भारतकोश
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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

४८०

  • रामचरितमानस *

[फिर बोले—] माता! पिताजी कहाँ हैं? उन्हें दिखा दे। सीताजी तथा मेरे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण कहाँ हैं? [उन्हें दिखा दे।] कैकेयी जगत्में क्यों जनमी? और यदि जनमी ही तो फिर बाँझ क्यों न हुई?—॥ २ ॥

कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही । अपजस भाजन प्रियजन द्रोही ॥ को तिभुवन मोहि सरिस अभागी । गति असि तोरि मातु जेहि लागी ॥

जिसने कुलके कलंक, अपयशके भाँड़े और प्रियजनोंके द्रोही मुझ-जैसे पुत्रको उत्पन्न किया। तीनों लोकोंमें मेरे समान अभागा कौन है? जिसके कारण, हे माता! तेरी यह दशा हुई!॥ ३ ॥

पितु सुरपुर बन रघुबर केतू । मैं केवल सब अनरथ हेतू ॥ धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी । दुसह दाह दुख दूषन भागी ॥

पिताजी स्वर्गमें हैं और श्रीरामजी वनमें हैं। केतुके समान केवल मैं ही इन सब अनर्थोंका कारण हूँ। मुझे धिक्कार है! मैं बाँसके वनमें आग उत्पन्न हुआ और कठिन दाह, दुःख और दोषोंका भागी बना ॥ ४ ॥

दो०— मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी सँभारि । लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि ॥ १६४ ॥

भरतजीके कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर सँभलकर उठीं। उन्होंने भरतको उठाकर छातीसे लगा लिया और नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं ॥ १६४ ॥

सरल सुभाय मायँ हियँ लाए । अति हित मनहुँ राम फिरि आए ॥ भँटेउ बहुरि लखन लघु भाई । सोकु सनेहु न हृदयँ समाई ॥

सरल स्वभाववाली माताने बड़े प्रेमसे भरतजीको छातीसे लगा लिया; मानो श्रीरामजी ही लौटकर आ गये हों। फिर लक्ष्मणजीके छोटे भाई शत्रुघ्नको हृदयसे लगाया। शोक और स्नेह हृदयमें समाता नहीं है ॥ १ ॥

देखि सुभाउ कहत सबु कोई । राम मातु अस काहे न होई ॥ माताँ भरतु गोद बैठारे । आँसु पोछि मृदु बचन उचारे ॥

कौसल्याजीका स्वभाव देखकर सब कोई कह रहे हैं—श्रीरामकी माताका ऐसा स्वभाव क्यों न हो। माताने भरतजीको गोदमें बैठा लिया और उनके आँसू पोंछकर कोमल वचन बोलीं—॥ २ ॥

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू । कुसमउ समुझि सोक परिहरहू ॥ जनि मानहु हियँ हानि गलानी । काल करम गति अघटित जानी ॥

हे वत्स! मैं बलैया लेती हूँ। तुम अब भी धीरज थरो। बुरा समय जानकर शोक त्याग दो। काल और कर्मकी गति अमिट जानकर हृदयमें हानि और ग्लानि मत मानो ॥ ३ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४८१

काहुहि दोसु देहु जनि ताता । भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता ॥ जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा । अजहुँ को जानइ का तेहि भावा ॥

हे तात! किसीको दोष मत दो। विधाता मुझको सब प्रकारसे उलटा हो गया है, जो इतने दुःखपर भी मुझे जिला रहा है। अब भी कौन जानता है, उसे क्या भा रहा है? ॥४॥

दो०—पितु आयस भूषण बसन तात तजे रघुबीर।

बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर ॥ १६५ ॥

हे तात! पिताकी आज्ञासे श्रीरघुवीरने भूषण-वस्त्र त्याग दिये और बलकल-वस्त्र पहन लिये। उनके हृदयमें न कुछ विषाद था, न हर्ष! ॥१६५॥

मुख प्रसन्न मन रंग न रोषु । सब कर सब बिधि करि परितोषु ॥ चले बिपिन सुनि सिय संग लागी । रहइ न राम चरन अनुरागी ॥

उनका मुख प्रसन्न था, मनमें न आसक्ति थी, न रोष (द्वेष)। सबका सब तरहसे सन्तोष कराकर वे वनको चले। यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं। श्रीरामके चरणोंकी अनुरागिणी वे किसी तरह न रहीं ॥१॥

सुनतहिं लखनु चले उठि साथा । रहहिं न जतन किए रघुनाथा ॥ तब रघुपति सबही सिरु नाई । चले संग सिय अरु लघु भाई ॥

सुनते ही लक्ष्मण भी साथ ही उठ चले। श्रीरघुनाथने उन्हें रोकनेके बहुत यत्न किये, पर वे न रहे। तब श्रीरघुनाथजी सबको सिर नवाकर सीता और छोटे भाई लक्ष्मणको साथ लेकर चले गये ॥२॥

रामु लखनु सिय बनहि सिधाए । गइउँ न संग न प्रान पठाए ॥ यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगे । तउ न तजा तनु जीव अभागें ॥

श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनको चले गये। मैं न तो साथ ही गयी और न मैंने अपने प्राण ही उनके साथ भेजे। यह सब इन्हीं आँखोंके सामने हुआ। तो भी अभागे जीवने शरीर नहीं छोड़ा ॥३॥

मोहि न लाज निज नेहु निहारी । राम सरिस सुत मैं महतारी ॥ जिए मैरु भल भूपति जाना । मोर हृदय सत कुलिस समाना ॥

अपने स्नेहकी ओर देखकर मुझे लाज भी नहीं आती; राम-सरीखे पुत्रकी मैं माता! जीना और मरना तो राजाने खूब जाना। मेरा हृदय तो सैकड़ों वज्रोंके समान कठोर है ॥४॥

दो०—कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु।

ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु ॥ १६६ ॥

४८२

  • रामचरितमानस *

कौसल्याजीके वचनोंको सुनकर भरतसहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा। राजमहल मानो शोकका निवास बन गया ॥ १६६ ॥

बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई । कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई ॥ भाँति अनेक भरतु समुझाए । कहि बिबेकमय बचन सुनाए ॥

भरत, शत्रुघ्न दोनों भाई विकल होकर विलाप करने लगे। तब कौसल्याजीने उनको हृदयसे लगा लिया। अनेकों प्रकारसे भरतजीको समझाया और बहुत-सी विवेकभरी बातें उन्हें कहकर सुनार्यो ॥ १ ॥

भरतहुँ मातु सकल समुझाई । कहि पुरान श्रुति कथा सुहाई ॥ छल बिहीन सुचि सरल सुबानी । बोले भरत जोरि जुग पानी ॥

भरतजीने भी सब माताओंको पुराण और वेदोंकी सुन्दर कथाएँ कहकर समझाया। दोनों हाथ जोड़कर भरतजी छलरहित, पवित्र और सीधी सुन्दर वाणी बोले— ॥ २ ॥

