श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
४७०
- रामचरितमानस *
बार-बार चरणकमलोंको पकड़कर गुरु वसिष्ठजीसे मेरा सँदेसा कहना कि वे वही उपदेश दें जिससे अवधपति पिताजी मेरा सोच न करें ॥ १५१ ॥
पुरजन परिजन सकल निहोरी । तात सुनाएहु बिनती मोरी ॥ सोइ सब भाँति मोर हितकारी । जातें रह नरनाहु सुखारी ॥
हे तात! सब पुरवासियों और कुटुम्बियोंसे निहोरा (अनुरोध) करके मेरी विनती सुनाना कि वही मनुष्य मेरा सब प्रकारसे हितकारी है जिसकी चेष्टासे महाराज सुखी रहें ॥ १ ॥
कहब सँदेसु भरत के आएँ । नीति न तजिअ राजपदु पाएँ ॥ पालेहु प्रजहि करम मन बानी । सेएहु मातु सकल सम जानी ॥
भरतके आनेपर उनको मेरा सँदेसा कहना कि राजाका पद पा जानेपर नीति न छोड़ देना; कर्म, वचन और मनसे प्रजाका पालन करना और सब माताओंको समान जानकर उनकी सेवा करना ॥ २ ॥
ओर निबाहेहु भायप भाई । करि पितु मातु सुजन सेवकाई ॥ तात भाँति तेहि राखब राऊ । सोच मोर जेहँ करै न काऊ ॥
और हे भाई! पिता, माता और स्वजनोंकी सेवा करके भाईपनेको अन्ततक निबाहना। हे तात! राजा (पिताजी) को उसी प्रकारसे रखना जिससे वे कभी (किसी तरह भी) मेरा सोच न करें ॥ ३ ॥
लखन कहे कछु बचन कठोरा । बरजि राम पुनि मोहि निहोरा ॥ बार बार निज सपथ देवाई । कहबि न तात लखन लरिकाई ॥
लक्ष्मणजीने कुछ कठोर वचन कहे। किन्तु श्रीरामजीने उन्हें बरजकर फिर मुझसे अनुरोध किया और बार-बार अपनी सौगंध दिलायी [और कहा—] हे तात! लक्ष्मणका लड़कपन वहाँ न कहना ॥ ४ ॥
दो०— कहि प्रनामु कछु कहन लिय सिय भड़ सिथिल सनेह ।
थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह ॥ १५२ ॥
प्रणामकर सीताजी भी कुछ कहने लगी थीं, परन्तु स्नेहवश वे शिथिल हो गयीं। उनकी वाणी रुक गयी, नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर रोमाञ्चसे व्याप्त हो गया ॥ १५२ ॥
तेहि अवसर रघुबर रुख पाई । केवट पारहि नाव चलाई ॥ रघुकुलतिलक चले एहि भाँती । देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती ॥
उसी समय श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर केवटने पार जानेके लिये नाव चला दी। इस प्रकार रघुवंशतिलक श्रीरामचन्द्रजी चल दिये और मैं छातीपर वज्र रखकर खड़ा-खड़ा देखता रहा ॥ १ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४७१
मैं आपन किमि कहौं कलेसू । जित फिरेउँ लेइ राम सँदेसू ॥ अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ । हानि गलानि सोच बस भयऊ ॥
मैं अपने क्लेशको कैसे कहूँ, जो श्रीरामजीका यह सँदेसा लेकर जीता ही लौट आया! ऐसा कहकर मन्त्रीकी वाणी रुक गयी (वे चुप हो गये) और वे हानिकी ग्लानि और सोचके वश हो गये ॥ २ ॥
सूत बचन सुनतहिं नरनाहू । परेउ धरनि उर दारुन दाहू ॥ तलफत बिषम मोह मन मापा । माजा मनहुँ मीन कहुँ व्यापा ॥
सारथी सुमन्त्रके वचन सुनते ही राजा पृथ्वीपर गिर पड़े, उनके हृदयमें भयानक जलन होने लगी। वे तड़पने लगे, उनका मन भीषण मोहसे व्याकुल हो गया। मानो मछलीको माँजा व्याप गया हो (पहली वर्षाका जल लग गया हो) ॥ ३ ॥
करि बिलाप सब रोवहिं रानी । महा बिपति किमि जाइ बखानी ॥ सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा । धीरजहू कर धीरजु भागा ॥
सब रानियाँ विलाप करके रो रही हैं। उस महान् विपत्तिका कैसे वर्णन किया जाय? उस समयके विलापको सुनकर दुःखको भी दुःख लगा और धीरजका भी धीरज भाग गया! ॥ ४ ॥
दो०— भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु ।
बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहु कुलिस कठोरु ॥ १५३ ॥
राजाके रावले (रनिवास) में [रोनेका] शोर सुनकर अयोध्याभरमें बड़ा भारी कुहराम मच गया! [ऐसा जान पड़ता था] मानो पक्षियोंके विशाल वनमें रातके समय कठोर वज्र गिरा हो ॥ १५३ ॥
प्राण कंठगत भयउ भुआलू । मनि बिहीन जनु व्याकुल व्यालू ॥ इंद्री सकल बिकल भई भारी । जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी ॥
राजाके प्राण कण्ठमें आ गये। मानो मणिके बिना साँप व्याकुल (मरणासन्न) हो गया हो। इन्द्रियाँ सब बहुत ही विकल हो गयीं, मानो बिना जलके तालाबमें कमलोंका वन मुरझा गया हो ॥ १ ॥
कौसल्याँ नृपु दीख मलाना । रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना ॥ उर धरि धीर राम महतारी । बोली बचन समय अनुसारी ॥
कौसल्याजीने राजाको बहुत दुखी देखकर अपने हृदयमें जान लिया कि अब सूर्यकुलका सूर्य अस्त हो चला! तब श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्या हृदयमें धीरज धरकर समयके अनुकूल वचन बोलीं— ॥ २ ॥
नाथ समुद्धि मन करिअ बिचारु । राम बियोग पयोधि अपारु ॥ करनधार तुम्ह अवध जहाजू । चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू ॥
४७२
- रामचरितमानस *
हे नाथ! आप मनमें समझकर विचार कीजिये कि श्रीरामचन्द्रका वियोग अपार समुद्र है। अयोध्या जहाज है और आप उसके कर्णधार (खेनेवाले) हैं। सब प्रियजन (कुटुम्बी और प्रजा) ही यात्रियोंका समाज है जो इस जहाजपर चढ़ा हुआ है ॥ ३ ॥
धीरजु धरिअ त पाइअ पारू । नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू ॥ जौं जियै धरिअ बिनय पिय मोरी । रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी ॥
आप धीरज धरियेगा तो सब पार पहुँच जायँगे। नहीं तो सारा परिवार डूब जायगा। हे प्रिय स्वामी! यदि मेरी विनती हृदयमें धारण कीजियेगा तो श्रीराम, लक्ष्मण, सीता फिर आ मिलेंगे ॥ ४ ॥
दो०—प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उधारि ।
तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि ॥ १५४ ॥
प्रिय पत्नी कौसल्याके कोमल वचन सुनते हुए राजाने आँखें खोलकर देखा! मानो तड़पती हुई दीन मछलीपर कोई शीतल जल छिड़क रहा हो ॥ १५४ ॥
धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू । कहु सुमंत्र कहैं राम कृपालू ॥ कहाँ लखनु कहैं रामु सनेही । कहैं प्रिय पुत्रबधू बैदेही ॥
धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले—सुमन्त्र! कहो, कृपालु श्रीराम कहाँ हैं? लक्ष्मण कहाँ हैं? स्नेही राम कहाँ हैं? और मेरी प्यारी बहू जानकी कहाँ है? ॥ १ ॥
