श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 482, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
[फिर बोले—] माता! पिताजी कहाँ हैं? उन्हें दिखा दे। सीताजी तथा मेरे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण कहाँ हैं? [उन्हें दिखा दे।] कैकेयी जगत्में क्यों जनमी? और यदि जनमी ही तो फिर बाँझ क्यों न हुई?—॥ २ ॥
कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही । अपजस भाजन प्रियजन द्रोही ॥ को तिभुवन मोहि सरिस अभागी । गति असि तोरि मातु जेहि लागी ॥
जिसने कुलके कलंक, अपयशके भाँड़े और प्रियजनोंके द्रोही मुझ-जैसे पुत्रको उत्पन्न किया। तीनों लोकोंमें मेरे समान अभागा कौन है? जिसके कारण, हे माता! तेरी यह दशा हुई!॥ ३ ॥
पितु सुरपुर बन रघुबर केतू । मैं केवल सब अनरथ हेतू ॥ धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी । दुसह दाह दुख दूषन भागी ॥
पिताजी स्वर्गमें हैं और श्रीरामजी वनमें हैं। केतुके समान केवल मैं ही इन सब अनर्थोंका कारण हूँ। मुझे धिक्कार है! मैं बाँसके वनमें आग उत्पन्न हुआ और कठिन दाह, दुःख और दोषोंका भागी बना ॥ ४ ॥
दो०— मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी सँभारि । लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि ॥ १६४ ॥
भरतजीके कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर सँभलकर उठीं। उन्होंने भरतको उठाकर छातीसे लगा लिया और नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं ॥ १६४ ॥
सरल सुभाय मायँ हियँ लाए । अति हित मनहुँ राम फिरि आए ॥ भँटेउ बहुरि लखन लघु भाई । सोकु सनेहु न हृदयँ समाई ॥
सरल स्वभाववाली माताने बड़े प्रेमसे भरतजीको छातीसे लगा लिया; मानो श्रीरामजी ही लौटकर आ गये हों। फिर लक्ष्मणजीके छोटे भाई शत्रुघ्नको हृदयसे लगाया। शोक और स्नेह हृदयमें समाता नहीं है ॥ १ ॥
देखि सुभाउ कहत सबु कोई । राम मातु अस काहे न होई ॥ माताँ भरतु गोद बैठारे । आँसु पोछि मृदु बचन उचारे ॥
कौसल्याजीका स्वभाव देखकर सब कोई कह रहे हैं—श्रीरामकी माताका ऐसा स्वभाव क्यों न हो। माताने भरतजीको गोदमें बैठा लिया और उनके आँसू पोंछकर कोमल वचन बोलीं—॥ २ ॥
अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू । कुसमउ समुझि सोक परिहरहू ॥ जनि मानहु हियँ हानि गलानी । काल करम गति अघटित जानी ॥
हे वत्स! मैं बलैया लेती हूँ। तुम अब भी धीरज थरो। बुरा समय जानकर शोक त्याग दो। काल और कर्मकी गति अमिट जानकर हृदयमें हानि और ग्लानि मत मानो ॥ ३ ॥