जे अघ मातु पिता सुत मारें । गाड़ गोठ महिसुर पुर जारें ॥ जे अघ तिय बालक बध कीन्हें । मीत महीपति माहुर दीन्हें ॥

जो पाप माता-पिता और पुत्रके मारनेसे होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणोंके नगर जलानेसे होते हैं; जो पाप स्त्री और बालककी हत्या करनेसे होते हैं और जो मित्र और राजाको जहर देनेसे होते हैं— ॥ ३ ॥

जे पातक उपपातक अहहीं । करम बचन मन भव कबि कहहीं ॥ ते पातक मोहि होहुँ बिधाता । जौँ यहु होइ मोर मत माता ॥

कर्म, वचन और मनसे होनेवाले जितने पातक एवं उपपातक (बड़े-छोटे पाप) हैं, जिनको कवि लोग कहते हैं; हे विधाता! यदि इस काममें मेरा मत हो, तो हे माता! वे सब पाप मुझे लगे ॥ ४ ॥

दो०—जे परिहरि हरि हर चरण भजहिं भूतगन घोर ।

तेहि कड़ गति मोहि देउ बिधि जौँ जननी मत मोर ॥ १६७ ॥

जो लोग श्रीहरि और श्रीशंकरजीके चरणोंको छोड़कर भयानक भूत-प्रेतोंको भजते हैं, हे माता! यदि इसमें मेरा मत हो तो विधाता मुझे उनकी गति दे ॥ १६७ ॥

बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं । पिसुन पराय पाप कहि देहीं ॥ कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी । बेद बिदूषक बिस्व विरोधी ॥

जो लोग वेदोंको बेचते हैं, धर्मको दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरोंके पापोंको कह देते हैं; जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं, तथा जो वेदोंकी निन्दा करनेवाले और विश्वभरके विरोधी हैं; ॥ १ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४८३

लोभी लंपट लोलुपचारा । जे ताकहिं परधनु परदारा ॥ पावौं मैं तिन्ह कै गति घोरा । जौं जननी यहु संमत मोरा ॥

जो लोभी, लम्पट और लालचियोंका आचरण करनेवाले हैं; जो पराये धन और परायी स्त्रीकी ताकमें रहते हैं; हे जननी! यदि इस काममें मेरी सम्मति हो तो मैं उनकी भयानक गतिको पाऊँ ॥ २ ॥

जे नहिं साधुसंग अनुरागे । परमारथ पथ विमुख अभागे ॥ जे न भजहिं हरि नर तनु पाई । जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई ॥

जिनका सत्सङ्गमें प्रेम नहीं है; जो अभागे परमार्थके मार्गसे विमुख हैं; जो मनुष्यशरीर पाकर श्रीहरिका भजन नहीं करते; जिनको हरि-हर (भगवान् विष्णु और शंकरजी) का सुयश नहीं सुहाता; ॥ ३ ॥

तजि श्रुतिपंथु वाम पथ चलहीं । बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं ॥ तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ । जननी जौं यहु जानौं भेऊ ॥

जो वेदमार्गको छोड़कर वाम (वेदप्रतिकूल) मार्गपर चलते हैं; जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत्को छलते हैं; हे माता! यदि मैं इस भेदको जानता भी होऊँ तो शंकरजी मुझे उन लोगोंकी गति दें ॥ ४ ॥

दो०—मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ ।

कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कार्यँ ॥ १६८ ॥

माता कौसल्याजी भरतजीके स्वाभाविक ही सच्चे और सरल बचनोंको सुनकर कहने लगीं—हे तात! तुम तो मन, वचन और शरीरसे सदा ही श्रीरामचन्द्रके प्यारे हो ॥ १६८ ॥

राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे । तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे ॥ बिधु बिष चवै स्ववै हिमु आगी । होइ बारिचर बारि बिरागी ॥

श्रीराम तुम्हारे प्राणोंसे भी बढ़कर प्राण (प्रिय) हैं और तुम भी श्रीरघुनाथको प्राणोंसे भी अधिक प्यारे हो। चन्द्रमा चाहे विष चुआने लगे और पाला आग बरसाने लगे; जलचर जीव जलसे विरक्त हो जाय, ॥ १ ॥

भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू । तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू ॥ मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं । सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं ॥

और ज्ञान हो जानेपर भी चाहे मोह न मिटे; पर तुम श्रीरामचन्द्रके प्रतिकूल कभी नहीं हो सकते। इसमें तुम्हारी सम्मति है, जगत्में जो कोई ऐसा कहते हैं वे स्वप्नमें भी सुख और शुभ गति नहीं पावेंगे ॥ २ ॥

४८४

  • रामचरितमानस *

अस कहि मातु भरतु हियँ लाए । थन पय स्ववहिं नयन जल छाए ॥ करत बिलाप बहुत एहि भाँती । बैठेहिं बीति गई सब राती ॥

ऐसा कहकर माता कौसल्याने भरतजीको हृदयसे लगा लिया। उनके स्तनोंसे दूध बहने लगा और नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल छा गया। इस प्रकार बहुत विलाप करते हुए सारी रात बैठे-ही-बैठे बीत गयी ॥ ३ ॥

वामदेउ बसिष्ठ तब आए । सचिव महाजन सकल बोलाए ॥ मुनि बहु भाँति भरत उपदेशे । कहि परमारथ बचन सुदेशे ॥

तब वामदेवजी और वसिष्ठजी आये। उन्होंने सब मन्त्रियों तथा महाजनोंको बुलवाया। फिर मुनि वसिष्ठजीने परमार्थके सुन्दर समयानुकूल वचन कहकर बहुत प्रकारसे भरतजीको उपदेश दिया ॥ ४ ॥

दो०—तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।

उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु ॥ १६९ ॥

[वसिष्ठजीने कहा—] हे तात! हृदयमें धीरज धरो और आज जिस कार्यके करनेका अवसर है, उसे करो। गुरुजीके वचन सुनकर भरतजी उठे और उन्होंने सब तैयारी करनेके लिये कहा ॥ १६९ ॥

नृप तनु बेद बिदित अन्हवावा । परम बिचित्र बिमानु बनावा ॥ गहि पद भरत मातु सब राखी । रहीं रानि दरसन अभिलाषी ॥

वेदोंमें बतायी हुई विधिसे राजाकी देहको स्नान कराया गया और परम विचित्र विमान बनाया गया। भरतजीने सब माताओंको चरण पकड़कर रखा (अर्थात् प्रार्थना करके उनको सती होनेसे रोक लिया)। वे रानियाँ भी [श्रीरामके] दर्शनकी अभिलाषासे रह गयीं ॥ १ ॥

चंदन अगर भार बहु आए । अमित अनेक सुगंध सुहाए ॥ सरजु तीर रचि चिता बनाई । जनु सुरपुर सोपान सुहाई ॥

