श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 487, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा । तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा ॥ भए बिसुद्ध दिए सब दाना । धेनु बाजि गज बाहन नाना ॥
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने जहाँ जैसी आज्ञा दी, वहाँ भरतजीने सब वैसा ही हजारों प्रकारसे किया। शुद्ध हो जानेपर [विधिपूर्वक] सब दान दिये। गौएँ तथा घोड़े, हाथी आदि अनेक प्रकारकी सवारियाँ, ॥ ४ ॥
दो०— सिंधासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम । दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम ॥ १७० ॥
सिंहासन, गहने, कपड़े, अन्न, पृथ्वी, धन और मकान भरतजीने दिये; भूदेव ब्राह्मण दान पाकर परिपूर्णकाम हो गये (अर्थात् उनकी सारी मनोकामनाएँ अच्छी तरहसे पूरी हो गयीं) ॥ १७० ॥
पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी । सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी ॥ सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए । सचिव महाजन सकल बोलाए ॥
पिताजीके लिये भरतजीने जैसी करनी की वह लाखों मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जा सकती। तब शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी आये और उन्होंने मन्त्रियों तथा सब महाजनोंको बुलवाया ॥ १ ॥
बैठे राजसभाँ सब जाई । पठए बोलि भरत दोउ भाई ॥ भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे । नीति धरममय बचन उचारे ॥
सब लोग राजसभामें जाकर बैठ गये। तब मुनिने भरतजी तथा शत्रुघ्नजी दोनों भाइयोंको बुलवा भेजा। भरतजीको वसिष्ठजीने अपने पास बैठा लिया और नीति तथा धर्मसे भरे हुए वचन कहे ॥ २ ॥
प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी । कैकड़ कुटिल कीन्हि जसि करनी ॥ भूप धरमव्रतु सत्य सराहा । जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा ॥
पहले तो कैकेयीने जैसी कुटिल करनी की थी, श्रेष्ठ मुनिने वह सारी कथा कही। फिर राजाके धर्मव्रत और सत्यकी सराहना की, जिन्होंने शरीर त्यागकर प्रेमको निबाहा ॥ ३ ॥
कहत राम गुन सील सुभाऊ । सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ ॥ बहरि लखन सिय प्रीति बखानी । सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी ॥
श्रीरामचन्द्रजीके गुण, शील और स्वभावका वर्णन करते-करते तो मुनिराजके नेत्रोंमें जल भर आया और वे शरीरसे पुलकित हो गये। फिर लक्ष्मणजी और सीताजीके प्रेमकी बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्नेहमें मग्न हो गये ॥ ४ ॥