भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 467
  • अयोध्याकाण्ड *

४६५

दो०—धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।

उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि ॥ १४५ ॥

नगरके सब व्याकुल स्त्री-पुरुष जब दौड़कर मुझसे पूछेंगे, तब मैं हृदयपर वज्र रखकर सबको उत्तर दूँगा ॥ १४५ ॥

पुछिहहिं दीन दुखित सब माता । कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता ॥

पूँछिहि जबहिं लखन महतारी । कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी ॥

जब दीन-दुखी सब माताएँ पूछेंगी, तब हे विधाता! मैं उन्हें क्या कहूँगा? जब लक्ष्मणजीकी माता मुझसे पूछेंगी, तब मैं उन्हें कौन-सा सुखदायी सँदेसा कहूँगा? ॥ १ ॥

राम जननि जब आइहि धाई । सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई ॥

पूँछत उत्तरु देब मैं तेही । गे बनु राम लखनु बैदेही ॥

श्रीरामजीकी माता जब इस प्रकार दौड़ी आवेंगी जैसे नयी ब्यायी हुई गौ बछड़ेको याद करके दौड़ी आती है, तब उनके पूछनेपर मैं उन्हें यह उत्तर दूँगा कि श्रीराम, लक्ष्मण, सीता वनको चले गये! ॥ २ ॥

जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा । जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा ॥

पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना । जिवनु जासु रघुनाथ अधीना ॥

जो भी पूछेगा उसे यही उत्तर देना पड़ेगा! हाय! अयोध्या जाकर अब मुझे यही सुख लेना है! जब दुःखसे दीन महाराज, जिनका जीवन श्रीरघुनाथजीके [दर्शनके] ही अधीन है, मुझसे पूछेंगे, ॥ ३ ॥

देहउँ उत्तरु कौनु मुहु लाई । आयउँ कुसल कुअरँ पहुँचाई ॥

सुनत लखन सिय राम सँदेसू । तून जिमि तनु परिहरिहि नरेसू ॥

तब मैं कौन-सा मुँह लेकर उन्हें उत्तर दूँगा कि मैं राजकुमारोंको कुशलपूर्वक पहुँचा आया हूँ! लक्ष्मण, सीता और श्रीरामका समाचार सुनते ही महाराज तिनकेकी तरह शरीरको त्याग देंगे ॥ ४ ॥

दो०—हृदउ न बिदेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु ।

जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु ॥ १४६ ॥

प्रियतम (श्रीरामजी) रूपी जलके बिछुड़ते ही मेरा हृदय कीचड़की तरह फट नहीं गया, इससे मैं जानता हूँ कि विधाताने मुझे यह 'यातनाशरीर' ही दिया है [जो पापी जीवोंको नरक भोगनेके लिये मिलता है] ॥ १४६ ॥

एहि बिधि करत पंथ पछितावा । तमसा तीर तुरत रथु आवा ॥

बिदा किए करि बिनय निषादा । फिरे पार्यँ परि बिकल बिषादा ॥