श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 484, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
कौसल्याजीके वचनोंको सुनकर भरतसहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा। राजमहल मानो शोकका निवास बन गया ॥ १६६ ॥
बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई । कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई ॥ भाँति अनेक भरतु समुझाए । कहि बिबेकमय बचन सुनाए ॥
भरत, शत्रुघ्न दोनों भाई विकल होकर विलाप करने लगे। तब कौसल्याजीने उनको हृदयसे लगा लिया। अनेकों प्रकारसे भरतजीको समझाया और बहुत-सी विवेकभरी बातें उन्हें कहकर सुनार्यो ॥ १ ॥
भरतहुँ मातु सकल समुझाई । कहि पुरान श्रुति कथा सुहाई ॥ छल बिहीन सुचि सरल सुबानी । बोले भरत जोरि जुग पानी ॥
भरतजीने भी सब माताओंको पुराण और वेदोंकी सुन्दर कथाएँ कहकर समझाया। दोनों हाथ जोड़कर भरतजी छलरहित, पवित्र और सीधी सुन्दर वाणी बोले— ॥ २ ॥
जे अघ मातु पिता सुत मारें । गाड़ गोठ महिसुर पुर जारें ॥ जे अघ तिय बालक बध कीन्हें । मीत महीपति माहुर दीन्हें ॥
जो पाप माता-पिता और पुत्रके मारनेसे होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणोंके नगर जलानेसे होते हैं; जो पाप स्त्री और बालककी हत्या करनेसे होते हैं और जो मित्र और राजाको जहर देनेसे होते हैं— ॥ ३ ॥
जे पातक उपपातक अहहीं । करम बचन मन भव कबि कहहीं ॥ ते पातक मोहि होहुँ बिधाता । जौँ यहु होइ मोर मत माता ॥
कर्म, वचन और मनसे होनेवाले जितने पातक एवं उपपातक (बड़े-छोटे पाप) हैं, जिनको कवि लोग कहते हैं; हे विधाता! यदि इस काममें मेरा मत हो, तो हे माता! वे सब पाप मुझे लगे ॥ ४ ॥
दो०—जे परिहरि हरि हर चरण भजहिं भूतगन घोर ।
तेहि कड़ गति मोहि देउ बिधि जौँ जननी मत मोर ॥ १६७ ॥
जो लोग श्रीहरि और श्रीशंकरजीके चरणोंको छोड़कर भयानक भूत-प्रेतोंको भजते हैं, हे माता! यदि इसमें मेरा मत हो तो विधाता मुझे उनकी गति दे ॥ १६७ ॥
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं । पिसुन पराय पाप कहि देहीं ॥ कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी । बेद बिदूषक बिस्व विरोधी ॥
जो लोग वेदोंको बेचते हैं, धर्मको दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरोंके पापोंको कह देते हैं; जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं, तथा जो वेदोंकी निन्दा करनेवाले और विश्वभरके विरोधी हैं; ॥ १ ॥