श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 472, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
बार-बार चरणकमलोंको पकड़कर गुरु वसिष्ठजीसे मेरा सँदेसा कहना कि वे वही उपदेश दें जिससे अवधपति पिताजी मेरा सोच न करें ॥ १५१ ॥
पुरजन परिजन सकल निहोरी । तात सुनाएहु बिनती मोरी ॥ सोइ सब भाँति मोर हितकारी । जातें रह नरनाहु सुखारी ॥
हे तात! सब पुरवासियों और कुटुम्बियोंसे निहोरा (अनुरोध) करके मेरी विनती सुनाना कि वही मनुष्य मेरा सब प्रकारसे हितकारी है जिसकी चेष्टासे महाराज सुखी रहें ॥ १ ॥
कहब सँदेसु भरत के आएँ । नीति न तजिअ राजपदु पाएँ ॥ पालेहु प्रजहि करम मन बानी । सेएहु मातु सकल सम जानी ॥
भरतके आनेपर उनको मेरा सँदेसा कहना कि राजाका पद पा जानेपर नीति न छोड़ देना; कर्म, वचन और मनसे प्रजाका पालन करना और सब माताओंको समान जानकर उनकी सेवा करना ॥ २ ॥
ओर निबाहेहु भायप भाई । करि पितु मातु सुजन सेवकाई ॥ तात भाँति तेहि राखब राऊ । सोच मोर जेहँ करै न काऊ ॥
और हे भाई! पिता, माता और स्वजनोंकी सेवा करके भाईपनेको अन्ततक निबाहना। हे तात! राजा (पिताजी) को उसी प्रकारसे रखना जिससे वे कभी (किसी तरह भी) मेरा सोच न करें ॥ ३ ॥
लखन कहे कछु बचन कठोरा । बरजि राम पुनि मोहि निहोरा ॥ बार बार निज सपथ देवाई । कहबि न तात लखन लरिकाई ॥
लक्ष्मणजीने कुछ कठोर वचन कहे। किन्तु श्रीरामजीने उन्हें बरजकर फिर मुझसे अनुरोध किया और बार-बार अपनी सौगंध दिलायी [और कहा—] हे तात! लक्ष्मणका लड़कपन वहाँ न कहना ॥ ४ ॥
दो०— कहि प्रनामु कछु कहन लिय सिय भड़ सिथिल सनेह ।
थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह ॥ १५२ ॥
प्रणामकर सीताजी भी कुछ कहने लगी थीं, परन्तु स्नेहवश वे शिथिल हो गयीं। उनकी वाणी रुक गयी, नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर रोमाञ्चसे व्याप्त हो गया ॥ १५२ ॥
तेहि अवसर रघुबर रुख पाई । केवट पारहि नाव चलाई ॥ रघुकुलतिलक चले एहि भाँती । देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती ॥
उसी समय श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर केवटने पार जानेके लिये नाव चला दी। इस प्रकार रघुवंशतिलक श्रीरामचन्द्रजी चल दिये और मैं छातीपर वज्र रखकर खड़ा-खड़ा देखता रहा ॥ १ ॥