भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 486

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  • रामचरितमानस *

अस कहि मातु भरतु हियँ लाए । थन पय स्ववहिं नयन जल छाए ॥ करत बिलाप बहुत एहि भाँती । बैठेहिं बीति गई सब राती ॥

ऐसा कहकर माता कौसल्याने भरतजीको हृदयसे लगा लिया। उनके स्तनोंसे दूध बहने लगा और नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल छा गया। इस प्रकार बहुत विलाप करते हुए सारी रात बैठे-ही-बैठे बीत गयी ॥ ३ ॥

वामदेउ बसिष्ठ तब आए । सचिव महाजन सकल बोलाए ॥ मुनि बहु भाँति भरत उपदेशे । कहि परमारथ बचन सुदेशे ॥

तब वामदेवजी और वसिष्ठजी आये। उन्होंने सब मन्त्रियों तथा महाजनोंको बुलवाया। फिर मुनि वसिष्ठजीने परमार्थके सुन्दर समयानुकूल वचन कहकर बहुत प्रकारसे भरतजीको उपदेश दिया ॥ ४ ॥

दो०—तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।

उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु ॥ १६९ ॥

[वसिष्ठजीने कहा—] हे तात! हृदयमें धीरज धरो और आज जिस कार्यके करनेका अवसर है, उसे करो। गुरुजीके वचन सुनकर भरतजी उठे और उन्होंने सब तैयारी करनेके लिये कहा ॥ १६९ ॥

नृप तनु बेद बिदित अन्हवावा । परम बिचित्र बिमानु बनावा ॥ गहि पद भरत मातु सब राखी । रहीं रानि दरसन अभिलाषी ॥

वेदोंमें बतायी हुई विधिसे राजाकी देहको स्नान कराया गया और परम विचित्र विमान बनाया गया। भरतजीने सब माताओंको चरण पकड़कर रखा (अर्थात् प्रार्थना करके उनको सती होनेसे रोक लिया)। वे रानियाँ भी [श्रीरामके] दर्शनकी अभिलाषासे रह गयीं ॥ १ ॥

चंदन अगर भार बहु आए । अमित अनेक सुगंध सुहाए ॥ सरजु तीर रचि चिता बनाई । जनु सुरपुर सोपान सुहाई ॥

चन्दन और अगरके तथा और भी अनेकों प्रकारके अपार [कपूर, गुग्गुल, केसर आदि] सुगन्ध-द्रव्योंके बहुत-से बोझ आये। सरयूजीके तटपर सुन्दर चिता रचकर बनायी गयी, [जो ऐसी मालूम होती थी] मानो स्वर्गकी सुन्दर सीढ़ी हो ॥ २ ॥

एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही । बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही ॥ सोधि सुमृति सब बेद पुराना । कीन्ह भरत दसगात बिधाना ॥

इस प्रकार सब दाहक्रिया की गयी और सबने विधिपूर्वक स्नान करके तिलाञ्जलि दी। फिर वेद, स्मृति और पुराण सबका मत निश्चय करके उसके अनुसार भरतजीने पिताका दशगात्र-विधान(दस दिनोंके कृत्य) किया ॥ ३ ॥