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती । भइ जुग सरिस सिराति न राती ॥ तापस अंध साप सुधि आई । कौसल्याहि सब कथा सुनाई ॥
राजा व्याकुल होकर बहुत प्रकारसे विलाप कर रहे हैं। वह रात युगके समान बड़ी हो गयी, बीतती ही नहीं। राजाको अंधे तपस्वी (श्रवणकुमारके पिता) के शापकी याद आ गयी। उन्होंने सब कथा कौसल्याको कह सुनायी ॥ २ ॥
भयउ बिकल बरनत इतिहासा । राम रहित धिग जीवन आसा ॥ सो तनु राखि करब मैं काहा । जेहिं न प्रेम पनु मोर निबाहा ॥
उस इतिहासका वर्णन करते-करते राजा व्याकुल हो गये और कहने लगे कि श्रीरामके बिना जीनेकी आशाको धिक्कार है। मैं उस शरीरको रखकर क्या करूँगा जिसने मेरा प्रेमका प्रण नहीं निबाहा? ॥ ३ ॥
हा रघुनंदन प्रान पिरिते । तुम्ह बिनु जितत बहुत दिन बीते ॥ हा जानकी लखन हा रघुबर । हा पितु हित चित चातक जलधर ॥
हा रघुकुलको आनन्द देनेवाले मेरे प्राणप्यारे राम! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गये। हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुवर! हा पिताके चित्तरूपी चातकके हित करनेवाले मेघ! ॥ ४ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४७३
दो०—राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥ १५५॥
राम-राम कहकर, फिर राम कहकर, फिर राम-राम कहकर और फिर राम कहकर राजा श्रीरामके विरहमें शरीर त्याग कर सुरलोकको सिधार गये॥ १५५॥
जिअन मरन फलु दसरथ पावा । अंड अनेक अमल जसु छावा॥
जिअत राम बिधु बदनु निहारा । राम बिरह करि मरनु सँवारा॥
जीने और मरनेका फल तो दशरथजीने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेकों ब्रह्माण्डोंमें छा गया। जीते-जी तो श्रीरामचन्द्रजीके चन्द्रमाके समान मुखको देखा और श्रीरामके विरहको निमित्त बनाकर अपना मरण सुधार लिया॥ १॥
सोक बिकल सब रोवहिँ रानी । रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥
करहिँ बिलाप अनेक प्रकारा । परहिँ भूमितल बारहिँ बारा॥
सब रानियाँ शोकके मारे व्याकुल होकर रो रही हैं। वे राजाके रूप, शील, बल और तेजका बखान कर-करके अनेकों प्रकारसे विलाप कर रही हैं और बार-बार धरतीपर गिर-गिर पड़ती हैं॥ २॥
बिलपहिँ बिकल दास अरु दासी । घर घर रुदनु करहिँ पुरबासी॥
अँथयउ आजु भानुकुल भानू । धरम अवधि गुन रूप निधानू॥
दास-दासीगण व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं और नगरनिवासी घर-घर रो रहे हैं। कहते हैं कि आज धर्मकी सीमा, गुण और रूपके भण्डार सूर्यकुलके सूर्य अस्त हो गये॥ ३॥
गारीँ सकल कैकइहि देहीं । नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं॥
एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी । आए सकल महामुनि ग्यानी॥
सब कैकेयीको गालियाँ देते हैं, जिसने संसारभरको बिना नेत्रका (अंधा) कर दिया! इस प्रकार विलाप करते रात बीत गयी। प्रातःकाल सब बड़े-बड़े ज्ञानी मुनि आये॥ ४॥
दो०—तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।
सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास॥ १५६॥
तब बसिष्ठ मुनिने समयके अनुकूल अनेक इतिहास कहकर अपने विज्ञानके प्रकाशसे सबका शोक दूर किया॥ १५६॥
तेल नावँ भरि नूप तनु राखा । दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा॥
धावहु बेगि भरत पहिं जाहू । नूप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू॥
४७४
- रामचरितमानस *
वसिष्ठजीने नावमें तेल भरवाकर राजाके शरीरको उसमें रखवा दिया। फिर दूतोंको बुलवाकर उनसे ऐसा कहा—तुमलोग जल्दी दौड़कर भरतके पास जाओ। राजाकी मृत्युका समाचार कहीं किसीसे न कहना॥ १ ॥
एतनेइ कहेहु भरत सन जाई । गुर बोलाइ पठयउ दोउ भाई॥ सुनि मुनि आयसु धावन धाए । चले बेग बर बाजि लजाए॥
जाकर भरतसे इतना ही कहना कि दोनों भाइयोंको गुरुजीने बुलवा भेजा है। मुनिकी आज्ञा सुनकर धावन (दूत) दौड़े। वे अपने वेगसे उत्तम घोड़ोंको भी लजाते हुए चले॥ २ ॥
अनरथु अवध अरंभेउ जब तें । कुसगुन होहिं भरत कहैं तब तें॥ देखहिं राति भयानक सपना । जागि करहिं कटु कोटि कल्पना॥
जबसे अयोध्यामें अनर्थ प्रारम्भ हुआ, तभीसे भरतजीको अपशकुन होने लगे। वे रातको भयङ्कर स्वप्न देखते थे और जागनेपर [उन स्वप्नोंके कारण] करोड़ों (अनेकों) तरहकी बुरी-बुरी कल्पनाएँ किया करते थे॥ ३ ॥
बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना । सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना॥ मागहिं हृदयँ महेस मनाई । कुसल मातु पितु परिजन भाई॥
[अनिष्टशान्तिके लिये] वे प्रतिदिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दान देते थे। अनेकों विधियोंसे स्रद्धाभिषेक करते थे। महादेवजीको हृदयमें मनाकर उनसे माता-पिता, कुटुम्बी और भाइयोंका कुशल-क्षेम माँगते थे॥ ४ ॥
दो०— एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।
गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ॥ १५७॥
भरतजी इस प्रकार मनमें चिन्ता कर रहे थे कि दूत आ पहुँचे। गुरुजीकी आज्ञा कानोंसे सुनते ही वे गणेशजीको मनाकर चल पड़े॥ १५७॥
चले समीर बेग हय हाँके । नाघत सरित सैल बन बाँके॥ हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई । अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई॥
हवाके समान वेगवाले घोड़ोंको हाँकते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलोंको लॉँघते हुए चले। उनके हृदयमें बड़ा सोच था, कुछ सुहाता न था। मनमें ऐसा सोचते थे कि उड़कर पहुँच जाऊँ॥ १ ॥
एक निमेष बरष सम जाई । एहि बिधि भरत नगर निअराई॥ असगुन होहिं नगर पैठारा । रटहिं कुभाँति कुरखेत करारा॥
- अयोध्याकाण्ड *
४७५
एक-एक निमेष वर्षके समान बीत रहा था। इस प्रकार भरतजी नगरके निकट पहुँचे। नगरमें प्रवेश करते समय अपशकुन होने लगे। कौए बुरी जगह बैठकर बुरी तरहसे काँव-काँव कर रहे हैं ॥ २ ॥
खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला । सुनि सुनि होइ भरत मन सूला ॥ श्रीहत सर सरिता बन बागा । नगरु बिसेषि भयावनु लागा ॥
