भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • रामचरितमानस *

एक कैकेयी ही इस तरह हर्षित दीखती है मानो भीलनी जंगलमें आग लगाकर आनन्दमें भर रही हो। पुत्रको सोचवश और मनमारे (बहुत उदास) देखकर वह पूछने लगी—हमारे नैहरमें कुशल तो है? ॥ ३ ॥

सकल कुसल कहि भरत सुनाई । पूँछी निज कुल कुसल भलाई ॥ कहु कहैं तात कहाँ सब माता । कहैं सिय राम लखन प्रिय भ्राता ॥

भरतजीने सब कुशल कह सुनायी। फिर अपने कुलकी कुशल-क्षेम पूछी। [भरतजीने कहा—] कहो, पिताजी कहाँ हैं? मेरी सब माताएँ कहाँ हैं? सीताजी और मेरे प्यारे भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं? ॥ ४ ॥

दो०—सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।

भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन ॥ १५९ ॥

पुत्रके स्नेहमय वचन सुनकर नेत्रोंमें कपटका जल भरकर पापिनी कैकेयी भरतके कानोंमें और मनमें शूलके समान चुभनेवाले वचन बोली— ॥ १५९ ॥

तात बात मैं सकल सँवारी । भै मंथरा सहाय बिचारी ॥ कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ । भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ ॥

हे तात! मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मंथरा सहायक हुई। पर विधत्ताने बीचमें जरा-सा काम बिगाड़ दिया। वह यह कि राजा देवलोकको पधार गये ॥ १ ॥

सुनत भरतु भए बिबस बिषादा । जनु सहमेउ करि केहरि नादा ॥ तात तात हा तात पुकारी । परे भूमितल व्याकुल भारी ॥

भरत यह सुनते ही विषादके मारे विवश (बेहाल) हो गये। मानो सिंहकी गर्जना सुनकर हाथी सहम गया हो। वे 'तात! तात! हा तात!' पुकारते हुए अत्यन्त व्याकुल होकर जमीनपर गिर पड़े ॥ २ ॥

चलत न देखन पायउँ तोही । तात न रामहि सौँपेहु मोही ॥ बहरि धीर धरि उठे सँभारी । कहु पितु मरन हेतु महतारी ॥

[और विलाप करने लगे कि] हे तात! मैं आपको [स्वर्गके लिये] चलते समय देख भी न सका। [हाय!] आप मुझे श्रीरामजीको सौंप भी नहीं गये! फिर धीरज धरकर वे सँभलकर उठे और बोले—माता! पिताके मरनेका कारण तो बताओ ॥ ३ ॥

सुनि सुत बचन कहति कैकेई । मरमु पाँछि जनु माहुर देई ॥ आदिहु तें सब आपनि करनी । कुटिल कठोर मुदित मन बरनी ॥