चन्दन और अगरके तथा और भी अनेकों प्रकारके अपार [कपूर, गुग्गुल, केसर आदि] सुगन्ध-द्रव्योंके बहुत-से बोझ आये। सरयूजीके तटपर सुन्दर चिता रचकर बनायी गयी, [जो ऐसी मालूम होती थी] मानो स्वर्गकी सुन्दर सीढ़ी हो ॥ २ ॥

एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही । बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही ॥ सोधि सुमृति सब बेद पुराना । कीन्ह भरत दसगात बिधाना ॥

इस प्रकार सब दाहक्रिया की गयी और सबने विधिपूर्वक स्नान करके तिलाञ्जलि दी। फिर वेद, स्मृति और पुराण सबका मत निश्चय करके उसके अनुसार भरतजीने पिताका दशगात्र-विधान(दस दिनोंके कृत्य) किया ॥ ३ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४८५

जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा । तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा ॥ भए बिसुद्ध दिए सब दाना । धेनु बाजि गज बाहन नाना ॥

मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने जहाँ जैसी आज्ञा दी, वहाँ भरतजीने सब वैसा ही हजारों प्रकारसे किया। शुद्ध हो जानेपर [विधिपूर्वक] सब दान दिये। गौएँ तथा घोड़े, हाथी आदि अनेक प्रकारकी सवारियाँ, ॥ ४ ॥

दो०— सिंधासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम । दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम ॥ १७० ॥

सिंहासन, गहने, कपड़े, अन्न, पृथ्वी, धन और मकान भरतजीने दिये; भूदेव ब्राह्मण दान पाकर परिपूर्णकाम हो गये (अर्थात् उनकी सारी मनोकामनाएँ अच्छी तरहसे पूरी हो गयीं) ॥ १७० ॥

पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी । सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी ॥ सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए । सचिव महाजन सकल बोलाए ॥

पिताजीके लिये भरतजीने जैसी करनी की वह लाखों मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जा सकती। तब शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी आये और उन्होंने मन्त्रियों तथा सब महाजनोंको बुलवाया ॥ १ ॥

बैठे राजसभाँ सब जाई । पठए बोलि भरत दोउ भाई ॥ भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे । नीति धरममय बचन उचारे ॥

सब लोग राजसभामें जाकर बैठ गये। तब मुनिने भरतजी तथा शत्रुघ्नजी दोनों भाइयोंको बुलवा भेजा। भरतजीको वसिष्ठजीने अपने पास बैठा लिया और नीति तथा धर्मसे भरे हुए वचन कहे ॥ २ ॥

प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी । कैकड़ कुटिल कीन्हि जसि करनी ॥ भूप धरमव्रतु सत्य सराहा । जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा ॥

पहले तो कैकेयीने जैसी कुटिल करनी की थी, श्रेष्ठ मुनिने वह सारी कथा कही। फिर राजाके धर्मव्रत और सत्यकी सराहना की, जिन्होंने शरीर त्यागकर प्रेमको निबाहा ॥ ३ ॥

कहत राम गुन सील सुभाऊ । सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ ॥ बहरि लखन सिय प्रीति बखानी । सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी ॥

श्रीरामचन्द्रजीके गुण, शील और स्वभावका वर्णन करते-करते तो मुनिराजके नेत्रोंमें जल भर आया और वे शरीरसे पुलकित हो गये। फिर लक्ष्मणजी और सीताजीके प्रेमकी बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्नेहमें मग्न हो गये ॥ ४ ॥

४८६

  • रामचरितमानस *

दो०—सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ ।

हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ॥ १७१ ॥

मुनिनाथने विलखकर (दुखी होकर) कहा—हे भरत! सुनो, भावी (होनहार) बड़ी बलवान् है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाताके हाथ हैं ॥ १७१ ॥

अस बिचारि केहि देइअ दोसू । ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू ॥

तात बिचारु करहु मन माहीं । सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं ॥

ऐसा विचारकर किसे दोष दिया जाय? और व्यर्थ किसपर क्रोध किया जाय? हे तात! मनमें विचार करो। राजा दशरथ सोच करनेके योग्य नहीं हैं ॥ १ ॥

सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना । तजि निज धरमु बिषय लयलीना ॥

सोचिअ नृपति जो नीति न जाना । जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ॥

सोच उस ब्राह्मणका करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय-भोगमें ही लीन रहता है। उस राजाका सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणोंके समान प्यारी नहीं है ॥ २ ॥

सोचिअ बयसु कृपन धनवानू । जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ॥

सोचिअ सृद्धु बिप्र अवमानी । मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी ॥

उस वैश्यका सोच करना चाहिये जो धनवान् होकर भी कंजूस है, और जो अतिथिसत्कार तथा शिवजीकी भक्ति करनेमें कुशल नहीं है। उस शूद्रका सोच करना चाहिये जो ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाला, बहुत बोलनेवाला, मान-बड़ाई चाहनेवाला और ज्ञानका घर्मंड रखनेवाला है ॥ ३ ॥

सोचिअ पुनि पति बंचक नारी । कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ॥

सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई । जो नहिं गुर आयसु अनुसरई ॥

पुनः उस स्त्रीका सोच करना चाहिये जो पतिको छलनेवाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है। उस ब्रह्मचारीका सोच करना चाहिये जो अपने ब्रह्मचर्य-व्रतको छोड़ देता है और गुरुकी आज्ञाके अनुसार नहीं चलता ॥ ४ ॥

दो०— सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग ।

सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग ॥ १७२ ॥

उस गृहस्थका सोच करना चाहिये जो मोहवश कर्ममार्गका त्याग कर देता है; उस संन्यासीका सोच करना चाहिये जो दुनियाके प्रपञ्चमें फँसा हुआ है और ज्ञान-वैराग्यसे हीन है ॥ १७२ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४८७

बैखानस सोइ सोचै जोगू । तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू ॥ सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी । जननि जनक गुर बंधु बिरोधी ॥

वानप्रस्थ वही सोच करनेयोग्य है जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना ही कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई-बन्धुओंके साथ विरोध रखनेवाला है ॥ १ ॥

सब बिधि सोचिअ पर अपकारी । निज तनु पोषक निरदय भारी ॥ सोचनीय सबहीं बिधि सोई । जो न छाड़ि छलु हरि जन होई ॥

सब प्रकारसे उसका सोच करना चाहिये जो दूसरोंका अनिष्ट करता है, अपने ही शरीरका पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है। और वह तो सभी प्रकारसे सोच करनेयोग्य है जो छल छोड़कर हरिका भक्त नहीं होता ॥ २ ॥

सोचनीय नहीं कोसलराऊ । भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥ भयउ न अहइ न अब होनिहारा । भूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥

कोसलराज दशरथजी सोच करनेयोग्य नहीं हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें प्रकट है। हे भरत! तुम्हारे पिता-जैसा राजा तो न हुआ, न है और न अब होनेका ही है ॥ ३ ॥

बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा ॥

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और दिक्पाल सभी दशरथजीके गुणोंकी कथाएँ कहा करते हैं ॥ ४ ॥

दो०—कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तामु ।

राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ॥ १७३ ॥

हे तात! कहो, उनकी बड़ाई कोई किस प्रकार करेगा जिनके श्रीराम, लक्ष्मण, तुम और शत्रुघ्न-सरीखे पवित्र पुत्र हैं? ॥ १७३ ॥

सब प्रकार भूपति बड़भागी । बादि बिषादु करिअ तेहि लागी ॥ यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू । सिर धरि राज रजायसु करहू ॥

राजा सब प्रकारसे बड़भागी थे। उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझकर सोच त्याग दो और राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो ॥ १ ॥

रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा । पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा ॥ तजे रामु जेहिं बचनहि लागी । तनु परिहरेउ राम बिरहागी ॥

राजाने राजपद तुमको दिया है। पिताका वचन तुम्हें सत्य करना चाहिये, जिन्होंने वचनके लिये ही श्रीरामचन्द्रजीको त्याग दिया और रामविरहकी अग्निमें अपने शरीरकी आहुति दे दी ॥ २ ॥

४८८

  • रामचरितमानस *

नृपहि बचन प्रिय नहीं प्रिय प्राना । करहु तात पितु बचन प्रवाना ॥ करहु सीस धरि भूप रजाई । हड़ तुम्ह कहैं सब भाँति भलाई ॥

राजाको वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे। इसलिये हे तात! पिताके वचनोंको प्रमाण (सत्य) करो! राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसमें तुम्हारी सब तरह भलाई है ॥ ३ ॥

परसुराम पितु अग्या राखी । मारी मातु लोक सब सारखी ॥ तनय जजातिहि जौबनु दयऊ । पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ ॥

परशुरामजीने पिताकी आज्ञा रखी और माताको मार डाला; सब लोक इस बातके साक्षी हैं। राजा यथातिके पुत्रने पिताको अपनी जवानी दे दी। पिताकी आज्ञा पालन करनेसे उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ ॥ ४ ॥

दो०—अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन ।

ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥ १७४ ॥

जो अनुचित और उचितका विचार छोड़कर पिताके वचनोंका पालन करते हैं, वे [यहाँ] सुख और सुयशके पात्र होकर अन्तमें इन्द्रपुरी (स्वर्ग)–में निवास करते हैं ॥ १७४ ॥

अवसि नरेस बचन फुर करहू । पालहु प्रजा सोकु परिहरहू ॥ सुरपुर नृपु पाइहि परितोषु । तुम्ह कहूँ सुकृतु सुजसु नहिं दोषु ॥

राजाका वचन अवश्य सत्य करो। शोक त्याग दो और प्रजाका पालन करो। ऐसा करनेसे स्वर्गमें राजा सन्तोष पावेंगे और तुमको पुण्य और सुन्दर यश मिलेगा, दोष नहीं लेगेगा ॥ १ ॥

बेद बिदित संमत सबही का । जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥ करहु राजु परिहरहु गलानी । मानहु मोर बचन हित जानी ॥

यह वेदमें प्रसिद्ध है और [स्मृति-पुराणादि] सभी शास्त्रोंके द्वारा सम्मत है कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है। इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानिका त्याग कर दो। मेरे वचनको हित समझकर मानो ॥ २ ॥

सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं । अनुचित कहब न पंडित केहीं ॥ कौसल्यादि सकल महतारीं । तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं ॥

इस बातको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी सुख पावेंगे और कोई पण्डित इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्याजी आदि तुम्हारी सब माताएँ भी प्रजाके सुखसे सुखी होंगी ॥ ३ ॥

परम तुम्हार राम कर जानिहि । सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि ॥ सौँपेहु राजु राम के आएँ । सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४८१

जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजीके श्रेष्ठ सम्बन्धको जान लेगा, वह सभी प्रकारसे तुमसे भला मानेगा। श्रीरामचन्द्रजीके लौट आनेपर राज्य उन्हें सौंप देना और सुन्दर स्नेहसे उनकी सेवा करना ॥ ४ ॥

दो०—कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।

रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि ॥ १७५ ॥

मन्त्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं—गुरुजीकी आज्ञाका अवश्य ही पालन कीजिये। श्रीरघुनाथजीके लौट आनेपर जैसा उचित हो, तब फिर वैसा ही कीजियेगा ॥ १७५ ॥

कौसल्या धरि धीरजु कहई । पूत पथ्य गुर आयसु अहई ॥ सो आदरिअ करिअ हित मानी । तजिअ बिषादु काल गति जानी ॥

कौसल्याजी भी धीरज धरकर कह रही हैं—हे पुत्र! गुरुजीकी आज्ञा पथ्यरूप है। उसका आदर करना चाहिये और हित मानकर उसका पालन करना चाहिये। कालकी गतिको जानकर विषादका त्याग कर देना चाहिये ॥ १ ॥

बन रघुपति सुरपुर नरनाहू । तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू ॥ परिजन प्रजा सचिव सब अंबा । तुम्हही सुत सब कहैं अवलंबा ॥

श्रीरघुनाथजी वनमें हैं, महाराज स्वर्गका राज्य करने चले गये। और हे तात! तुम इस प्रकार कातर हो रहे हो। हे पुत्र! कुटुम्ब, प्रजा, मन्त्री और सब माताओंके—सबके एक तुम ही सहारे हो ॥ २ ॥

लखि बिधि बाम कालु कठिनाई । धीरजु धरहु मातु बलि जाई ॥ सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू । प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू ॥

विधाताको प्रतिकूल और कालको कठोर देखकर धीरज धरो, माता तुम्हारी बलिहारी जाती है। गुरुकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसीके अनुसार कार्य करो और प्रजाका पालन कर कुटुम्बियोंका दुःख हरो ॥ ३ ॥

गुर के बचन सचिव अभिनंदनु । सुने भरत हिय हित जनु चंदनु ॥ सुनी बहोरि मातु मृदु बानी । सील सनेह सरल रस सानी ॥

भरतजीने गुरुके वचनों और मन्त्रियोंके अभिनन्दन (अनुमोदन) को सुना, जो उनके हृदयके लिये मानो चन्दनके समान [शीतल] थे। फिर उन्होंने शील, स्नेह और सरलताके रसमें सनी हुई माता कौसल्याकी कोमल वाणी सुनी ॥ ४ ॥

छं०—सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु व्याकुल भए । लोचन सरोरुह स्वत सौंचत बिरह उर अंकुर नए ॥ सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की । तुलसी सराहत सकल सादर सीवैं सहज सनेह की ॥

४९०

  • रामचरितमानस *

सरलताके रसमें सनी हुई माताकी वाणी सुनकर भरतजी व्याकुल हो गये। उनके नेत्र-कमल जल (आँसू) बहाकर हृदयके विरहरूपी नवीन अंकुरको सींचने लगे। (नेत्रोंके आँसुओंने उनके वियोग-दुःखको बहुत ही बढ़ाकर उन्हें अत्यन्त व्याकुल कर दिया।) उनकी वह दशा देखकर उस समय सबको अपने शरीरकी सुध भूल गयी। तुलसीदासजी कहते हैं—स्वाभाविक प्रेमकी सीमा श्रीभरतजीकी सब लोग आदरपूर्वक सराहना करने लगे।

सो०—भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि।

बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि ॥ १७६ ॥

धैर्यकी धुरीको धारण करनेवाले भरतजी धीरज धरकर, कमलके समान हाथोंको जोड़कर, वचनोंको मानो अमृतमें डुबाकर सबको उचित उत्तर देने लगे—॥ १७६ ॥

मासपारायण, अठारहवाँ विश्राम

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका । प्रजा सचिव संमत सबही का ॥ मातु उचित धरि आयसु दीन्हा । अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा ॥

गुरुजीने मुझे सुन्दर उपदेश दिया। [फिर] प्रजा, मन्त्री आदि सभीको यही सम्मत है। माताने भी उचित समझकर ही आज्ञा दी है और मैं भी अवश्य उसको सिर चढ़ाकर वैसा ही करना चाहता हूँ ॥ १ ॥

गुर पितु मातु स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी ॥ उचित कि अनुचित किऐँ बिचारु । धरमु जाइ सिर पातक भारु ॥

[क्योंकि] गुरु, पिता, माता, स्वामी और सुहृद् (मित्र) की वाणी सुनकर प्रसन्न मनसे उसे अच्छी समझकर करना (मानना) चाहिये। उचित-अनुचितका विचार करनेसे धर्म जाता है और सिरपर पापका भार चढ़ता है ॥ २ ॥

तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई । जो आचरत मोर भल होई ॥ जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें । तदपि होत परितोषु न जी कें ॥

आप तो मुझे वही सरल शिक्षा दे रहे हैं, जिसके आचरण करनेमें मेरा भला हो। यद्यपि मैं इस बातको भलीभाँति समझता हूँ, तथापि मेरे हृदयको सन्तोष नहीं होता ॥ ३ ॥

अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू । मोहि अनुहरत सिखावनु देहू ॥ ऊतरु देउँ छमब अपराधू । दुखित दोष गुन गनहिं न साधू ॥

अब आपलोग मेरी विनती सुन लीजिये और मेरी योग्यताके अनुसार मुझे शिक्षा दीजिये। मैं उत्तर दे रहा हूँ, यह अपराध क्षमा कीजिये। साधु पुरुष दुखी मनुष्यके दोष-गुणोंको नहीं गिनते ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४११

दो०—पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।

एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु ॥ १७७ ॥

पिताजी स्वर्गमें हैं, श्रीसीतारामजी वनमें हैं और मुझे आप राज्य करनेके लिये कह रहे हैं। इसमें आप मेरा कल्याण समझते हैं या अपना कोई बड़ा काम [होनेकी आशा रखते हैं] ? ॥ १७७ ॥

हित हमार सियपति सेवकाई । सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई ॥ मैं अनुमानि दीख मन माहीं । आन उपायँ मोर हित नाहीं ॥

मेरा कल्याण तो सीतापति श्रीरामजीकी चाकरीमें है, सो उसे माताकी कुटिलताने छीन लिया। मैंने अपने मनमें अनुमान करके देख लिया है कि दूसरे किसी उपायसे मेरा कल्याण नहीं है ॥ १ ॥

सोक समाजु राजु केहि लेखें । लखन राम सिय बिनु पद देखें ॥ बादि बसन बिनु भूषन भारू । बादि बिरति बिनु ब्रह्मविचारू ॥

यह शोकका समुदाय राज्य लक्ष्मण, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके चरणोंको देखे बिना किस गिनतीमें है (इसका क्या मूल्य है) ? जैसे कपड़ोंके बिना गहनोंका बोझ व्यर्थ है। वैराग्यके बिना ब्रह्मविचार व्यर्थ है ॥ २ ॥

सरुज सरीर बादि बहु भोगा । बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा ॥ जायँ जीव बिनु देह सुहाई । बादि मोर सबु बिनु रघुराई ॥

रोगी शरीरके लिये नाना प्रकारके भोग व्यर्थ हैं। श्रीहरिकी भक्तिके बिना जप और योग व्यर्थ हैं। जीवके बिना सुन्दर देह व्यर्थ है। वैसे ही श्रीरघुनाथजीके बिना मेरा सब कुछ व्यर्थ है ॥ ३ ॥

जाउँ राम पहिं आयसु देहू । एकहिं आँक मोर हित एहू ॥ मोहि नूप करि भल आपन चहहू । सोउ सनेह जड़ता बस कहहू ॥

मुझे आज्ञा दीजिये, मैं श्रीरामजीके पास जाऊँ! एक ही आँक (निश्चयपूर्वक) मेरा हित इसीमें है। और मुझे राजा बनाकर आप अपना भला चाहते हैं, यह भी आप स्नेहकी जड़ता (मोह) के वश होकर ही कह रहे हैं ॥ ४ ॥

दो०—कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।

तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज ॥ १७८ ॥

कैकेयीके पुत्र, कुटिलबुद्धि, रामविमुख और निर्लज्ज मुझ-से अधमके राज्यसे आप मोहके वश होकर ही सुख चाहते हैं ॥ १७८ ॥

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू । चाहिअ धरमसील नरनाहू ॥ मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं । रसा रसातल जाइहि तबहीं ॥

४९२

  • रामचरितमानस *

मैं सत्य कहता हूँ, आप सब सुनकर विश्वास करें, धर्मशीलको ही राजा होना चाहिये। आप मुझे हठ करके ज्यों ही राज्य देंगे त्यों ही पृथ्वी पातालमें धँस जायगी॥ १ ॥

मोहि समान को पापनिवासू । जेहि लगि सीय राम बनबासू॥ रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा । बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥

मेरे समान पापोंका घर कौन होगा, जिसके कारण सीताजी और श्रीरामजीका वनवास हुआ? राजाने श्रीरामजीको वन दिया और उनके बिछुड़ते ही स्वयं स्वर्गको गमन किया॥ २ ॥

मैं सटु सब अनर्थ कर हेतू । बैठ बात सब सुनऊँ सचेतू॥ बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू । रहे प्रान सहि जग उपहासू॥

और मैं दुष्ट, जो सारे अनर्थोंका कारण हूँ, होश-हवासमें बैठा सब बातें सुन रहा हूँ! श्रीरघुनाथजीसे रहित घरको देखकर और जगत्का उपहास सहकर भी ये प्राण बने हुए हैं॥ ३ ॥