गदहे और सियार विपरीत बोल रहे हैं। यह सुन-सुनकर भरतके मनमें बड़ी पीड़ा हो रही है। तालाब, नदी, वन, बगीचे सब शोभाहीन हो रहे हैं। नगर बहुत ही भयानक लग रहा है ॥ ३ ॥
खग मृग हय गय जाहिं न जोए । राम बियोग कुरोग बिगोए ॥ नगर नारि नर निपट दुखारी । मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी ॥
श्रीरामजीके वियोगरूपी बुरे रोगसे सताये हुए पक्षी-पशु, घोड़े-हाथी [ऐसे दुखी हो रहे हैं कि] देखे नहीं जाते। नगरके स्त्री-पुरुष अत्यन्त दुखी हो रहे हैं। मानो सब अपनी सारी सम्पत्ति हार बैठे हों ॥ ४ ॥
दो०— पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।
भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय विषाद मन माहिं ॥ १५८ ॥
नगरके लोग मिलते हैं, पर कुछ कहते नहीं; गौँसे (चुपकेसे) जोहार (वन्दना) करके चले जाते हैं। भरतजी भी किसीसे कुशल नहीं पूछ सकते, क्योंकि उनके मनमें भय और विषाद छा रहा है ॥ १५८ ॥
हाट बाट नहिं जाइ निहारी । जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी ॥ आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि । हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि ॥
बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते। मानो नगरमें दसों दिशाओंमें दावागिन लगी है! पुत्रको आते सुनकर सूर्यकुलरूपी कमलके लिये चाँदनीरूपी कैकेयी [बड़ी] हर्षित हुई ॥ १ ॥
सजि आरती मुदित उठि धाई । द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई ॥ भरत दुखित परिवारु निहारा । मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा ॥
वह आरती सजाकर आनन्दमें भरकर उठ दौड़ी और दरवाजेपर ही मिलकर भरत-शत्रुघ्नको महलमें ले आयी। भरतने सारे परिवारको दुखी देखा। मानो कमलोंके वनको पाला मार गया हो ॥ २ ॥
कैकेई हरषित एहि भाँती । मनहुँ मुदित दव लाइ किराती ॥ सुतहि ससोच देखि मनु मारें । पूँछति नैहर कुसल हमारें ॥
४७६
- रामचरितमानस *
एक कैकेयी ही इस तरह हर्षित दीखती है मानो भीलनी जंगलमें आग लगाकर आनन्दमें भर रही हो। पुत्रको सोचवश और मनमारे (बहुत उदास) देखकर वह पूछने लगी—हमारे नैहरमें कुशल तो है? ॥ ३ ॥
सकल कुसल कहि भरत सुनाई । पूँछी निज कुल कुसल भलाई ॥ कहु कहैं तात कहाँ सब माता । कहैं सिय राम लखन प्रिय भ्राता ॥
भरतजीने सब कुशल कह सुनायी। फिर अपने कुलकी कुशल-क्षेम पूछी। [भरतजीने कहा—] कहो, पिताजी कहाँ हैं? मेरी सब माताएँ कहाँ हैं? सीताजी और मेरे प्यारे भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं? ॥ ४ ॥
दो०—सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।
भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन ॥ १५९ ॥
पुत्रके स्नेहमय वचन सुनकर नेत्रोंमें कपटका जल भरकर पापिनी कैकेयी भरतके कानोंमें और मनमें शूलके समान चुभनेवाले वचन बोली— ॥ १५९ ॥
तात बात मैं सकल सँवारी । भै मंथरा सहाय बिचारी ॥ कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ । भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ ॥
हे तात! मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मंथरा सहायक हुई। पर विधत्ताने बीचमें जरा-सा काम बिगाड़ दिया। वह यह कि राजा देवलोकको पधार गये ॥ १ ॥
सुनत भरतु भए बिबस बिषादा । जनु सहमेउ करि केहरि नादा ॥ तात तात हा तात पुकारी । परे भूमितल व्याकुल भारी ॥
भरत यह सुनते ही विषादके मारे विवश (बेहाल) हो गये। मानो सिंहकी गर्जना सुनकर हाथी सहम गया हो। वे 'तात! तात! हा तात!' पुकारते हुए अत्यन्त व्याकुल होकर जमीनपर गिर पड़े ॥ २ ॥
चलत न देखन पायउँ तोही । तात न रामहि सौँपेहु मोही ॥ बहरि धीर धरि उठे सँभारी । कहु पितु मरन हेतु महतारी ॥
[और विलाप करने लगे कि] हे तात! मैं आपको [स्वर्गके लिये] चलते समय देख भी न सका। [हाय!] आप मुझे श्रीरामजीको सौंप भी नहीं गये! फिर धीरज धरकर वे सँभलकर उठे और बोले—माता! पिताके मरनेका कारण तो बताओ ॥ ३ ॥
सुनि सुत बचन कहति कैकेई । मरमु पाँछि जनु माहुर देई ॥ आदिहु तें सब आपनि करनी । कुटिल कठोर मुदित मन बरनी ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४७७
पुत्रका वचन सुनकर कैकेयी कहने लगी। मानो मर्मस्थानको पाछकर (चाकूसे चीरकर) उसमें जहर भर रही हो। कुटिल और कठोर कैकेयीने अपनी सब करनी शुरूसे [आखीरतक बड़े] प्रसन्न मनसे सुना दी ॥ ४ ॥
दो०—भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु ।
हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु ॥ १६० ॥
श्रीरामचन्द्रजीका वन जाना सुनकर भरतजीको पिताका मरण भूल गया और हृदयमें इस सारे अनर्थका कारण अपनेको ही जानकर वे मौन होकर स्तम्भित रह गये (अर्थात् उनकी बोली बंद हो गयी और वे सन्न रह गये) ॥ १६० ॥
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति । मनहुँ जरे पर लोनु लगावति ॥
तात राउ नहिं सोचै जोगू । बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू ॥
पुत्रको व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी। मानो जलेपर नमक लगा रही हो। [वह बोली—] हे तात! राजा सोच करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने पुण्य और यश कमाकर उसका पर्याप्त भोग किया ॥ १ ॥
जीवत सकल जनम फल पाए । अंत अमरपति सदन सिधाए ॥
अस अनुमानि सोच परिहरहू । सहित समाज राज पुर करहू ॥
जीवनकालमें ही उन्होंने जन्म लेनेके सम्पूर्ण फल पा लिये और अन्तमें वे इन्द्रलोकको चले गये। ऐसा विचारकर सोच छोड़ दो और समाजसहित नगरका राज्य करो ॥ २ ॥
सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू । पाकें छत जनु लाग अँगरू ॥
धीरज धरि भरि लेहिं उसासा । पापिनि सबहि भाँति कुल नासा ॥
राजकुमार भरतजी यह सुनकर बहुत ही सहम गये। मानो पके घावपर अँगर छू गया हो। उन्होंने धीरज धरकर बड़ी लंबी साँस लेते हुए कहा—पापिनी! तूने सभी तरहसे कुलका नाश कर दिया ॥ ३ ॥
जों पै कुरुचि रही अति तोही । जनमत काहे न मारे मोही ॥
