भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 499
  • अयोध्याकाण्ड *

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मुनि वसिष्ठजीकी वन्दना करके और भरतजीको सिर नवाकर, सब लोग विदा लेकर अपने-अपने घरको चले। जगत्में भरतजीका जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील और स्नेहकी सराहना करते जाते हैं ॥ २ ॥

कहहिं परसपर भा बड़ काजू । सकल चलै कर साजहिं साजू ॥ जेहि राखहिं रहु घर रखवारी । सो जानइ जनु गरदनि मारी ॥

आपसमें कहते हैं, बड़ा काम हुआ। सभी चलनेकी तैयारी करने लगे। जिसको भी घरकी रखवालीके लिये रहो, ऐसा कहकर रखते हैं, वही समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी ॥ ३ ॥

कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू । को न चहइ जग जीवन लाहू ॥

कोई-कोई कहते हैं—रहनेके लिये किसीको भी मत कहो, जगत्में जीवनका लाभ कौन नहीं चाहता ? ॥ ४ ॥

दो०— जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ ।

सनमुखु होत जो राम पद करै न सहस सहाइ ॥ १८५ ॥

वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता, भाई जल जाय जो श्रीरामजीके चरणोंके सम्मुख होनेमें हँसते हुए (प्रसन्नतापूर्वक) सहायता न करे ॥ १८५ ॥

घर घर साजहिं बाहन नाना । हरषु हृदयँ परभात पयाना ॥ भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू । नगरु बाजि गज भवन भँडारू ॥

घर-घर लोग अनेकों प्रकारकी सवारियाँ सजा रहे हैं। हृदयमें [बड़ा] हर्ष है कि सबेरे चलना है। भरतजीने घर जाकर विचार किया कि नगर, घोड़े, हाथी, महल-खजाना आदि— ॥ १ ॥

संपति सब रघुपति कै आही । जौँ बिनु जतन चलौं तजि ताही ॥ तौ परिनाम न मोरि भलाई । पाप सिरोमनि साई दोहाई ॥

सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजीकी है। यदि उसकी [रक्षाकी] व्यवस्था किये बिना उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूँ, तो परिणाममें मेरी भलाई नहीं है। क्योंकि स्वामीका द्रोह सब पापोंमें शिरोमणि (श्रेष्ठ) है ॥ २ ॥

करइ स्वामि हित सेवकु सोई । दूषन कोटि देइ किन कोई ॥ अस बिचारि सुचि सेवक बोले । जे सपनेहूँ निज धरम न डोले ॥

सेवक वही है जो स्वामीका हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे। भरतजीने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकोंको बुलाया जो कभी स्वप्नमें भी अपने धर्मसे नहीं डिगे थे ॥ ३ ॥

कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा । जो जेहि लायक सो तेहिं राखा ॥ करि सबु जतनु राखि रखवारे । राम मातु पहिं भरतु सिधारे ॥