श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 468, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
सुमन्त्र इस प्रकार मार्गमें पछतावा कर रहे थे, इतनेमें ही रथ तुरंत तमसा नदीके तटपर आ पहुँचा। मन्त्रीने विनय करके चारों निषादोंको विदा किया। वे विषादसे व्याकुल होते हुए सुमन्त्रके पैरों पड़कर लौटे ॥ १ ॥
पैठत नगर सचिव सकुचाई । जनु मारेसि गुर बाँभन गाई ॥ बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा । साँझ समय तब अवसरु पावा ॥
नगरमें प्रवेश करते मन्त्री [ग्लानिके कारण] ऐसे सकुचाते हैं, मानो गुरु, ब्राह्मण या गौको मारकर आये हों। सारा दिन एक पेड़के नीचे बैठकर बिताया। जब सन्ध्या हुई तब मौका मिला ॥ २ ॥
अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें । पैठ भवन रथु राखि दुआरें ॥ जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए । भूप द्वार रथु देखन आए ॥
अँधेरा होनेपर उन्होंने अयोध्यामें प्रवेश किया और रथको दरवाजेपर खड़ा करके वे [चुपके-से] महलमें घुसे। जिन-जिन लोगोंने यह समाचार सुन पाया, वे सभी रथ देखनेको राजद्वारपर आये ॥ ३ ॥
रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे । गरहिं गात जिमि आतप ओरे ॥ नगर नारि नर व्याकुल कैसें । निघटत नीर मीनगन जैसें ॥
रथको पहचानकर और घोड़ोंको व्याकुल देखकर उनके शरीर ऐसे गले जा रहे हैं (क्षीण हो रहे हैं) जैसे घाममें ओले! नगरके स्त्री-पुरुष कैसे व्याकुल हैं जैसे जलके घटनेपर मछलियाँ [व्याकुल होती हैं] ॥ ४ ॥
दो० — सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु ।
भवनु भयंकुरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु ॥ १४७ ॥
मन्त्रीका [अकेले ही] आना सुनकर सारा रनिवास व्याकुल हो गया। राजमहल उनको ऐसा भयानक लगा मानो प्रेतोंका निवासस्थान (शमशान) हो ॥ १४७ ॥
अति आरति सब पूँछहिं रानी । उत्तरु न आव बिकल भइ बानी ॥ सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा । कहहु कहाँ नृपु तेहि तेहि बूझा ॥
अत्यन्त आर्त होकर सब रानियाँ पूछती हैं; पर सुमन्त्रको कुछ उत्तर नहीं आता, उनकी वाणी विकल हो गयी (रुक गयी) है। न कानोंसे सुनायी पड़ता है और न आँखोंसे कुछ सूझता है। वे जो भी सामने आता है उस-उससे पूछते हैं—कहो, राजा कहाँ हैं? ॥ १ ॥
दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई । कौसल्या गूँहँ गई लवाई ॥
जाइ सुमंत्र दीख कस राजा । अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा ॥
दासियाँ मन्त्रीको व्याकुल देखकर उन्हें कौसल्याजीके महलमें लिवा गयीं। सुमन्त्रने जाकर वहाँ राजाको कैसा [बैठे] देखा मानो बिना अमृतका चन्द्रमा हो ॥ २ ॥