भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 477
  • अयोध्याकाण्ड *

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एक-एक निमेष वर्षके समान बीत रहा था। इस प्रकार भरतजी नगरके निकट पहुँचे। नगरमें प्रवेश करते समय अपशकुन होने लगे। कौए बुरी जगह बैठकर बुरी तरहसे काँव-काँव कर रहे हैं ॥ २ ॥

खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला । सुनि सुनि होइ भरत मन सूला ॥ श्रीहत सर सरिता बन बागा । नगरु बिसेषि भयावनु लागा ॥

गदहे और सियार विपरीत बोल रहे हैं। यह सुन-सुनकर भरतके मनमें बड़ी पीड़ा हो रही है। तालाब, नदी, वन, बगीचे सब शोभाहीन हो रहे हैं। नगर बहुत ही भयानक लग रहा है ॥ ३ ॥

खग मृग हय गय जाहिं न जोए । राम बियोग कुरोग बिगोए ॥ नगर नारि नर निपट दुखारी । मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी ॥

श्रीरामजीके वियोगरूपी बुरे रोगसे सताये हुए पक्षी-पशु, घोड़े-हाथी [ऐसे दुखी हो रहे हैं कि] देखे नहीं जाते। नगरके स्त्री-पुरुष अत्यन्त दुखी हो रहे हैं। मानो सब अपनी सारी सम्पत्ति हार बैठे हों ॥ ४ ॥

दो०— पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।

भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय विषाद मन माहिं ॥ १५८ ॥

नगरके लोग मिलते हैं, पर कुछ कहते नहीं; गौँसे (चुपकेसे) जोहार (वन्दना) करके चले जाते हैं। भरतजी भी किसीसे कुशल नहीं पूछ सकते, क्योंकि उनके मनमें भय और विषाद छा रहा है ॥ १५८ ॥

हाट बाट नहिं जाइ निहारी । जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी ॥ आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि । हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि ॥

बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते। मानो नगरमें दसों दिशाओंमें दावागिन लगी है! पुत्रको आते सुनकर सूर्यकुलरूपी कमलके लिये चाँदनीरूपी कैकेयी [बड़ी] हर्षित हुई ॥ १ ॥

सजि आरती मुदित उठि धाई । द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई ॥ भरत दुखित परिवारु निहारा । मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा ॥

वह आरती सजाकर आनन्दमें भरकर उठ दौड़ी और दरवाजेपर ही मिलकर भरत-शत्रुघ्नको महलमें ले आयी। भरतने सारे परिवारको दुखी देखा। मानो कमलोंके वनको पाला मार गया हो ