श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 503, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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स्वामि काज करिहउँ रन रारी । जस धवलिहउँ भुवन दस चारी ॥ तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें । दुहुँ हाथ मुद मोदक मोरें ॥
मैं स्वामीके कामके लिये रणमें लड़ाई करूँगा और चौदहों लोकोंको अपने यशसे उज्ज्वल कर दूँगा। श्रीरघुनाथजीके निमित्त प्राण त्याग दूँगा। मेरे तो दोनों ही हाथोंमें आनन्दके लड़दू हैं (अर्थात् जीत गया तो रामसेवकका यश प्राप्त करूँगा और मारा गया तो श्रीरामजीकी नित्य सेवा प्राप्त करूँगा) ॥ ३ ॥
साधु समाज न जाकर लेखा । राम भगत महुँ जासु न रेखा ॥ जायँ जितत जग सो महिभारु । जननी जौबन बिटप कुठारु ॥
साधुओंके समाजमें जिसकी गिनती नहीं और श्रीरामजीके भक्तोंमें जिसका स्थान नहीं, वह जगत्में पृथ्वीका भार होकर व्यर्थ ही जीता है। वह माताके यौवनरूपी वृक्षके काटनेके लिये कुल्हाड़ामात्र है ॥ ४ ॥
दो०—बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढाइ उछाहु।
सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु ॥ १९० ॥
[इस प्रकार श्रीरामजीके लिये प्राणसमर्पणका निश्चय करके] निषादराज विषादसे रहित हो गया और सबका उत्साह बढ़ाकर तथा श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके उसने तुरंत ही तरकस, धनुष और कवच माँगा ॥ १९० ॥
बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ । सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ ॥ भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा । एकहिं एक बढावइ करषा ॥
[उसने कहा—] हे भाइयो! जल्दी करो और सब सामान सजाओ। मेरी आज्ञा सुनकर कोई मनमें कायरता न लावे। सब हर्षके साथ बोल उठे—हे नाथ! बहुत अच्छा; और आपसमें एक-दूसरेका जोश बढ़ाने लगे ॥ १ ॥
चले निषाद जोहारि जोहारी । सूर सकल रन रूचइ रारी ॥ सुमिरि राम पद पंकज पनहीं । भार्थी बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं ॥
निषादराजको जोहार कर-करके सब निषाद चले। सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राममें लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंकी जूतियोंका स्मरण करके उन्होंने भार्थीयों (छोटे-छोटे तरकस) बाँधकर धनुहियों (छोटे-छोटे धनुषों)-पर प्रत्यञ्चा चढ़ायीं ॥ २ ॥
अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं । फरसा बाँस सेल सम करहीं ॥ एक कुसल अति ओड़न खाँड़े । कूदहिं गगन मनहुँ छिति छोँड़े ॥