राम पुनीत विषय रस स्खे । लोलुप भूमि भोग के भूखे॥ कहँ लगि कहौँ हृदय कठिनाई । निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई॥

[इसका यही कारण है कि ये प्राण] श्रीरामरूपी पवित्र विषय-रसमें आसक्त नहीं हैं। ये लालची भूमि और भोगोंके ही भूखे हैं। मैं अपने हृदयकी कठोरता कहाँतक कहूँ? जिसने वज्रका भी तिरस्कार करके बड़ाई पायी है॥ ४ ॥

दो०— कारण तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर।

कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर॥ १७९ ॥

कारणसे कार्य कठिन होता ही है, इसमें मेरा दोष नहीं। हड्डीसे वज्र और पत्थरसे लोहा भयानक और कठोर होता है॥ १७९ ॥

कैकेई भव तनु अनुरागे । पावँर प्रान अघाइ अभागे॥ जौँ प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे । देखब सुनब बहुत अब आगे॥

कैकेयीसे उत्पन्न देहमें प्रेम करनेवाले ये पामर प्राण भरपेट (पूरी तरहसे) अभागे हैं। जब प्रियके वियोगमें भी मुझे प्राण प्रिय लग रहे हैं तब अभी आगे मैं और भी बहुत कुछ देखूँ-सुनूँगा॥ १ ॥

लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा । पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा॥ लीन्ह विधवपन अपजसु आपू । दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू॥

लक्ष्मण, श्रीरामजी और सीताजीको तो वन दिया; स्वर्ग भेजकर पतिका कल्याण किया; स्वयं विधवापन और अपयश लिया; प्रजाको शोक और सन्ताप दिया;॥ २ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४९३

मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू । कीन्ह कैकई सब कर काजू॥ एहि तें मोर काह अब नीका । तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥

और मुझे सुख, सुन्दर यश और उत्तम राज्य दिया! कैकेयीने सभीका काम बना दिया! इससे अच्छा अब मेरे लिये और क्या होगा? उसपर भी आप लोग मुझे राजतिलक देनेको कहते हैं॥३॥

कैकड़ जठर जनमि जग माहीं । यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं॥ मोरि बात सब बिधिहिं बनाई । प्रजा पाँच कत करहु सहाई॥

कैकेयीके पेटसे जगत्में जन्म लेकर यह मेरे लिये कुछ भी अनुचित नहीं है। मेरी सब बात तो विधाताने ही बना दी है। [फिर] उसमें प्रजा और पंच (आप लोग) क्यों सहायता कर रहे हैं?॥४॥

दो०—ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥१८०॥

जिसे कुग्रह लगे हों [अथवा जो पिशाचग्रस्त हों], फिर जो वायुयोगसे पीड़ित हो और उसीको फिर बिच्छू डंक मार दे, उसको यदि मदिरा पिलायी जाय, तो कहिये यह कैसा इलाज है!॥१८०॥

कैकड़ सुअन जोगु जग जोई । चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई॥ दसरथ तनय राम लघु भाई । दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई॥

कैकेयीके लड़केके लिये संसारमें जो कुछ योग्य था, चतुर विधाताने मुझे वही दिया। पर 'दशरथजीका पुत्र' और 'रामका छोटा भाई' होनेकी बड़ाई मुझे विधाताने व्यर्थ ही दी॥१॥

तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका । राय रजायसु सब कहँ नीका॥ उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही । कहहु सुखेन जथा रुचि जेही॥

आप सब लोग भी मुझे टीका कढ़ानेके लिये कह रहे हैं! राजाकी आज्ञा सभीके लिये अच्छी है। मैं किस-किसको किस-किस प्रकारसे उत्तर दूँ? जिसकी जैसी रुचि हो, आपलोग सुखपूर्वक वही कहें॥२॥

मोहि कुमातु समेत बिहाई । कहहु कहहि के कीन्ह भलाई॥ मो बिनु को सचराचर माहीं । जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं॥

मेरी कुमाता कैकेयीसमेत मुझे छोड़कर, कहिये, और कौन कहेगा कि यह काम अच्छा किया गया? जड़-चेतन जगत्में मेरे सिवा और कौन है जिसको श्रीसीतारामजी प्राणोंके समान प्यारे न हों॥३॥

४९४

  • रामचरितमानस *

परम हानि सब कहँ बड़ लाहू । अदिनु मोर नहिं दूषन काहू ॥ संसय सील प्रेम बस अहहू । सबुड़ उचित सब जो कछु कहहू ॥

जो परम हानि है, उसीमें सबको बड़ा लाभ दीख रहा है। मेरा बुरा दिन है किसीका दोष नहीं। आप सब जो कुछ कहते हैं सो सब उचित ही है। क्योंकि आप लोग संशय, शील और प्रेमके वश हैं ॥ ४ ॥

दो०—राम मातु सुठि सरलचित्त मो पर प्रेमु बिसेषि।

कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि ॥ १८१ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी माता बहुत ही सरलहृदय हैं और मुझपर उनका विशेष प्रेम है। इसलिये मेरी दीनता देखकर वे स्वाभाविक स्नेहवश ही ऐसा कह रही हैं ॥ १८१ ॥

गुर बिबेक सागर जगु जाना । जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना ॥ मो कहँ तिलक साज सज सोऊ । भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ ॥

गुरुजी ज्ञानके समुद्र हैं, इस बातको सारा जगत् जानता है, जिनके लिये विश्व हथेलीपर रखे हुए बेरके समान है, वे भी मेरे लिये राजतिलकका साज सज रहे हैं। सत्य है, विधाताके विपरीत होनेपर सब कोई विपरीत हो जाते हैं ॥ १ ॥

परिहरि रामु सीय जग माहीं । कोउ न कहहि मोर मत नाहीं ॥ सो मैं सुनब सहब सुखु मानी । अंतहूँ कीच तहाँ जहाँ पानी ॥

श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीको छोड़कर जगत्में कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थमें मेरी सम्मति नहीं है। मैं उसे सुखपूर्वक सुनूँगा और सहूँगा। क्योंकि जहाँ पानी होता है, वहाँ अन्तमें कीचड़ होता ही है ॥ २ ॥

डरु न मोहि जग कहहि कि पोचू । परलोकहु कर नाहिन सोचू ॥ एकड़ उर बस दुसह दवारी । मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी ॥

मुझे इसका डर नहीं है कि जगत् मुझे बुरा कहेगा और न मुझे परलोकका ही सोच है। मेरे हृदयमें तो बस, एक ही दुःसह दावानल धधक रहा है कि मेरे कारण श्रीसीतारामजी दुखी हुए ॥ ३ ॥

जीवन लाहु लखन भल पावा । सबु तजि राम चरन मनु लावा ॥ मोर जनम रघुबर बन लागी । झूठ काह पछिताउँ अभागी ॥

