन्द्रजीकी सेवा करते हैं। उनके शील और स्नेहका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ४ ॥

दो० — छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।

करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु ॥ १३९ ॥

क्षण-क्षणपर श्रीसीतारामजीके चरणोंको देखकर और अपने ऊपर उनका स्नेह जानकर लक्ष्मणजी स्वप्नमें भी भाइयों, माता-पिता और घरकी याद नहीं करते ॥ १३९ ॥

४६०

  • रामचरितमानस *

राम संग सिय रहति सुखारी । पुर परिजन गृह सुरति बिसारी ॥ छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी । प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी ॥

श्रीरामचन्द्रजीके साथ सीताजी अयोध्यापुरी, कुटुम्बके लोग और घरकी याद भूलकर बहुत ही सुखी रहती हैं। क्षण-क्षणपर पति श्रीरामचन्द्रजीके चन्द्रमाके समान मुखको देखकर वे वैसे ही परम प्रसन्न रहती हैं जैसे चकोरकुमारी (चकोरी) चन्द्रमाको देखकर!! १ ॥

नाह नेहु नित बद्धत बिलोकी । हरषित रहति दिवस जिमि कोकी ॥ सिय मनु राम चरन अनुरागा । अवध सहस सम बनु प्रिय लागा ॥

स्वामीका प्रेम अपने प्रति नित्य बद्धता हुआ देखकर सीताजी ऐसी हर्षित रहती हैं जैसे दिनमें चकवी! सीताजीका मन श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें अनुरक्त है इससे उनको वन हजारों अवधके समान प्रिय लगता है ॥ २ ॥

परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा । प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा ॥ सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर । असनु अमिअ सम कंद मूल फर ॥

प्रियतम (श्रीरामचन्द्रजी) के साथ पर्णकुटी प्यारी लगती है। मृग और पक्षी प्यारे कुटुम्बियोंके समान लगते हैं। मुनियोंकी स्त्रियाँ सासके समान, श्रेष्ठ मुनि ससुरके समान और कन्द-मूल-फलोंका आहार उनको अमृतके समान लगता है ॥ ३ ॥

नाथ साथ साँथरी सुहाई । मयन सयन सय सम सुखदाई ॥ लोकप होहिं बिलोकत जासू । तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू ॥

स्वामीके साथ सुन्दर साथरी (कुश और पतोंकी सेज) सैकड़ों कामदेवकी सेजोंके समान सुख देनेवाली है। जिनके [कृपापूर्वक] देखनेमात्रसे जीव लोकपाल हो जाते हैं, उनको कहीं भोग-विलास मोहित कर सकते हैं!! ४ ॥

दो० — सुमिरत रामहि तजहिं जन तून सम बिषय बिलासु । रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु ॥ १४० ॥

जिन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करनेसे ही भक्तजन तमाम भोग-विलासको तिनकेके समान त्याग देते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजीकी प्रिय पत्नी और जगत्की माता सीताजीके लिये यह [भोग-विलासका त्याग] कुछ भी आश्चर्य नहीं है ॥ १४० ॥

सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहिं सोइ कहहीं ॥ कहहिं पुरातन कथा कहानी । सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी ॥

सीताजी और लक्ष्मणजीको जिस प्रकार सुख मिले, श्रीरघुनाथजी वही करते और वही कहते हैं। भगवान् प्राचीन कथाएँ और कहानियाँ कहते हैं और लक्ष्मणजी तथा सीताजी अत्यन्त सुख मानकर सुनते हैं ॥ १ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४६१

जब जब रामु अवध सुधि करहीं । तब तब बारि बिलोचन भरहीं ॥ सुमिरि मातु पितु परिजन भाई । भरत सनेहु सीलु सेवकाई ॥

जब-जब श्रीरामचन्द्रजी अयोध्याकी याद करते हैं, तब-तब उनके नेत्रोंमें जल भर आता है। माता-पिता, कुटुम्बियों और भाइयों तथा भरतके प्रेम, शील और सेवाभावको याद करके— ॥ २ ॥

कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी । धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी ॥ लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं । जिमि पुरुषहि अनुसार परिछाहीं ॥

कृपाके समुद्र प्रभु श्रीरामचन्द्रजी दुःखी हो जाते हैं, किन्तु फिर कुसमय समझकर धीरज धारण कर लेते हैं। श्रीरामचन्द्रजीको दुखी देखकर सीताजी और लक्ष्मणजी भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे किसी मनुष्यकी परछाहीं उस मनुष्यके समान ही चेष्टा करती है ॥ ३ ॥

प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु । धीर कृपाल भगत उर चंदनु ॥ लगे कहन कछु कथा पुनीता । सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता ॥

तब धीर, कृपालु और भक्तोंके हृदयोंको शीतल करनेके लिये चन्दनरूप रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी प्यारी पत्नी और भाई लक्ष्मणकी दशा देखकर कुछ पवित्र कथाएँ कहने लगते हैं, जिन्हें सुनकर लक्ष्मणजी और सीताजी सुख प्राप्त करते हैं ॥ ४ ॥

दो०—रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत । जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत ॥ १४१ ॥

लक्ष्मणजी और सीताजीसहित श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटीमें ऐसे सुशोभित हैं जैसे अमरावतीमें इन्द्र अपनी पत्नी शची और पुत्र जयन्तसहित बसता है ॥ १४१ ॥

जोगवहिं प्रभु सिय लखनहि कैसें । पलक बिलोचन गोलक जैसें ॥ सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि । जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजीकी कैसी सँभाल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रोंके गोलकोंकी। इधर लक्ष्मणजी श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजीकी [अथवा लक्ष्मणजी और सीताजी श्रीरामचन्द्रजीकी] ऐसी सेवा करते हैं जैसे अज्ञानी मनुष्य शरीरकी करते हैं ॥ १ ॥

एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी । खग मृग सुर तापस हितकारी ॥ कहेउँ राम बन गवनु सुहावा । सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा ॥

पक्षी, पशु, देवता और तपस्वियोंके हितकारी प्रभु इस प्रकार सुखपूर्वक वनमें निवास कर रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—मैंने श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर वनगमन कहा। अब जिस तरह सुमन्त्र अयोध्यामें आये वह [कथा] सुनो ॥ २ ॥