पेड़ काटि तैं पालउ सींचा । मीन जिअन निति बारि उलीचा ॥
हाय! यदि तेरी ऐसी ही अत्यन्त बुरी रुचि (दुष्ट इच्छा) थी, तो तूने जन्मते ही मुझे मार क्यों नहीं डाला? तूने पेड़को काटकर पत्तेको सींचा है और मछलीके जीनेके लिये पानीको उलीच डाला! (अर्थात् मेरा हित करने जाकर उलटा तूने मेरा अहित कर डाला) ॥ ४ ॥
दो०—हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ।
जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ ॥ १६१ ॥
४७८
- रामचरितमानस *
मुझे सूर्यवंश [–सा वंश], दशरथजी [–सरीखे] पिता और राम–लक्ष्मण–से भाई मिले। पर हे जननी! मुझे जन्म देनेवाली माता तू हुई! [क्या किया जाय!] विधातासे कुछ भी वश नहीं चलता ॥ १६१ ॥
जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ । खंड खंड होइ हदउ न गयऊ ॥ बर मागत मन भइ नहिं पीरा । गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा ॥
अरी कुमति! जब तूने हृदयमें यह बुरा विचार (निश्चय) ठाना, उसी समय तेरे हृदयके टुकड़े-टुकड़े [क्यों] न हो गये? वरदान माँगते समय तेरे मनमें कुछ भी पीड़ा नहीं हुई? तेरी जीभ गल नहीं गयी? तेरे मुँहमें कीड़े नहीं पड़ गये? ॥ १ ॥
भूषँ प्रतीति तोरि किमि कीन्ही । मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही ॥ बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी । सकल कपट अघ अवगुन खानी ॥
राजाने तेरा विश्वास कैसे कर लिया? [जान पड़ता है,] विधाताने मरनेके समय उनकी बुद्धि हर ली थी। स्त्रियोंके हृदयकी गति (चाल) विधाता भी नहीं जान सके। वह सम्पूर्ण कपट, पाप और अवगुणोंकी खान है ॥ २ ॥
सरल सुसील धरम रत राऊ । सो किमि जानै तीय सुभाऊ ॥ अस को जीव जंतु जग माहीं । जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं ॥
फिर राजा तो सीधे, सुशील और धर्मपरायण थे। वे भला, स्त्री-स्वभावको कैसे जानते? अरे, जगत्के जीव-जन्तुओंमें ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजी प्राणोंके समान प्यारे नहीं हैं ॥ ३ ॥
भे अति अहित रामु तेउ तोही । को तू अहसि सत्य कहु मोही ॥ जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई । आँखि ओट उठि बैठहि जाई ॥
वे श्रीरामजी भी तुझे अहित हो गये (वैरी लगे)! तू कौन है? मुझे सच-सच कह! तू जो है, सो है, अब मुँहमें स्याही पोतकर (मुँह काला करके) उठकर मेरी आँखोंकी ओटमें जा बैठ ॥ ४ ॥
दो०—राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि ॥ १६२ ॥
विधाताने मुझे श्रीरामजीसे विरोध करनेवाले (तेरे) हृदयसे उत्पन्न किया [अथवा विधाताने मुझे हृदयसे रामका विरोधी जाहिर कर दिया]। मेरे बराबर पापी दूसरा कौन है? मैं व्यर्थ ही तुझे कुछ कहता हूँ ॥ १६२ ॥
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई । जरहिं गात रिस कछु न बसाई ॥ तेहि अवसर कुबरी तहँ आई । बसन बिभूषन बिबिध बनाई ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४७९
माताकी कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नजीके सब अङ्ग क्रोधसे जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय भाँति-भाँतिके कपड़ों और गहनोंसे सजकर कुबरी (मन्थरा) वहाँ आयी ॥ १ ॥
लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई । बरत अनल घृत आहुति पाई ॥ हुमगि लात तकि कूबर मारा । परि मुह भर महि करत पुकारा ॥
उसे [सजी] देखकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नजी क्रोधमें भर गये। मानो जलती हुई आगको घीकी आहुति मिल गयी हो। उन्होंने जोरसे तककर कूबड़पर एक लात जमा दी। वह चिल्लाती हुई मुँहके बल जमीनपर गिर पड़ी ॥ २ ॥
कूबर टूटेउ फूट कपारू । दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू ॥ आह दड़अ मैं काह नसावा । करत नीक फलु अनइस पावा ॥
उसका कूबड़ टूट गया, कपाल फूट गया, दाँत टूट गये और मुँहसे खून बहने लगा। [वह कराहती हुई बोली—] हाय दैव! मैंने क्या बिगाड़ा? जो भला करते बुरा फल पाया ॥ ३ ॥
सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी । लगे घसीटन धरि धरि झोंटी ॥ भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई । कौसल्या पहिं गे दोउ भाई ॥
उसकी यह बात सुनकर और उसे नखसे शिखातक दुष्ट जानकर शत्रुघ्नजी झोंटा पकड़-पकड़कर उसे घसीटने लगे। तब दयानिधि भरतजीने उसको छुड़ा दिया और दोनों भाई [तुरंत] कौसल्याजीके पास गये ॥ ४ ॥
दो०— मलिन बसन बिबरन बिकल कूस सरीर दुख भार ।
कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार ॥ १६३ ॥
कौसल्याजी मैले वस्त्र पहने हैं, चेहरेका रंग बदला हुआ है, व्याकुल हो रही हैं, दुःखके बोझसे शरीर सूख गया है। ऐसी दीख रही हैं मानो सोनेकी सुन्दर कल्पलताको वनमें पाला मार गया हो ॥ १६३ ॥
भरतहि देखि मातु उठि धाई । मुरुछित अवनि परी झई आई ॥ देखत भरतु बिकल भए भारी । परे चरन तन दसा बिसारी ॥
भरतको देखते ही माता कौसल्याजी उठ दौड़ीं। पर चक्कर आ जानेसे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं। यह देखते ही भरतजी बड़े व्याकुल हो गये और शरीरकी सुध भुलाकर चरणोंमें गिर पड़े ॥ १ ॥
मातु तात कहँ देहि देखाई । कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई ॥ कैकड़ कत जनमी जग माझा । जौँ जनमि त भड़ काहे न बाँझा ॥
४८०
- रामचरितमानस *
[फिर बोले—] माता! पिताजी कहाँ हैं? उन्हें दिखा दे। सीताजी तथा मेरे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण कहाँ हैं? [उन्हें दिखा दे।] कैकेयी जगत्में क्यों जनमी? और यदि जनमी ही तो फिर बाँझ क्यों न हुई?—॥ २ ॥
कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही । अपजस भाजन प्रियजन द्रोही ॥ को तिभुवन मोहि सरिस अभागी । गति असि तोरि मातु जेहि लागी ॥
जिसने कुलके कलंक, अपयशके भाँड़े और प्रियजनोंके द्रोही मुझ-जैसे पुत्रको उत्पन्न किया। तीनों लोकोंमें मेरे समान अभागा कौन है? जिसके कारण, हे माता! तेरी यह दशा हुई!॥ ३ ॥