जीवनका उत्तम लाभ तो लक्ष्मणने पाया, जिन्होंने सब कुछ तजकर श्रीरामजीके चरणोंमें मन लगाया। मेरा जन्म तो श्रीरामजीके वनवासके लिये ही हुआ था। मैं अभागा झूठ-मूठ क्या पछताता हूँ? ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४९५

दो०—आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।

देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ॥ १८२॥

सबको सिर झुकाकर मैं अपनी दारुण दीनता कहता हूँ। श्रीरघुनाथजीके चरणोंके दर्शन किये बिना मेरे जीकी जलन न जायगी॥ १८२॥

आन उपाउ मोहि नहीं सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा॥

एकहिँ आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं॥

मुझे दूसरा कोई उपाय नहीं सूझता। श्रीरामजीके बिना मेरे हृदयकी बात कौन जान सकता है? मनमें एक ही आँक (निश्चयपूर्वक) यही है कि प्रातःकाल प्रभु श्रीरामजीके पास चल दूँगा॥ १॥

जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी॥

तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिँ कृपा बिसेषी॥

यद्यपि मैं बुरा हूँ और अपराधी हूँ, और मेरे ही कारण यह सब उपद्रव हुआ है, तथापि श्रीरामजी मुझे शरणमें सम्मुख आया हुआ देखकर सब अपराध क्षमा करके मुझपर विशेष कृपा करेंगे॥ २॥

सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ॥

अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा॥

श्रीरघुनाथजी शील, संकोच, अत्यन्त सरल स्वभाव, कृपा और स्नेहके घर हैं। श्रीरामजीने कभी शत्रुका भी अनिष्ट नहीं किया। मैं यद्यपि टेढ़ा हूँ पर हूँ तो उनका बच्चा और गुलाम ही॥ ३॥

तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी॥

जेहिँ सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिँ बहुरि रामु रजधानी॥

आप पंच (सब) लोग भी इसीमें मेरा कल्याण मानकर सुन्दर वाणीसे आज्ञा और आशीर्वाद दीजिये, जिसमें मेरी विनती सुनकर और मुझे अपना दास जानकर श्रीरामचन्द्रजी राजधानीको लौट आवें॥ ४॥

दो०—जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।

आपन जानि न त्यागिहहिँ मोहि रघुबीर भरोस॥ १८३॥

यद्यपि मेरा जन्म कुमातासे हुआ है और मैं दुष्ट तथा सदा दोषयुक्त भी हूँ, तो भी मुझे श्रीरामजीका भरोसा है कि वे मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं॥ १८३॥

भरत बचन सब कहैं प्रिय लागे। राम सनेह सुधौँ जनु पागे॥

लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे॥

४१६

  • रामचरितमानस *

भरतजीके वचन सबको प्यारे लगे। मानो वे श्रीरामजीके प्रेमरूपी अमृतमें पगे हुए थे। श्रीरामवियोगरूपी भीषण विषसे सब लोग जले हुए थे। वे मानो बीजसहित मन्त्रको सुनते ही जाग उठे ॥ १ ॥

मातु सचिव गुर पुर नर नारी । सकल सनेहैं बिकल भए भारी ॥ भरतहि कहहिं सराहि सराही । राम प्रेम मूरति तनु आही ॥

माता, मन्त्री, गुरु, नगरके स्त्री-पुरुष सभी स्नेहके कारण बहुत ही व्याकुल हो गये। सब भरतजीको सराह-सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर श्रीरामप्रेमकी साक्षात् मूर्ति ही है ॥ २ ॥

तात भरत अस काहे न कहहू । प्रान समान राम प्रिय अहहू ॥ जो पावँरु अपनी जड़ताई । तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई ॥

हे तात भरत! आप ऐसा क्यों न कहें। श्रीरामजीको आप प्राणोंके समान प्यारे हैं। जो नीच अपनी मूर्खतासे आपकी माता कैकेयीकी कुटिलताको लेकर आपपर सन्देह करेगा, ॥ ३ ॥

सो सठु कोटिक पुरुष समेता । बसिहि कलप सत नरक निकेता ॥ अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई । हरइ गरल दुख दारिद दहई ॥

वह दुष्ट करोड़ों पुरखोंसहित सौ कल्पोंतक नरकके घरमें निवास करेगा। साँपके पाप और अवगुणको मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विषको हर लेती है और दुःख तथा दरिद्रताको भस्म कर देती है ॥ ४ ॥

दो०— अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह । सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह ॥ १८४ ॥

हे भरतजी! वनको अवश्य चलिये, जहाँ श्रीरामजी हैं; आपने बहुत अच्छी सलाह विचारी। शोकसमुद्रमें डूबते हुए सब लोगोंको आपने [बड़ा] सहारा दे दिया ॥ १८४ ॥

भा सब कें मन मोदु न थोरा । जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा ॥ चलत प्रात लिखि निरनउ नीके । भरतु प्रानप्रिय भे सबही के ॥

सबके मनमें कम आनन्द नहीं हुआ (अर्थात् बहुत ही आनन्द हुआ)! मानो मेघोंकी गर्जना सुनकर चातक और मोर आनन्दित हो रहे हों। [दूसरे दिन] प्रातःकाल चलनेका सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभीको प्राणप्रिय हो गये ॥ १ ॥

मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई । चले सकल घर बिदा कराई ॥ धन्य भरत जीवनु जग माहीं । सीलु सनेहु सराहत जाहीं ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४९७

मुनि वसिष्ठजीकी वन्दना करके और भरतजीको सिर नवाकर, सब लोग विदा लेकर अपने-अपने घरको चले। जगत्में भरतजीका जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील और स्नेहकी सराहना करते जाते हैं ॥ २ ॥

कहहिं परसपर भा बड़ काजू । सकल चलै कर साजहिं साजू ॥ जेहि राखहिं रहु घर रखवारी । सो जानइ जनु गरदनि मारी ॥

आपसमें कहते हैं, बड़ा काम हुआ। सभी चलनेकी तैयारी करने लगे। जिसको भी घरकी रखवालीके लिये रहो, ऐसा कहकर रखते हैं, वही समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी ॥ ३ ॥

कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू । को न चहइ जग जीवन लाहू ॥

कोई-कोई कहते हैं—रहनेके लिये किसीको भी मत कहो, जगत्में जीवनका लाभ कौन नहीं चाहता ? ॥ ४ ॥

दो०— जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ ।

सनमुखु होत जो राम पद करै न सहस सहाइ ॥ १८५ ॥

वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता, भाई जल जाय जो श्रीरामजीके चरणोंके सम्मुख होनेमें हँसते हुए (प्रसन्नतापूर्वक) सहायता न करे ॥ १८५ ॥

घर घर साजहिं बाहन नाना । हरषु हृदयँ परभात पयाना ॥ भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू । नगरु बाजि गज भवन भँडारू ॥

