भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 483
  • अयोध्याकाण्ड *

४८१

काहुहि दोसु देहु जनि ताता । भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता ॥ जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा । अजहुँ को जानइ का तेहि भावा ॥

हे तात! किसीको दोष मत दो। विधाता मुझको सब प्रकारसे उलटा हो गया है, जो इतने दुःखपर भी मुझे जिला रहा है। अब भी कौन जानता है, उसे क्या भा रहा है? ॥४॥

दो०—पितु आयस भूषण बसन तात तजे रघुबीर।

बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर ॥ १६५ ॥

हे तात! पिताकी आज्ञासे श्रीरघुवीरने भूषण-वस्त्र त्याग दिये और बलकल-वस्त्र पहन लिये। उनके हृदयमें न कुछ विषाद था, न हर्ष! ॥१६५॥

मुख प्रसन्न मन रंग न रोषु । सब कर सब बिधि करि परितोषु ॥ चले बिपिन सुनि सिय संग लागी । रहइ न राम चरन अनुरागी ॥

उनका मुख प्रसन्न था, मनमें न आसक्ति थी, न रोष (द्वेष)। सबका सब तरहसे सन्तोष कराकर वे वनको चले। यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं। श्रीरामके चरणोंकी अनुरागिणी वे किसी तरह न रहीं ॥१॥

सुनतहिं लखनु चले उठि साथा । रहहिं न जतन किए रघुनाथा ॥ तब रघुपति सबही सिरु नाई । चले संग सिय अरु लघु भाई ॥

सुनते ही लक्ष्मण भी साथ ही उठ चले। श्रीरघुनाथने उन्हें रोकनेके बहुत यत्न किये, पर वे न रहे। तब श्रीरघुनाथजी सबको सिर नवाकर सीता और छोटे भाई लक्ष्मणको साथ लेकर चले गये ॥२॥

रामु लखनु सिय बनहि सिधाए । गइउँ न संग न प्रान पठाए ॥ यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगे । तउ न तजा तनु जीव अभागें ॥

श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनको चले गये। मैं न तो साथ ही गयी और न मैंने अपने प्राण ही उनके साथ भेजे। यह सब इन्हीं आँखोंके सामने हुआ। तो भी अभागे जीवने शरीर नहीं छोड़ा ॥३॥

मोहि न लाज निज नेहु निहारी । राम सरिस सुत मैं महतारी ॥ जिए मैरु भल भूपति जाना । मोर हृदय सत कुलिस समाना ॥

अपने स्नेहकी ओर देखकर मुझे लाज भी नहीं आती; राम-सरीखे पुत्रकी मैं माता! जीना और मरना तो राजाने खूब जाना। मेरा हृदय तो सैकड़ों वज्रोंके समान कठोर है ॥४॥

दो०—कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु।

ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु ॥ १६६ ॥