पितु सुरपुर बन रघुबर केतू । मैं केवल सब अनरथ हेतू ॥ धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी । दुसह दाह दुख दूषन भागी ॥
पिताजी स्वर्गमें हैं और श्रीरामजी वनमें हैं। केतुके समान केवल मैं ही इन सब अनर्थोंका कारण हूँ। मुझे धिक्कार है! मैं बाँसके वनमें आग उत्पन्न हुआ और कठिन दाह, दुःख और दोषोंका भागी बना ॥ ४ ॥
दो०— मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी सँभारि । लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि ॥ १६४ ॥
भरतजीके कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर सँभलकर उठीं। उन्होंने भरतको उठाकर छातीसे लगा लिया और नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं ॥ १६४ ॥
सरल सुभाय मायँ हियँ लाए । अति हित मनहुँ राम फिरि आए ॥ भँटेउ बहुरि लखन लघु भाई । सोकु सनेहु न हृदयँ समाई ॥
सरल स्वभाववाली माताने बड़े प्रेमसे भरतजीको छातीसे लगा लिया; मानो श्रीरामजी ही लौटकर आ गये हों। फिर लक्ष्मणजीके छोटे भाई शत्रुघ्नको हृदयसे लगाया। शोक और स्नेह हृदयमें समाता नहीं है ॥ १ ॥
देखि सुभाउ कहत सबु कोई । राम मातु अस काहे न होई ॥ माताँ भरतु गोद बैठारे । आँसु पोछि मृदु बचन उचारे ॥
कौसल्याजीका स्वभाव देखकर सब कोई कह रहे हैं—श्रीरामकी माताका ऐसा स्वभाव क्यों न हो। माताने भरतजीको गोदमें बैठा लिया और उनके आँसू पोंछकर कोमल वचन बोलीं—॥ २ ॥
अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू । कुसमउ समुझि सोक परिहरहू ॥ जनि मानहु हियँ हानि गलानी । काल करम गति अघटित जानी ॥
हे वत्स! मैं बलैया लेती हूँ। तुम अब भी धीरज थरो। बुरा समय जानकर शोक त्याग दो। काल और कर्मकी गति अमिट जानकर हृदयमें हानि और ग्लानि मत मानो ॥ ३ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४८१
काहुहि दोसु देहु जनि ताता । भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता ॥ जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा । अजहुँ को जानइ का तेहि भावा ॥
हे तात! किसीको दोष मत दो। विधाता मुझको सब प्रकारसे उलटा हो गया है, जो इतने दुःखपर भी मुझे जिला रहा है। अब भी कौन जानता है, उसे क्या भा रहा है? ॥४॥
दो०—पितु आयस भूषण बसन तात तजे रघुबीर।
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर ॥ १६५ ॥
हे तात! पिताकी आज्ञासे श्रीरघुवीरने भूषण-वस्त्र त्याग दिये और बलकल-वस्त्र पहन लिये। उनके हृदयमें न कुछ विषाद था, न हर्ष! ॥१६५॥
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषु । सब कर सब बिधि करि परितोषु ॥ चले बिपिन सुनि सिय संग लागी । रहइ न राम चरन अनुरागी ॥
उनका मुख प्रसन्न था, मनमें न आसक्ति थी, न रोष (द्वेष)। सबका सब तरहसे सन्तोष कराकर वे वनको चले। यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं। श्रीरामके चरणोंकी अनुरागिणी वे किसी तरह न रहीं ॥१॥
सुनतहिं लखनु चले उठि साथा । रहहिं न जतन किए रघुनाथा ॥ तब रघुपति सबही सिरु नाई । चले संग सिय अरु लघु भाई ॥
सुनते ही लक्ष्मण भी साथ ही उठ चले। श्रीरघुनाथने उन्हें रोकनेके बहुत यत्न किये, पर वे न रहे। तब श्रीरघुनाथजी सबको सिर नवाकर सीता और छोटे भाई लक्ष्मणको साथ लेकर चले गये ॥२॥
रामु लखनु सिय बनहि सिधाए । गइउँ न संग न प्रान पठाए ॥ यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगे । तउ न तजा तनु जीव अभागें ॥
श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनको चले गये। मैं न तो साथ ही गयी और न मैंने अपने प्राण ही उनके साथ भेजे। यह सब इन्हीं आँखोंके सामने हुआ। तो भी अभागे जीवने शरीर नहीं छोड़ा ॥३॥
मोहि न लाज निज नेहु निहारी । राम सरिस सुत मैं महतारी ॥ जिए मैरु भल भूपति जाना । मोर हृदय सत कुलिस समाना ॥
अपने स्नेहकी ओर देखकर मुझे लाज भी नहीं आती; राम-सरीखे पुत्रकी मैं माता! जीना और मरना तो राजाने खूब जाना। मेरा हृदय तो सैकड़ों वज्रोंके समान कठोर है ॥४॥
दो०—कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु।
ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु ॥ १६६ ॥
४८२
- रामचरितमानस *
कौसल्याजीके वचनोंको सुनकर भरतसहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा। राजमहल मानो शोकका निवास बन गया ॥ १६६ ॥
बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई । कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई ॥ भाँति अनेक भरतु समुझाए । कहि बिबेकमय बचन सुनाए ॥
भरत, शत्रुघ्न दोनों भाई विकल होकर विलाप करने लगे। तब कौसल्याजीने उनको हृदयसे लगा लिया। अनेकों प्रकारसे भरतजीको समझाया और बहुत-सी विवेकभरी बातें उन्हें कहकर सुनार्यो ॥ १ ॥
भरतहुँ मातु सकल समुझाई । कहि पुरान श्रुति कथा सुहाई ॥ छल बिहीन सुचि सरल सुबानी । बोले भरत जोरि जुग पानी ॥
भरतजीने भी सब माताओंको पुराण और वेदोंकी सुन्दर कथाएँ कहकर समझाया। दोनों हाथ जोड़कर भरतजी छलरहित, पवित्र और सीधी सुन्दर वाणी बोले— ॥ २ ॥
जे अघ मातु पिता सुत मारें । गाड़ गोठ महिसुर पुर जारें ॥ जे अघ तिय बालक बध कीन्हें । मीत महीपति माहुर दीन्हें ॥
जो पाप माता-पिता और पुत्रके मारनेसे होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणोंके नगर जलानेसे होते हैं; जो पाप स्त्री और बालककी हत्या करनेसे होते हैं और जो मित्र और राजाको जहर देनेसे होते हैं— ॥ ३ ॥
जे पातक उपपातक अहहीं । करम बचन मन भव कबि कहहीं ॥ ते पातक मोहि होहुँ बिधाता । जौँ यहु होइ मोर मत माता ॥
कर्म, वचन और मनसे होनेवाले जितने पातक एवं उपपातक (बड़े-छोटे पाप) हैं, जिनको कवि लोग कहते हैं; हे विधाता! यदि इस काममें मेरा मत हो, तो हे माता! वे सब पाप मुझे लगे ॥ ४ ॥
दो०—जे परिहरि हरि हर चरण भजहिं भूतगन घोर ।
तेहि कड़ गति मोहि देउ बिधि जौँ जननी मत मोर ॥ १६७ ॥
जो लोग श्रीहरि और श्रीशंकरजीके चरणोंको छोड़कर भयानक भूत-प्रेतोंको भजते हैं, हे माता! यदि इसमें मेरा मत हो तो विधाता मुझे उनकी गति दे ॥ १६७ ॥
