श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 460, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
जब तें आइ रहे रघुनायकू । तब तें भयउ बनु मंगलदायकू ॥ फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना । मंजु बलित बर बेलि बिताना ॥
जबसे श्रीरघुनाथजी वनमें आकर रहे तबसे वन मङ्गलदायक हो गया । अनेकों प्रकारके वृक्ष फूलते और फलते हैं और उनपर लिपटी हुई सुन्दर बेलोंके मण्डप तने हैं ॥ ३ ॥
सुरतरु सरिस सुभायै सुहाए । मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए ॥ गुंज मंजुतर मधुकर श्रेनी । त्रिबिध बयारि बहड़ सुख देनी ॥
वे कल्पवृक्षके समान स्वाभाविक ही सुन्दर हैं । मानो वे देवताओंके वन (नन्दनवन) को छोड़कर आये हों। भौरोंकी पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर गुंजार करती हैं और सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा चलती रहती है ॥ ४ ॥
दो०—नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर ।
भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर ॥ १३७ ॥
नीलकण्ठ, कोयल, तोते, पपीहे, चक्के और चकोर आदि पक्षी कानोंको सुख देनेवाली और चितको चुरानेवाली तरह-तरहकी बोलियाँ बोलते हैं ॥ १३७ ॥
करि केहरि कपि कोल कुरंगा । बिगतबैर बिचरहिं सब संगा ॥ फिरत अहेर राम छबि देखी । होहिं मुदित मृगबृंद बिसेषी ॥
हाथी, सिंह, बंदर, सूअर और हिरन—ये सब वैर छोड़कर साथ-साथ विचरते हैं। शिकारके लिये फिरते हुए श्रीरामचन्द्रजीकी छबिको देखकर पशुओंके समूह विशेष आनन्दित होते हैं ॥ १ ॥
बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं । देखि रामबनु सकल सिहाहीं ॥ सुरसरि सरसड़ दिनकर कन्या । मेकलसुता गोदावरि धन्या ॥
जगत्में जहाँतक (जितने) देवताओंके वन हैं, सब श्रीरामजीके वनको देखकर सिहाते हैं। गङ्गा, सरस्वती, सूर्यकुमारी यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि धन्य (पुण्यमयी) नदियाँ, ॥ २ ॥
सब सर सिंधु नदीं नद नाना । मंदाकिनि कर करहिं बखाना ॥ उदय अस्त गिरि अरु कैलासू । मंदर मेरु सकल सुरबासू ॥
सारे तालाब, समुद्र, नदी और अनेकों नद सब मन्दाकिनीकी बड़ाई करते हैं। उदयाचल, अस्ताचल, कैलास, मन्दराचल और सुमेरु आदि सब, जो देवताओंके रहनेके स्थान हैं, ॥ ३ ॥
सैल हिमाचल आदिक जेते । चित्रकूट जसु गावहिं तेते ॥ बिधि मुदित मन सुखु न समाई । श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई ॥