भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 504, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 504

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  • रामचरितमानस *

कवच पहनकर सिरपर लोहेका टोप रखते हैं और फरसे, भाले तथा बरछोंको सीधा कर रहे हैं (सुधार रहे हैं)। कोई तलवारके बार रोकनेमें अत्यन्त ही कुशल हैं। वे ऐसे उमंगमें भरे हैं मानो धरती छोड़कर आकाशमें कूद (उछल) रहे हों॥३॥

निज निज साजु समाजु बनाई । गुह राउतहि जोहारे जाई॥ देखि सुभट सब लायक जाने । लै लै नाम सकल सनमाने॥

अपना-अपना साज-समाज (लड़ाईका सामान और दल) बनाकर उन्होंने जाकर निषादराज गुहको जोहार की। निषादराजने सुन्दर योद्धाओंको देखकर, सबको सुयोग्य जाना और नाम ले-लेकर सबका सम्मान किया॥४॥

दो०—भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि। सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि॥ १९१॥

[उसने कहा—] हे भाइयो! धोखा न लाना (अर्थात् मरनेसे न घबराना), आज मेरा बड़ा भारी काम है। यह सुनकर सब योद्धा बड़े जोशके साथ बोल उठे—हे बीर! अधीर मत हो॥१९१॥

राम प्रताप नाथ बल तोरे । करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे॥ जीवत पाउ न पाछें धरहीं । रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं॥

हे नाथ! श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे और आपके बलसे हमलोग भरतकी सेनाको बिना वीर और बिना घोड़ेकी कर देंगे (एक-एक वीर और एक-एक घोड़ेको मार डालेंगे)। जीते-जी पीछे पाँव न रखेंगे। पृथ्वीको रुण्ड-मुण्डमयी कर देंगे (सिरों और धड़ोंसे छा देंगे)॥१॥

दीख निषादनाथ भल टोलू । कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू॥ एतना कहत छींक भड़ बाँए । कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए॥

निषादराजने वीरोंका बढ़िया दल देखकर कहा—जुझाऊ (लड़ाईका) ढोल बजाओ। इतना कहते ही बायीं ओर छींक हुई। शकुन विचारनेवालोंने कहा कि खेत सुन्दर हैं (जीत होगी)॥२॥

बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी । भरतहि मिलिअ न होइहि रारी॥ रामहि भरतु मनावन जाहीं । सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं॥

एक बूढ़ेने शकुन विचारकर कहा—भरतसे मिल लीजिये, उनसे लड़ाई नहीं होगी। भरत श्रीरामचन्द्रजीको मनाने जा रहे हैं। शकुन ऐसा कह रहा है कि विरोध नहीं है॥३॥

सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा । सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा॥ भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें । बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें॥

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