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं । पिसुन पराय पाप कहि देहीं ॥ कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी । बेद बिदूषक बिस्व विरोधी ॥
जो लोग वेदोंको बेचते हैं, धर्मको दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरोंके पापोंको कह देते हैं; जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं, तथा जो वेदोंकी निन्दा करनेवाले और विश्वभरके विरोधी हैं; ॥ १ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४८३
लोभी लंपट लोलुपचारा । जे ताकहिं परधनु परदारा ॥ पावौं मैं तिन्ह कै गति घोरा । जौं जननी यहु संमत मोरा ॥
जो लोभी, लम्पट और लालचियोंका आचरण करनेवाले हैं; जो पराये धन और परायी स्त्रीकी ताकमें रहते हैं; हे जननी! यदि इस काममें मेरी सम्मति हो तो मैं उनकी भयानक गतिको पाऊँ ॥ २ ॥
जे नहिं साधुसंग अनुरागे । परमारथ पथ विमुख अभागे ॥ जे न भजहिं हरि नर तनु पाई । जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई ॥
जिनका सत्सङ्गमें प्रेम नहीं है; जो अभागे परमार्थके मार्गसे विमुख हैं; जो मनुष्यशरीर पाकर श्रीहरिका भजन नहीं करते; जिनको हरि-हर (भगवान् विष्णु और शंकरजी) का सुयश नहीं सुहाता; ॥ ३ ॥
तजि श्रुतिपंथु वाम पथ चलहीं । बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं ॥ तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ । जननी जौं यहु जानौं भेऊ ॥
जो वेदमार्गको छोड़कर वाम (वेदप्रतिकूल) मार्गपर चलते हैं; जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत्को छलते हैं; हे माता! यदि मैं इस भेदको जानता भी होऊँ तो शंकरजी मुझे उन लोगोंकी गति दें ॥ ४ ॥
दो०—मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ ।
कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कार्यँ ॥ १६८ ॥
माता कौसल्याजी भरतजीके स्वाभाविक ही सच्चे और सरल बचनोंको सुनकर कहने लगीं—हे तात! तुम तो मन, वचन और शरीरसे सदा ही श्रीरामचन्द्रके प्यारे हो ॥ १६८ ॥
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे । तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे ॥ बिधु बिष चवै स्ववै हिमु आगी । होइ बारिचर बारि बिरागी ॥
श्रीराम तुम्हारे प्राणोंसे भी बढ़कर प्राण (प्रिय) हैं और तुम भी श्रीरघुनाथको प्राणोंसे भी अधिक प्यारे हो। चन्द्रमा चाहे विष चुआने लगे और पाला आग बरसाने लगे; जलचर जीव जलसे विरक्त हो जाय, ॥ १ ॥
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू । तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू ॥ मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं । सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं ॥
और ज्ञान हो जानेपर भी चाहे मोह न मिटे; पर तुम श्रीरामचन्द्रके प्रतिकूल कभी नहीं हो सकते। इसमें तुम्हारी सम्मति है, जगत्में जो कोई ऐसा कहते हैं वे स्वप्नमें भी सुख और शुभ गति नहीं पावेंगे ॥ २ ॥
४८४
- रामचरितमानस *
अस कहि मातु भरतु हियँ लाए । थन पय स्ववहिं नयन जल छाए ॥ करत बिलाप बहुत एहि भाँती । बैठेहिं बीति गई सब राती ॥
ऐसा कहकर माता कौसल्याने भरतजीको हृदयसे लगा लिया। उनके स्तनोंसे दूध बहने लगा और नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल छा गया। इस प्रकार बहुत विलाप करते हुए सारी रात बैठे-ही-बैठे बीत गयी ॥ ३ ॥
वामदेउ बसिष्ठ तब आए । सचिव महाजन सकल बोलाए ॥ मुनि बहु भाँति भरत उपदेशे । कहि परमारथ बचन सुदेशे ॥
तब वामदेवजी और वसिष्ठजी आये। उन्होंने सब मन्त्रियों तथा महाजनोंको बुलवाया। फिर मुनि वसिष्ठजीने परमार्थके सुन्दर समयानुकूल वचन कहकर बहुत प्रकारसे भरतजीको उपदेश दिया ॥ ४ ॥
दो०—तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।
उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु ॥ १६९ ॥
[वसिष्ठजीने कहा—] हे तात! हृदयमें धीरज धरो और आज जिस कार्यके करनेका अवसर है, उसे करो। गुरुजीके वचन सुनकर भरतजी उठे और उन्होंने सब तैयारी करनेके लिये कहा ॥ १६९ ॥
नृप तनु बेद बिदित अन्हवावा । परम बिचित्र बिमानु बनावा ॥ गहि पद भरत मातु सब राखी । रहीं रानि दरसन अभिलाषी ॥
वेदोंमें बतायी हुई विधिसे राजाकी देहको स्नान कराया गया और परम विचित्र विमान बनाया गया। भरतजीने सब माताओंको चरण पकड़कर रखा (अर्थात् प्रार्थना करके उनको सती होनेसे रोक लिया)। वे रानियाँ भी [श्रीरामके] दर्शनकी अभिलाषासे रह गयीं ॥ १ ॥
चंदन अगर भार बहु आए । अमित अनेक सुगंध सुहाए ॥ सरजु तीर रचि चिता बनाई । जनु सुरपुर सोपान सुहाई ॥
चन्दन और अगरके तथा और भी अनेकों प्रकारके अपार [कपूर, गुग्गुल, केसर आदि] सुगन्ध-द्रव्योंके बहुत-से बोझ आये। सरयूजीके तटपर सुन्दर चिता रचकर बनायी गयी, [जो ऐसी मालूम होती थी] मानो स्वर्गकी सुन्दर सीढ़ी हो ॥ २ ॥
एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही । बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही ॥ सोधि सुमृति सब बेद पुराना । कीन्ह भरत दसगात बिधाना ॥
इस प्रकार सब दाहक्रिया की गयी और सबने विधिपूर्वक स्नान करके तिलाञ्जलि दी। फिर वेद, स्मृति और पुराण सबका मत निश्चय करके उसके अनुसार भरतजीने पिताका दशगात्र-विधान(दस दिनोंके कृत्य) किया ॥ ३ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४८५
जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा । तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा ॥ भए बिसुद्ध दिए सब दाना । धेनु बाजि गज बाहन नाना ॥
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने जहाँ जैसी आज्ञा दी, वहाँ भरतजीने सब वैसा ही हजारों प्रकारसे किया। शुद्ध हो जानेपर [विधिपूर्वक] सब दान दिये। गौएँ तथा घोड़े, हाथी आदि अनेक प्रकारकी सवारियाँ, ॥ ४ ॥
दो०— सिंधासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम । दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम ॥ १७० ॥
सिंहासन, गहने, कपड़े, अन्न, पृथ्वी, धन और मकान भरतजीने दिये; भूदेव ब्राह्मण दान पाकर परिपूर्णकाम हो गये (अर्थात् उनकी सारी मनोकामनाएँ अच्छी तरहसे पूरी हो गयीं) ॥ १७० ॥
पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी । सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी ॥ सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए । सचिव महाजन सकल बोलाए ॥
पिताजीके लिये भरतजीने जैसी करनी की वह लाखों मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जा सकती। तब शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी आये और उन्होंने मन्त्रियों तथा सब महाजनोंको बुलवाया ॥ १ ॥
बैठे राजसभाँ सब जाई । पठए बोलि भरत दोउ भाई ॥ भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे । नीति धरममय बचन उचारे ॥
सब लोग राजसभामें जाकर बैठ गये। तब मुनिने भरतजी तथा शत्रुघ्नजी दोनों भाइयोंको बुलवा भेजा। भरतजीको वसिष्ठजीने अपने पास बैठा लिया और नीति तथा धर्मसे भरे हुए वचन कहे ॥ २ ॥
प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी । कैकड़ कुटिल कीन्हि जसि करनी ॥ भूप धरमव्रतु सत्य सराहा । जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा ॥
पहले तो कैकेयीने जैसी कुटिल करनी की थी, श्रेष्ठ मुनिने वह सारी कथा कही। फिर राजाके धर्मव्रत और सत्यकी सराहना की, जिन्होंने शरीर त्यागकर प्रेमको निबाहा ॥ ३ ॥
कहत राम गुन सील सुभाऊ । सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ ॥ बहरि लखन सिय प्रीति बखानी । सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी ॥
श्रीरामचन्द्रजीके गुण, शील और स्वभावका वर्णन करते-करते तो मुनिराजके नेत्रोंमें जल भर आया और वे शरीरसे पुलकित हो गये। फिर लक्ष्मणजी और सीताजीके प्रेमकी बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्नेहमें मग्न हो गये ॥ ४ ॥
४८६
- रामचरितमानस *
दो०—सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ ।
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ॥ १७१ ॥
मुनिनाथने विलखकर (दुखी होकर) कहा—हे भरत! सुनो, भावी (होनहार) बड़ी बलवान् है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाताके हाथ हैं ॥ १७१ ॥
अस बिचारि केहि देइअ दोसू । ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू ॥
तात बिचारु करहु मन माहीं । सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं ॥
ऐसा विचारकर किसे दोष दिया जाय? और व्यर्थ किसपर क्रोध किया जाय? हे तात! मनमें विचार करो। राजा दशरथ सोच करनेके योग्य नहीं हैं ॥ १ ॥
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना । तजि निज धरमु बिषय लयलीना ॥
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना । जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ॥
सोच उस ब्राह्मणका करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय-भोगमें ही लीन रहता है। उस राजाका सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणोंके समान प्यारी नहीं है ॥ २ ॥
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू । जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ॥
सोचिअ सृद्धु बिप्र अवमानी । मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी ॥
उस वैश्यका सोच करना चाहिये जो धनवान् होकर भी कंजूस है, और जो अतिथिसत्कार तथा शिवजीकी भक्ति करनेमें कुशल नहीं है। उस शूद्रका सोच करना चाहिये जो ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाला, बहुत बोलनेवाला, मान-बड़ाई चाहनेवाला और ज्ञानका घर्मंड रखनेवाला है ॥ ३ ॥
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी । कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ॥
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई । जो नहिं गुर आयसु अनुसरई ॥
पुनः उस स्त्रीका सोच करना चाहिये जो पतिको छलनेवाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है। उस ब्रह्मचारीका सोच करना चाहिये जो अपने ब्रह्मचर्य-व्रतको छोड़ देता है और गुरुकी आज्ञाके अनुसार नहीं चलता ॥ ४ ॥
दो०— सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग ।
सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग ॥ १७२ ॥
उस गृहस्थका सोच करना चाहिये जो मोहवश कर्ममार्गका त्याग कर देता है; उस संन्यासीका सोच करना चाहिये जो दुनियाके प्रपञ्चमें फँसा हुआ है और ज्ञान-वैराग्यसे हीन है ॥ १७२ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४८७
बैखानस सोइ सोचै जोगू । तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू ॥ सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी । जननि जनक गुर बंधु बिरोधी ॥
वानप्रस्थ वही सोच करनेयोग्य है जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना ही कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई-बन्धुओंके साथ विरोध रखनेवाला है ॥ १ ॥
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी । निज तनु पोषक निरदय भारी ॥ सोचनीय सबहीं बिधि सोई । जो न छाड़ि छलु हरि जन होई ॥
सब प्रकारसे उसका सोच करना चाहिये जो दूसरोंका अनिष्ट करता है, अपने ही शरीरका पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है। और वह तो सभी प्रकारसे सोच करनेयोग्य है जो छल छोड़कर हरिका भक्त नहीं होता ॥ २ ॥
सोचनीय नहीं कोसलराऊ । भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥ भयउ न अहइ न अब होनिहारा । भूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥
कोसलराज दशरथजी सोच करनेयोग्य नहीं हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें प्रकट है। हे भरत! तुम्हारे पिता-जैसा राजा तो न हुआ, न है और न अब होनेका ही है ॥ ३ ॥
बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा ॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और दिक्पाल सभी दशरथजीके गुणोंकी कथाएँ कहा करते हैं ॥ ४ ॥
दो०—कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तामु ।
