भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 461
  • अयोध्याकाण्ड *

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और हिमालय आदि जितने पर्वत हैं, सभी चित्रकूटका यश गाते हैं। विन्ध्याचल बड़ा आनन्दित है, उसके मनमें सुख समाता नहीं; क्योंकि उसने बिना परिश्रम ही बहुत बड़ी बड़ाई पा ली है ॥ ४ ॥

दो० — चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तून जाति।

पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति ॥ १३८ ॥

चित्रकूटके पक्षी, पशु, बेल, वृक्ष, तृण-अंकुरादिकी सभी जातियाँ पुण्यकी राशि हैं और धन्य हैं—देवता दिन-रात ऐसा कहते हैं ॥ १३८ ॥

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी । पाइ जनम फल होहिं बिसोकी ॥

परसि चरन रज अचर सुखारी । भए परम पद के अधिकारी ॥

आँखोंवाले जीव श्रीरामचन्द्रजीको देखकर जन्मका फल पाकर शोकरहित हो जाते हैं, और अचर (पर्वत, वृक्ष, भूमि, नदी आदि) भगवान्की चरण-रजका स्पर्श पाकर सुखी होते हैं। यों सभी परमपद (मोक्ष) के अधिकारी हो गये ॥ १ ॥

सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन । मंगलमय अति पावन पावन ॥

महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू । सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू ॥

वह वन और पर्वत स्वाभाविक ही सुन्दर, मङ्गलमय और अत्यन्त पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाला है। उसकी महिमा किस प्रकार कही जाय, जहाँ सुखके समुद्र श्रीरामजीने निवास किया है ॥ २ ॥

पय पयोधि तजि अवध बिहाई । जहँ सिय लखनु रामु रहे आई ॥

कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन । जौँ सत सहस होहिं सहसानन ॥

क्षीरसागरको त्यागकर और अयोध्याको छोड़कर जहाँ सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजी आकर रहे, उस वनकी जैसी परम शोभा है, उसको हजार मुखवाले जो लाख शेषजी हों तो वे भी नहीं कह सकते ॥ ३ ॥

सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं । डाबर कमठ कि मंदर लेहीं ॥

सेवहिं लखनु करम मन बानी । जाइ न सीलु सनेहु बखानी ॥

उसे भला, मैं किस प्रकारसे वर्णन करके कह सकता हूँ। कहीं पोखरेका [शुद्ध] कछुआ भी मन्दराचल उठा सकता है? लक्ष्मणजी मन, वचन और कर्मसे श्रीरामचन्द्रजीकी सेवा करते हैं। उनके शील और स्नेहका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ४ ॥

दो० — छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।

करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु ॥ १३९ ॥

क्षण-क्षणपर श्रीसीतारामजीके चरणोंको देखकर और अपने ऊपर उनका स्नेह जानकर लक्ष्मणजी स्वप्नमें भी भाइयों, माता-पिता और घरकी याद नहीं करते ॥ १३९ ॥