श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 496, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
परम हानि सब कहँ बड़ लाहू । अदिनु मोर नहिं दूषन काहू ॥ संसय सील प्रेम बस अहहू । सबुड़ उचित सब जो कछु कहहू ॥
जो परम हानि है, उसीमें सबको बड़ा लाभ दीख रहा है। मेरा बुरा दिन है किसीका दोष नहीं। आप सब जो कुछ कहते हैं सो सब उचित ही है। क्योंकि आप लोग संशय, शील और प्रेमके वश हैं ॥ ४ ॥
दो०—राम मातु सुठि सरलचित्त मो पर प्रेमु बिसेषि।
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि ॥ १८१ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी माता बहुत ही सरलहृदय हैं और मुझपर उनका विशेष प्रेम है। इसलिये मेरी दीनता देखकर वे स्वाभाविक स्नेहवश ही ऐसा कह रही हैं ॥ १८१ ॥
गुर बिबेक सागर जगु जाना । जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना ॥ मो कहँ तिलक साज सज सोऊ । भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ ॥
गुरुजी ज्ञानके समुद्र हैं, इस बातको सारा जगत् जानता है, जिनके लिये विश्व हथेलीपर रखे हुए बेरके समान है, वे भी मेरे लिये राजतिलकका साज सज रहे हैं। सत्य है, विधाताके विपरीत होनेपर सब कोई विपरीत हो जाते हैं ॥ १ ॥
परिहरि रामु सीय जग माहीं । कोउ न कहहि मोर मत नाहीं ॥ सो मैं सुनब सहब सुखु मानी । अंतहूँ कीच तहाँ जहाँ पानी ॥
श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीको छोड़कर जगत्में कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थमें मेरी सम्मति नहीं है। मैं उसे सुखपूर्वक सुनूँगा और सहूँगा। क्योंकि जहाँ पानी होता है, वहाँ अन्तमें कीचड़ होता ही है ॥ २ ॥
डरु न मोहि जग कहहि कि पोचू । परलोकहु कर नाहिन सोचू ॥ एकड़ उर बस दुसह दवारी । मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी ॥
मुझे इसका डर नहीं है कि जगत् मुझे बुरा कहेगा और न मुझे परलोकका ही सोच है। मेरे हृदयमें तो बस, एक ही दुःसह दावानल धधक रहा है कि मेरे कारण श्रीसीतारामजी दुखी हुए ॥ ३ ॥
जीवन लाहु लखन भल पावा । सबु तजि राम चरन मनु लावा ॥ मोर जनम रघुबर बन लागी । झूठ काह पछिताउँ अभागी ॥
जीवनका उत्तम लाभ तो लक्ष्मणने पाया, जिन्होंने सब कुछ तजकर श्रीरामजीके चरणोंमें मन लगाया। मेरा जन्म तो श्रीरामजीके वनवासके लिये ही हुआ था। मैं अभागा झूठ-मूठ क्या पछताता हूँ? ॥ ४ ॥