श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 495, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू । कीन्ह कैकई सब कर काजू॥ एहि तें मोर काह अब नीका । तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥
और मुझे सुख, सुन्दर यश और उत्तम राज्य दिया! कैकेयीने सभीका काम बना दिया! इससे अच्छा अब मेरे लिये और क्या होगा? उसपर भी आप लोग मुझे राजतिलक देनेको कहते हैं॥३॥
कैकड़ जठर जनमि जग माहीं । यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं॥ मोरि बात सब बिधिहिं बनाई । प्रजा पाँच कत करहु सहाई॥
कैकेयीके पेटसे जगत्में जन्म लेकर यह मेरे लिये कुछ भी अनुचित नहीं है। मेरी सब बात तो विधाताने ही बना दी है। [फिर] उसमें प्रजा और पंच (आप लोग) क्यों सहायता कर रहे हैं?॥४॥
दो०—ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥१८०॥
जिसे कुग्रह लगे हों [अथवा जो पिशाचग्रस्त हों], फिर जो वायुयोगसे पीड़ित हो और उसीको फिर बिच्छू डंक मार दे, उसको यदि मदिरा पिलायी जाय, तो कहिये यह कैसा इलाज है!॥१८०॥
कैकड़ सुअन जोगु जग जोई । चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई॥ दसरथ तनय राम लघु भाई । दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई॥
कैकेयीके लड़केके लिये संसारमें जो कुछ योग्य था, चतुर विधाताने मुझे वही दिया। पर 'दशरथजीका पुत्र' और 'रामका छोटा भाई' होनेकी बड़ाई मुझे विधाताने व्यर्थ ही दी॥१॥
तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका । राय रजायसु सब कहँ नीका॥ उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही । कहहु सुखेन जथा रुचि जेही॥
आप सब लोग भी मुझे टीका कढ़ानेके लिये कह रहे हैं! राजाकी आज्ञा सभीके लिये अच्छी है। मैं किस-किसको किस-किस प्रकारसे उत्तर दूँ? जिसकी जैसी रुचि हो, आपलोग सुखपूर्वक वही कहें॥२॥
मोहि कुमातु समेत बिहाई । कहहु कहहि के कीन्ह भलाई॥ मो बिनु को सचराचर माहीं । जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं॥
मेरी कुमाता कैकेयीसमेत मुझे छोड़कर, कहिये, और कौन कहेगा कि यह काम अच्छा किया गया? जड़-चेतन जगत्में मेरे सिवा और कौन है जिसको श्रीसीतारामजी प्राणोंके समान प्यारे न हों॥३॥