श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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उत्तम (गौर) वर्णवाली सीताजी उनको देखकर [संकोचवश] पृथ्वीकी ओर देखती हैं। वे दोनों ओरके संकोचसे सकुचा रही हैं (अर्थात् न बतानेमें ग्रामकी स्त्रियोंको दुःख होनेका संकोच है और बतानेमें लज्जारूप संकोच)। हिरणके बच्चेके सदृश नेत्रवाली और कोकिलकी-सी वाणीवाली सीताजी सकुचाकर प्रेमसहित मधुर वचन बोलीं— ॥ २ ॥
सहज सुभाय सुभग तन गोरै । नामु लखनु लघु देवर मोरै ॥ बहरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी । पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी ॥
ये जो सहजस्वभाव, सुन्दर और गोरै शरीरके हैं, उनका नाम लक्ष्मण है; ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीताजीने [लज्जावश] अपने चन्द्रमुखको आँचलसे ढककर और प्रियतम (श्रीरामजी) की ओर निहारकर भौँहें टेढ़ी करके, ॥ ३ ॥
खंजन मंजु तिरिछे नयननि । निज पति कहेउ तिन्हहि सियै सयननि ॥ भई मुदित सब ग्रामबधूर्ती । रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं ॥
खंजन पक्षीके-से सुन्दर नेत्रोंको तिरछा करके सीताजीने इशारेसे उन्हें कहा कि ये (श्रीरामचन्द्रजी) मेरे पति हैं। यह जानकर गाँवकी सब युवती स्त्रियाँ इस प्रकार आनन्दित हुईं मानो कंगालोंने धनकी राशियाँ लूट ली हों ॥ ४ ॥
दो०— अति सप्रेम सिय पार्यै परि बहुबिधि देहिं असीस । सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस ॥ ११७ ॥
वे अत्यन्त प्रेमसे सीताजीके पैरों पड़कर बहुत प्रकारसे आशिष देती हैं (शुभ कामना करती हैं) कि जबतक शेषजीके सिरपर पृथ्वी रहे, तबतक तुम सदा सुहागिनी बनी रहो, ॥ ११७ ॥
पारबती सम पतिप्रिय होहू । देबि न हम पर छाड़ब छोहू ॥ पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी । जौँ एहि मारग फिरिअ बहोरी ॥
और पार्वतीजीके समान अपने पतिकी प्यारी होओ। हे देवि! हमपर कृपा न छोड़ना (बनाये रखना)। हम बार-बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं जिसमें आप फिर इसी रास्ते लौटें, ॥ १ ॥
दरसनु देब जानि निज दासी । लखीं सीर्यै सब प्रेम पिआसी ॥ मधुर बचन कहि कहि परितोर्षी । जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोर्षीं ॥
और हमें अपनी दासी जानकर दर्शन दें। सीताजीने उन सबको प्रेमकी प्यासी देखा, और मधुर वचन कह-कहकर उनका भलीभाँति सन्तोष किया। मानो चाँदनीने कुमुदिनियोंको खिलाकर पुष्ट कर दिया हो ॥ २ ॥