श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 501, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
४९९
राम दरस बस सब नर नारी । जनु करि करिनि चले तकि बारी ॥ बन सिय रामु समुझि मन माहीं । सानुज भरत पयादेहिं जाहीं ॥
श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके वशमें हुए (दर्शनकी अनन्य लालसासे) सब नर-नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी-हथिनी जलको तककर [बड़ी तेजीसे बावले-से हुए] जा रहे हों। श्रीसीतारामजी [सब सुखोंको छोड़कर] वनमें हैं, मनमें ऐसा विचार करके छोटे भाई शत्रुघ्नीसहित भरतजी पैदल ही चले जा रहे हैं ॥ १ ॥
देखि सनेहु लोग अनुरागे । उतरि चले हय गय रथ त्यागे ॥ जाइ समीप राखि निज डोली । राम मातु मृदु बानी बोली ॥
उनका स्नेह देखकर लोग प्रेममें मग्न हो गये और सब घोड़े, हाथी, रथोंको छोड़कर उनसे उतरकर पैदल चलने लगे। तब श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजी भरतजीके पास जाकर और अपनी पालकी उनके समीप खड़ी करके कोमल वाणीसे बोलीं— ॥ २ ॥
तात चढ़हु रथ बलि महतारी । होइहि प्रिय परिवारु दुखारी ॥ तुम्हरे चलत चलिहि सबु लोगू । सकल सोक कूस नहिं मग जोगू ॥
हे बेटा! माता बलैयाँ लेती है, तुम रथपर चढ़ जाओ, नहीं तो सारा प्यारा परिवार दुखी हो जायगा। तुम्हारे पैदल चलनेसे सभी लोग पैदल चलेंगे। शोकके मारे सब दुबले हो रहे हैं, पैदल रास्तेके (पैदल चलनेके) योग्य नहीं हैं ॥ ३ ॥
सिर धरि बचन चरन सिरु नाई । रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई ॥ तमसा प्रथम दिवस करि बासू । दूसर गोमति तीर निवासू ॥
माताकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर और उनके चरणोंमें सिर नवाकर दोनों भाई रथपर चढ़कर चलने लगे। पहले दिन तमसापर वास (मुकाम) करके दूसरा मुकाम गोमतीके तीरपर किया ॥ ४ ॥
दो०—पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग ।
करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग ॥ १८८ ॥
कोई दूध ही पीते, कोई फलाहार करते और कुछ लोग रातको एक ही बार भोजन करते हैं। भूषण और भोग-विलासको छोड़कर सब लोग श्रीरामचन्द्रजीके लिये नियम और व्रत करते हैं ॥ १८८ ॥
सई तीर बसि चले बिहाने । सुंगबेरपुर सब निअराने ॥ समाचार सब सुने निषादा । हृदयँ विचार करइ सबिषादा ॥
रातभर सई नदीके तीरपर निवास करके सबेरे वहाँसे चल दिये और सब शृङ्गवेरपुरके समीप जा पहुँचे। निषादराजने सब समाचार सुने, तो वह दुखी होकर हृदयमें विचार करने लगा— ॥ १ ॥