श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 422, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
संयोग (मिलना), वियोग (बिछुड़ना), भले-बुरे भोग, शत्रु, मित्र और उदासीन—ये सभी भ्रमके फंड़े हैं। जन्म-मृत्यु, सम्पत्ति-विपत्ति, कर्म और काल—जहाँतक जगत्के जंजाल हैं; ॥ ३ ॥
धरनि धामु धनु पुर परिवारू । सरगु नरकु जहँ लणि व्यवहारू ॥ देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं । मोह मूल परमारथु नाहीं ॥
धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँतक व्यवहार हैं जो देखने, सुनने और मनके अंदर विचारनेमें आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है। परमार्थतः ये नहीं हैं ॥ ४ ॥
दो०—सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ। जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ ॥ १२ ॥
जैसे स्वप्नमें राजा भिखारी हो जाय या कंगाल स्वर्गका स्वामी इन्द्र हो जाय, तो जागनेपर लाभ या हानि कुछ भी नहीं है; वैसे ही इस दृश्य-प्रपञ्चको हृदयसे देखना चाहिये ॥ १२ ॥
अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू । काहुहि बादि न देइअ दोसू ॥ मोह निसाँ सबु सोवनिहारा । देखिअ सपन अनेक प्रकारा ॥
ऐसा विचारकर क्रोध नहीं करना चाहिये और न किसीको व्यर्थ दोष ही देना चाहिये। सब लोग मोहरूपी रात्रिमें सोनेवाले हैं और सोते हुए उन्हें अनेकों प्रकारके स्वप्न दिखायी देते हैं ॥ १ ॥
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी । परमारथी प्रपंच बियोगी ॥ जानिअ तबहिं जीव जग जागा । जब सब बिषय बिलास बिरागा ॥
इस जगत्रूपी रात्रिमें योगीलोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपञ्च (मायिक जगत्) से छूटे हुए हैं। जगत्में जीवको जागा हुआ तभी जानना चाहिये जब सम्पूर्ण भोग-विलासोंसे वैराग्य हो जाय ॥ २ ॥
होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथ चरन अनुरागा ॥ सखा परम परमारथु एहू । मन क्रम बचन राम पद नेहू ॥
विवेक होनेपर मोहरूपी भ्रम भाग जाता है, तब (अज्ञानका नाश होनेपर) श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होता है। हे सखा! मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है ॥ ३ ॥
राम ब्रह्म परमारथ रूप। अविगत अलख अनादि अनूपा ॥ सकल विकार रहित गतभेदा । कहि नित नेति निरूपहिं वेदा ॥
श्रीरामजी परमार्थस्वरूप (परमवस्तु) परब्रह्म हैं। वे अविगत (जाननेमें न आनेवाले), अलख (स्थूल दृष्टिसे देखनेमें न आनेवाले), अनादि (आदिरहित), अनुपम (उपमारहित), सब विकारोंसे रहित और भेदशून्य हैं, वेद जिनका नित्य 'नेति-नेति' कहकर निरूपण करते हैं ॥ ४ ॥