भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 471
  • अयोध्याकाण्ड *

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केवट कीन्हि बहुत सेवकाई । सो जामिनि सिंगरौर गवाई ॥ होत प्रात बट छीरु मगावा । जटा मुकुट निज सीस बनावा ॥

केवट (निषादराज) ने बहुत सेवा की। वह रात सिंगरौर (श्रृंगवेरपुर) में ही बितायी। दूसरे दिन सबेरा होते ही बड़का दूध मँगवाया और उससे श्रीराम-लक्ष्मणने अपने सिरोंपर जटाओंके मुकुट बनाये ॥ १ ॥

राम सखों तब नाव मगाई । प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई ॥ लखन बान धनु धरे बनाई । आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीके सखा निषादराजने नाव मँगवायी। पहले प्रिया सीताजीको उसपर चढ़ाकर फिर श्रीरघुनाथजी चढ़े। फिर लक्ष्मणजीने धनुष-बाण सजाकर रखे और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर स्वयं चढ़े ॥ २ ॥

बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा । बोले मधुर बचन धरि धीरा ॥ तात प्रनामु तात सन कहेहू । बार बार पद पंकज गहेहू ॥

मुझे व्याकुल देखकर श्रीरामचन्द्रजी धीरज धरकर मधुर वचन बोले—हे तात! पिताजीसे मेरा प्रणाम कहना और मेरी ओरसे बार-बार उनके चरणकमल पकड़ना ॥ ३ ॥

करबि पायँ परि बिनय बहोरी । तात करिअ जनि चिंता मोरी ॥ बन मग मंगल कुसल हमारें । कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें ॥

फिर पाँव पकड़कर विनती करना कि हे पिताजी! आप मेरी चिन्ता न कीजिये। आपकी कृपा, अनुग्रह और पुण्यसे वनमें और मार्गमें हमारा कुशल-मङ्गल होगा ॥ ४ ॥

छं०—तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहैं। प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहैं ॥ जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी । तुलसी करेहु सोड़ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसलधनी ॥

हे पिताजी! आपके अनुग्रहसे मैं वन जाते हुए सब प्रकारका सुख पाऊँगा। आज्ञाका भलीभाँति पालन करके चरणोंका दर्शन करने कुशलपूर्वक फिर लौट आऊँगा। सब माताओंके पैरों पड़-पड़कर उनका समाधान करके और उनसे बहुत विनती करके—तुलसीदास कहते हैं—तुम वही प्रयत्न करना जिसमें कोसलपति पिताजी कुशल रहें।

सो०—गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि। करब सोड़ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति ॥ १५१ ॥