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ॥ १७३ ॥
हे तात! कहो, उनकी बड़ाई कोई किस प्रकार करेगा जिनके श्रीराम, लक्ष्मण, तुम और शत्रुघ्न-सरीखे पवित्र पुत्र हैं? ॥ १७३ ॥
सब प्रकार भूपति बड़भागी । बादि बिषादु करिअ तेहि लागी ॥ यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू । सिर धरि राज रजायसु करहू ॥
राजा सब प्रकारसे बड़भागी थे। उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझकर सोच त्याग दो और राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो ॥ १ ॥
रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा । पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा ॥ तजे रामु जेहिं बचनहि लागी । तनु परिहरेउ राम बिरहागी ॥
राजाने राजपद तुमको दिया है। पिताका वचन तुम्हें सत्य करना चाहिये, जिन्होंने वचनके लिये ही श्रीरामचन्द्रजीको त्याग दिया और रामविरहकी अग्निमें अपने शरीरकी आहुति दे दी ॥ २ ॥
४८८
- रामचरितमानस *
नृपहि बचन प्रिय नहीं प्रिय प्राना । करहु तात पितु बचन प्रवाना ॥ करहु सीस धरि भूप रजाई । हड़ तुम्ह कहैं सब भाँति भलाई ॥
राजाको वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे। इसलिये हे तात! पिताके वचनोंको प्रमाण (सत्य) करो! राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसमें तुम्हारी सब तरह भलाई है ॥ ३ ॥
परसुराम पितु अग्या राखी । मारी मातु लोक सब सारखी ॥ तनय जजातिहि जौबनु दयऊ । पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ ॥
परशुरामजीने पिताकी आज्ञा रखी और माताको मार डाला; सब लोक इस बातके साक्षी हैं। राजा यथातिके पुत्रने पिताको अपनी जवानी दे दी। पिताकी आज्ञा पालन करनेसे उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ ॥ ४ ॥
दो०—अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन ।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥ १७४ ॥
जो अनुचित और उचितका विचार छोड़कर पिताके वचनोंका पालन करते हैं, वे [यहाँ] सुख और सुयशके पात्र होकर अन्तमें इन्द्रपुरी (स्वर्ग)–में निवास करते हैं ॥ १७४ ॥
अवसि नरेस बचन फुर करहू । पालहु प्रजा सोकु परिहरहू ॥ सुरपुर नृपु पाइहि परितोषु । तुम्ह कहूँ सुकृतु सुजसु नहिं दोषु ॥
राजाका वचन अवश्य सत्य करो। शोक त्याग दो और प्रजाका पालन करो। ऐसा करनेसे स्वर्गमें राजा सन्तोष पावेंगे और तुमको पुण्य और सुन्दर यश मिलेगा, दोष नहीं लेगेगा ॥ १ ॥
बेद बिदित संमत सबही का । जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥ करहु राजु परिहरहु गलानी । मानहु मोर बचन हित जानी ॥
यह वेदमें प्रसिद्ध है और [स्मृति-पुराणादि] सभी शास्त्रोंके द्वारा सम्मत है कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है। इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानिका त्याग कर दो। मेरे वचनको हित समझकर मानो ॥ २ ॥
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं । अनुचित कहब न पंडित केहीं ॥ कौसल्यादि सकल महतारीं । तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं ॥
इस बातको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी सुख पावेंगे और कोई पण्डित इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्याजी आदि तुम्हारी सब माताएँ भी प्रजाके सुखसे सुखी होंगी ॥ ३ ॥
परम तुम्हार राम कर जानिहि । सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि ॥ सौँपेहु राजु राम के आएँ । सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
४८१
जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजीके श्रेष्ठ सम्बन्धको जान लेगा, वह सभी प्रकारसे तुमसे भला मानेगा। श्रीरामचन्द्रजीके लौट आनेपर राज्य उन्हें सौंप देना और सुन्दर स्नेहसे उनकी सेवा करना ॥ ४ ॥
दो०—कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि ॥ १७५ ॥
मन्त्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं—गुरुजीकी आज्ञाका अवश्य ही पालन कीजिये। श्रीरघुनाथजीके लौट आनेपर जैसा उचित हो, तब फिर वैसा ही कीजियेगा ॥ १७५ ॥
कौसल्या धरि धीरजु कहई । पूत पथ्य गुर आयसु अहई ॥ सो आदरिअ करिअ हित मानी । तजिअ बिषादु काल गति जानी ॥
कौसल्याजी भी धीरज धरकर कह रही हैं—हे पुत्र! गुरुजीकी आज्ञा पथ्यरूप है। उसका आदर करना चाहिये और हित मानकर उसका पालन करना चाहिये। कालकी गतिको जानकर विषादका त्याग कर देना चाहिये ॥ १ ॥
बन रघुपति सुरपुर नरनाहू । तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू ॥ परिजन प्रजा सचिव सब अंबा । तुम्हही सुत सब कहैं अवलंबा ॥
श्रीरघुनाथजी वनमें हैं, महाराज स्वर्गका राज्य करने चले गये। और हे तात! तुम इस प्रकार कातर हो रहे हो। हे पुत्र! कुटुम्ब, प्रजा, मन्त्री और सब माताओंके—सबके एक तुम ही सहारे हो ॥ २ ॥
लखि बिधि बाम कालु कठिनाई । धीरजु धरहु मातु बलि जाई ॥ सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू । प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू ॥
विधाताको प्रतिकूल और कालको कठोर देखकर धीरज धरो, माता तुम्हारी बलिहारी जाती है। गुरुकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसीके अनुसार कार्य करो और प्रजाका पालन कर कुटुम्बियोंका दुःख हरो ॥ ३ ॥
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु । सुने भरत हिय हित जनु चंदनु ॥ सुनी बहोरि मातु मृदु बानी । सील सनेह सरल रस सानी ॥
भरतजीने गुरुके वचनों और मन्त्रियोंके अभिनन्दन (अनुमोदन) को सुना, जो उनके हृदयके लिये मानो चन्दनके समान [शीतल] थे। फिर उन्होंने शील, स्नेह और सरलताके रसमें सनी हुई माता कौसल्याकी कोमल वाणी सुनी ॥ ४ ॥
छं०—सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु व्याकुल भए । लोचन सरोरुह स्वत सौंचत बिरह उर अंकुर नए ॥ सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की । तुलसी सराहत सकल सादर सीवैं सहज सनेह की ॥