घर-घर लोग अनेकों प्रकारकी सवारियाँ सजा रहे हैं। हृदयमें [बड़ा] हर्ष है कि सबेरे चलना है। भरतजीने घर जाकर विचार किया कि नगर, घोड़े, हाथी, महल-खजाना आदि— ॥ १ ॥

संपति सब रघुपति कै आही । जौँ बिनु जतन चलौं तजि ताही ॥ तौ परिनाम न मोरि भलाई । पाप सिरोमनि साई दोहाई ॥

सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजीकी है। यदि उसकी [रक्षाकी] व्यवस्था किये बिना उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूँ, तो परिणाममें मेरी भलाई नहीं है। क्योंकि स्वामीका द्रोह सब पापोंमें शिरोमणि (श्रेष्ठ) है ॥ २ ॥

करइ स्वामि हित सेवकु सोई । दूषन कोटि देइ किन कोई ॥ अस बिचारि सुचि सेवक बोले । जे सपनेहूँ निज धरम न डोले ॥

सेवक वही है जो स्वामीका हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे। भरतजीने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकोंको बुलाया जो कभी स्वप्नमें भी अपने धर्मसे नहीं डिगे थे ॥ ३ ॥

कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा । जो जेहि लायक सो तेहिं राखा ॥ करि सबु जतनु राखि रखवारे । राम मातु पहिं भरतु सिधारे ॥

४१८

  • रामचरितमानस *

भरतजीने उनको सब भेद समझाकर फिर उत्तम धर्म बतलाया; और जो जिस योग्य था, उसे उसी कामपर नियुक्त कर दिया। सब व्यवस्था करके, रक्षकोंको रखकर भरतजी राममाता कौसल्याजीके पास गये ॥ ४ ॥

दो०—आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।

कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान ॥ १८६ ॥

स्नेहके सुजान (प्रेमके तत्त्वको जाननेवाले) भरतजीने सब माताओंको आर्त (दुखी) जानकर उनके लिये पालकियाँ तैयार करने तथा सुखासन यान (सुखपाल) सजानेके लिये कहा ॥ १८६ ॥

चक्क चक्क जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी ॥ जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना ॥

नगरके नर-नारी चक्के-चक्कीकी भाँति हृदयमें अत्यन्त आर्त होकर प्रातःकालका होना चाहते हैं। सारी रात जागते-जागते सबेरा हो गया। तब भरतजीने चतुर मन्त्रियोंको बुलवाया— ॥ १ ॥

कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनिहिं देब मुनि रामहि राजू ॥ बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे ॥

और कहा—तिलकका सब सामान ले चलो। वनमें ही मुनि वसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजीको राज्य देंगे, जल्दी चलो। यह सुनकर मन्त्रियोंने वन्दना की और तुरंत घोड़े, रथ और हाथी सजवा दिये ॥ २ ॥

अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ ॥ बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना ॥

सबसे पहले मुनिराज वसिष्ठजी अरुन्धती और अगिनिहोत्रकी सब सामग्रीसहित रथपर सवार होकर चले। फिर ब्राह्मणोंके समूह, जो सब-के-सब तपस्या और तेजके भण्डार थे, अनेकों सवारियोंपर चढ़कर चले ॥ ३ ॥

नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहैं कीन्ह पयाना ॥ सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी ॥

नगरके सब लोग रथोंको सजा-सजाकर चित्रकूटको चल पड़े। जिनका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी सुन्दर पालकियोंपर चढ़-चढ़कर सब रानियाँ चलीं ॥ ४ ॥

दो०—सौँपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।

सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दौड भाइ ॥ १८७ ॥

विश्वासपात्र सेवकोंको नगर सौंपकर और सबको आदरपूर्वक रवाना करके, तब श्रीसीतारामजीके चरणोंको स्मरण करके भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले ॥ १८७ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४९९

राम दरस बस सब नर नारी । जनु करि करिनि चले तकि बारी ॥ बन सिय रामु समुझि मन माहीं । सानुज भरत पयादेहिं जाहीं ॥

श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके वशमें हुए (दर्शनकी अनन्य लालसासे) सब नर-नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी-हथिनी जलको तककर [बड़ी तेजीसे बावले-से हुए] जा रहे हों। श्रीसीतारामजी [सब सुखोंको छोड़कर] वनमें हैं, मनमें ऐसा विचार करके छोटे भाई शत्रुघ्नीसहित भरतजी पैदल ही चले जा रहे हैं ॥ १ ॥

देखि सनेहु लोग अनुरागे । उतरि चले हय गय रथ त्यागे ॥ जाइ समीप राखि निज डोली । राम मातु मृदु बानी बोली ॥

उनका स्नेह देखकर लोग प्रेममें मग्न हो गये और सब घोड़े, हाथी, रथोंको छोड़कर उनसे उतरकर पैदल चलने लगे। तब श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजी भरतजीके पास जाकर और अपनी पालकी उनके समीप खड़ी करके कोमल वाणीसे बोलीं— ॥ २ ॥

तात चढ़हु रथ बलि महतारी । होइहि प्रिय परिवारु दुखारी ॥ तुम्हरे चलत चलिहि सबु लोगू । सकल सोक कूस नहिं मग जोगू ॥

हे बेटा! माता बलैयाँ लेती है, तुम रथपर चढ़ जाओ, नहीं तो सारा प्यारा परिवार दुखी हो जायगा। तुम्हारे पैदल चलनेसे सभी लोग पैदल चलेंगे। शोकके मारे सब दुबले हो रहे हैं, पैदल रास्तेके (पैदल चलनेके) योग्य नहीं हैं ॥ ३ ॥

सिर धरि बचन चरन सिरु नाई । रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई ॥ तमसा प्रथम दिवस करि बासू । दूसर गोमति तीर निवासू ॥

माताकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर और उनके चरणोंमें सिर नवाकर दोनों भाई रथपर चढ़कर चलने लगे। पहले दिन तमसापर वास (मुकाम) करके दूसरा मुकाम गोमतीके तीरपर किया ॥ ४ ॥

दो०—पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग ।

करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग ॥ १८८ ॥

कोई दूध ही पीते, कोई फलाहार करते और कुछ लोग रातको एक ही बार भोजन करते हैं। भूषण और भोग-विलासको छोड़कर सब लोग श्रीरामचन्द्रजीके लिये नियम और व्रत करते हैं ॥ १८८ ॥

सई तीर बसि चले बिहाने । सुंगबेरपुर सब निअराने ॥ समाचार सब सुने निषादा । हृदयँ विचार करइ सबिषादा ॥

रातभर सई नदीके तीरपर निवास करके सबेरे वहाँसे चल दिये और सब शृङ्गवेरपुरके समीप जा पहुँचे। निषादराजने सब समाचार सुने, तो वह दुखी होकर हृदयमें विचार करने लगा— ॥ १ ॥