भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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  • रामचरितमानस *

थके नारि नर प्रेम पिआसे । मनहुँ मूगी मूग देखि दिआ से ॥ सीय समीप ग्रामतिय जाहीं । पूछत अति सनेहँ सकुचाहीं ॥

प्रेमके प्यासे [वे गाँवोंके] स्त्री-पुरुष [इनके सौन्दर्य-माधुर्यकी छटा देखकर] ऐसे थकित रह गये जैसे दीपकको देखकर हिरनी और हिरन [निस्तब्ध रह जाते हैं] ! गाँवोंकी स्त्रियाँ सीताजीके पास जाती हैं; परन्तु अत्यन्त स्नेहके कारण पूछते सकुचाती हैं ॥ २ ॥

बार बार सब लागहिं पाएँ । कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ ॥ राजकुमारि बिनय हम करहीं । तिय सुभार्थ कछु पूछत डरहीं ॥

बार-बार सब उनके पाँव लगतीं और सहज ही सीधे-सादे कोमल वचन कहती हैं—हे राजकुमारी ! हम विनती करती (कुछ निवेदन करना चाहती) हैं, परन्तु स्त्री-स्वभावके कारण कुछ पूछते हुए डरती हैं ॥ ३ ॥

स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी । बिलगु न मानब जानि गवौरी ॥ राजकुअर दोउ सहज सलोने । इन्ह तें लही दुति मरकत सोने ॥

हे स्वामिनि ! हमारी ढिठाई क्षमा कीजियेगा और हमको गँवारी जानकर बुरा न मानियेगा। ये दोनों राजकुमार स्वभावसे ही लावण्यमय (परम सुन्दर) हैं। मरकतमणि (पत्ते) और सुवर्णने कान्ति इन्हींसे पायी है (अर्थात् मरकतमणिमें और स्वर्णमें जो हरित और स्वर्णवर्णकी आभा है वह इनकी हरिताभनील और स्वर्णकान्तिके एक कणके बराबर भी नहीं है) ॥ ४ ॥

दो०— स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।

सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन ॥ ११६ ॥

श्याम और गौर वर्ण है, सुन्दर किशोर अवस्था है; दोनों ही परम सुन्दर और शोभाके धाम हैं। शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान इनके मुख और शरद-ऋतुके कमलके समान इनके नेत्र हैं ॥ ११६ ॥

मासपारायण, सोलहवाँ विश्राम

नवाह्नपारायण, चौथा विश्राम

कोटि मनोज लजावनिहारे । सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे ॥

सुनि सनेहमय मंजुल बानी । सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी ॥

हे सुमुखि ! कहो तो अपनी सुन्दरतासे करोड़ों कामदेवोंको लजानेवाले ये तुम्हारे कौन हैं ? उनकी ऐसी प्रेममयी सुन्दर वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं और मन-ही-मन मुसकरायीं ॥ १ ॥

तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी । दुहुँ सकोच सकुचति बरबरनी ॥

सकुचि सप्रेम बाल मूग नयनी । बोली मधुर बचन पिकबयनी ॥