भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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  • रामचरितमानस *

भरतजीके वचन सबको प्यारे लगे। मानो वे श्रीरामजीके प्रेमरूपी अमृतमें पगे हुए थे। श्रीरामवियोगरूपी भीषण विषसे सब लोग जले हुए थे। वे मानो बीजसहित मन्त्रको सुनते ही जाग उठे ॥ १ ॥

मातु सचिव गुर पुर नर नारी । सकल सनेहैं बिकल भए भारी ॥ भरतहि कहहिं सराहि सराही । राम प्रेम मूरति तनु आही ॥

माता, मन्त्री, गुरु, नगरके स्त्री-पुरुष सभी स्नेहके कारण बहुत ही व्याकुल हो गये। सब भरतजीको सराह-सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर श्रीरामप्रेमकी साक्षात् मूर्ति ही है ॥ २ ॥

तात भरत अस काहे न कहहू । प्रान समान राम प्रिय अहहू ॥ जो पावँरु अपनी जड़ताई । तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई ॥

हे तात भरत! आप ऐसा क्यों न कहें। श्रीरामजीको आप प्राणोंके समान प्यारे हैं। जो नीच अपनी मूर्खतासे आपकी माता कैकेयीकी कुटिलताको लेकर आपपर सन्देह करेगा, ॥ ३ ॥

सो सठु कोटिक पुरुष समेता । बसिहि कलप सत नरक निकेता ॥ अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई । हरइ गरल दुख दारिद दहई ॥

वह दुष्ट करोड़ों पुरखोंसहित सौ कल्पोंतक नरकके घरमें निवास करेगा। साँपके पाप और अवगुणको मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विषको हर लेती है और दुःख तथा दरिद्रताको भस्म कर देती है ॥ ४ ॥

दो०— अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह । सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह ॥ १८४ ॥

हे भरतजी! वनको अवश्य चलिये, जहाँ श्रीरामजी हैं; आपने बहुत अच्छी सलाह विचारी। शोकसमुद्रमें डूबते हुए सब लोगोंको आपने [बड़ा] सहारा दे दिया ॥ १८४ ॥

भा सब कें मन मोदु न थोरा । जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा ॥ चलत प्रात लिखि निरनउ नीके । भरतु प्रानप्रिय भे सबही के ॥

सबके मनमें कम आनन्द नहीं हुआ (अर्थात् बहुत ही आनन्द हुआ)! मानो मेघोंकी गर्जना सुनकर चातक और मोर आनन्दित हो रहे हों। [दूसरे दिन] प्रातःकाल चलनेका सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभीको प्राणप्रिय हो गये ॥ १ ॥

मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई । चले सकल घर बिदा कराई ॥ धन्य भरत जीवनु जग माहीं । सीलु सनेहु सराहत जाहीं ॥