भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 441
  • अयोध्याकाण्ड *

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एक कलस भरि आनहिं पानी । अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी ॥ सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी । राम कृपाल सुसील बिसेषी ॥

कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल वाणीसे कहते हैं—नाथ! आचमन तो कर लीजिये। उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका अत्यन्त प्रेम देखकर दयालु और परम सुशील श्रीरामचन्द्रजीने— ॥ १ ॥

जानी श्रमित सीय मन माहीं । घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं ॥ मुदित नारि नर देखहिं सोभा । रूप अनूप नयन मनु लोभा ॥

मनमें सीताजीको थकी हुई जानकर घड़ीभर बड़की छायामें विश्राम किया। स्त्री-पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूपने उनके नेत्र और मनोंको लुभा लिया है ॥ २ ॥

एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा । रामचंद्र मुख चंद चकोरा ॥ तरुन तमाल बरन तनु सोहा । देखत कोटि मदन मनु मोहा ॥

सब लोग टकटकी लगाये श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको चकोरकी तरह (तन्मय होकर) देखते हुए चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजीका नवीन तमाल वृक्षके रंगका (श्याम) शरीर अत्यन्त शोभा दे रहा है, जिसे देखते ही करोड़ों कामदेवोंके मन मोहित हो जाते हैं ॥ ३ ॥

दामिनि बरन लखन सुठि नीके । नख सिख सुभग भावते जी के ॥ मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा । सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा ॥

बिजलीके-से रंगके लक्ष्मणजी बहुत ही भले मालूम होते हैं। वे नखसे शिखातक सुन्दर हैं, और मनको बहुत भाते हैं। दोनों मुनियोंके (वल्लल आदि) वस्त्र पहने हैं और कमरमें तरकस कसे हुए हैं। कमलके समान हाथोंमें धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं ॥ ४ ॥

दो०—जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल ।

सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल ॥ ११५ ॥

उनके सिरोंपर सुन्दर जटाओंके मुकुट हैं; वक्षःस्थल, भुजा और नेत्र विशाल हैं और शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखोंपर पसीनेकी बूँदोंका समूह शोभित हो रहा है ॥ ११५ ॥

बरनि न जाइ मनोहर जोरी । सोभा बहुत थोरि मति मोरी ॥ राम लखन सिय सुंदरताई । सब चितवहिं चित मन मति लाई ॥

उस मनोहर जोड़ीका वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि शोभा बहुत अधिक है, और मेरी बुद्धि थोड़ी है। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीकी सुन्दरताको सब लोग मन, चित और बुद्धि तीनोंको लगाकर देख रहे हैं ॥ १ ॥

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