भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 469, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 469
  • अयोध्याकाण्ड *

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आसन सयन बिभूषण हीना । परेउ भूमितल निपट मलीना ॥ लेड़ उसासु सोच एहि भाँती । सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती ॥

राजा आसन, शय्या और आभूषणोंसे रहित बिलकुल मलिन (उदास) पृथ्वीपर पड़े हुए हैं। वे लंबी साँसें लेकर इस प्रकार सोच करते हैं मानो राजा ययाति स्वर्गसे गिरकर सोच कर रहे हों ॥ ३ ॥

लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती । जनु जरि पंख परेउ संपाती ॥ राम राम कह राम सनेही । पुनि कह राम लखन बैदेही ॥

राजा क्षण-क्षणमें सोचसे छाती भर लेते हैं। ऐसी विकल दशा है मानो [गीथराज जटायुका भाई] सम्पाती पंखोंके जल जानेपर गिर पड़ा हो। राजा [बार-बार] 'राम, राम', 'हा स्नेही (प्यारे) राम!' कहते हैं, फिर 'हा राम, हा लक्ष्मण, हा जानकी' ऐसा कहने लगते हैं ॥ ४ ॥

दो०— देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हैउ दंड प्रनामु ।

सुनत उठेउ व्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु ॥ १४८ ॥

मन्त्रीने देखकर 'जयजीव' कहकर दण्डवत्-प्रणाम किया। सुनते ही राजा व्याकुल होकर उठे और बोले—सुमन्त्र! कहो, राम कहाँ हैं ? ॥ १४८ ॥

भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई । बूड़त कछु अधार जनु पाई ॥ सहित सनेह निकट बैठारी । पूँछत राउ नयन भरि बारी ॥

राजाने सुमन्त्रको हृदयसे लगा लिया। मानो डूबते हुए आदमीको कुछ सहारा मिल गया हो। मन्त्रीको स्नेहके साथ पास बैठाकर नेत्रोंमें जल भरकर राजा पूछने लगे— ॥ १ ॥

राम कुसल कहु सखा सनेही । कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही ॥ आने फेरि कि बनहि सिधाए । सुनत सचिव लोचन जल छाए ॥

हे मेरे प्रेमी सखा! श्रीरामकी कुशल कहो। बताओ, श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी कहाँ हैं ? उन्हें लौटा लाये हो कि वे वनको चले गये ? यह सुनते ही मन्त्रीके नेत्रोंमें जल भर आया ॥ २ ॥

सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू । कहु सिय राम लखन संदेसू ॥

राम रूप गुन सील सुभाऊ । सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ ॥

शोकसे व्याकुल होकर राजा फिर पूछने लगे—सीता, राम और लक्ष्मणका संदेश तो कहो। श्रीरामचन्द्रजीके रूप, गुण, शील और स्वभावको याद कर-करके राजा हृदयमें सोच करते हैं ॥ ३ ॥

राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू । सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू ॥

सो सुत बिछुरत गए न प्राना । को पापी बड़ मोहि समाना ॥

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