भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 481
  • अयोध्याकाण्ड *

४७९

माताकी कुटिलता सुनकर शत्रुघ्‍नजीके सब अङ्ग क्रोधसे जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय भाँति-भाँतिके कपड़ों और गहनोंसे सजकर कुबरी (मन्थरा) वहाँ आयी ॥ १ ॥

लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई । बरत अनल घृत आहुति पाई ॥ हुमगि लात तकि कूबर मारा । परि मुह भर महि करत पुकारा ॥

उसे [सजी] देखकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्‍नजी क्रोधमें भर गये। मानो जलती हुई आगको घीकी आहुति मिल गयी हो। उन्होंने जोरसे तककर कूबड़पर एक लात जमा दी। वह चिल्लाती हुई मुँहके बल जमीनपर गिर पड़ी ॥ २ ॥

कूबर टूटेउ फूट कपारू । दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू ॥ आह दड़अ मैं काह नसावा । करत नीक फलु अनइस पावा ॥

उसका कूबड़ टूट गया, कपाल फूट गया, दाँत टूट गये और मुँहसे खून बहने लगा। [वह कराहती हुई बोली—] हाय दैव! मैंने क्या बिगाड़ा? जो भला करते बुरा फल पाया ॥ ३ ॥

सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी । लगे घसीटन धरि धरि झोंटी ॥ भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई । कौसल्या पहिं गे दोउ भाई ॥

उसकी यह बात सुनकर और उसे नखसे शिखातक दुष्ट जानकर शत्रुघ्‍नजी झोंटा पकड़-पकड़कर उसे घसीटने लगे। तब दयानिधि भरतजीने उसको छुड़ा दिया और दोनों भाई [तुरंत] कौसल्याजीके पास गये ॥ ४ ॥

दो०— मलिन बसन बिबरन बिकल कूस सरीर दुख भार ।

कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार ॥ १६३ ॥

कौसल्याजी मैले वस्त्र पहने हैं, चेहरेका रंग बदला हुआ है, व्याकुल हो रही हैं, दुःखके बोझसे शरीर सूख गया है। ऐसी दीख रही हैं मानो सोनेकी सुन्दर कल्पलताको वनमें पाला मार गया हो ॥ १६३ ॥

भरतहि देखि मातु उठि धाई । मुरुछित अवनि परी झई आई ॥ देखत भरतु बिकल भए भारी । परे चरन तन दसा बिसारी ॥

भरतको देखते ही माता कौसल्याजी उठ दौड़ीं। पर चक्कर आ जानेसे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं। यह देखते ही भरतजी बड़े व्याकुल हो गये और शरीरकी सुध भुलाकर चरणोंमें गिर पड़े ॥ १ ॥

मातु तात कहँ देहि देखाई । कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई ॥ कैकड़ कत जनमी जग माझा । जौँ जनमि त भड़ काहे न बाँझा ॥