भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 502

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  • रामचरितमानस *

कारन कवन भरतु बन जाहीं । है कछु कपट भाउ मन माहीं ॥ जों पै जियँ न होती कुटिलाई । तौ कत लीन्ह संग कटकाई ॥

क्या कारण है जो भरत बनको जा रहे हैं, मनमें कुछ कपट-भाव अवश्य है। यदि मनमें कुटिलता न होती, तो साथमें सेना क्यों ले चले हैं ॥ २ ॥

जानहिं सानुज रामहि मारी । करउँ अकंटक राजु सुखारी ॥ भरत न राजनीति उर आनी । तब कलंकु अब जीवन हानी ॥

समझते हैं कि छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामको मारकर सुखसे निष्कण्टक राज्य करूँगा। भरतने हृदयमें राजनीतिको स्थान नहीं दिया (राजनीतिका विचार नहीं किया)। तब (पहले) तो कलंक ही लगा था, अब तो जीवनसे ही हाथ धोना पड़ेगा ॥ ३ ॥

सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा । रामहि समर न जीतनिहारा ॥ का आचरजु भरतु अस करहीं । नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं ॥

सम्पूर्ण देवता और दैत्य वीर जुट जायँ, तो भी श्रीरामजीको रणमें जीतनेवाला कोई नहीं है। भरत जो ऐसा कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य ही क्या है? विषकी बेलें अमृतफल कभी नहीं फलतीं! ॥ ४ ॥

दो०—अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।

हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु ॥ १८९ ॥

ऐसा विचारकर गुह (निष्ठादराज) ने अपनी जातिवालोंसे कहा कि सब लोग सावधान हो जाओ। नावोंको हाथमें (कब्जेमें) कर लो और फिर उन्हें डुबा दो तथा सब घाटोंको रोक दो ॥ १८९ ॥

होहु संजोइल रोकहु घाटा । ठाटहु सकल मरै के ठाटा ॥ सनमुख लोह भरत सन लेऊँ । जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ ॥

सुसज्जित होकर घाटोंको रोक लो और सब लोग मरनेके साज सजा लो (अर्थात् भरतसे युद्धमें लड़कर मरनेके लिये तैयार हो जाओ)। मैं भरतसे सामने (मैदानमें) लोहा लूँगा (मुटभेड़ करूँगा) और जीते-जी उन्हें गङ्गापार न उतरने दूँगा ॥ १ ॥

समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा । राम काजु छनभंगु सरीरा ॥ भरत भाइ नृपु मैं जन नीचू । बड़ें भाग असि पाइअ मीचू ॥

युद्धमें मरण, फिर गङ्गाजीका तट, श्रीरामजीका काम और क्षणभङ्गुर शरीर (जो चाहे जब नाश हो जाय); भरत श्रीरामजीके भाई और राजा (उनके हाथसे मरना) और मैं नीच सेवक—बड़े भाग्यसे ऐसी मृत्यु मिलती है ॥ २ ॥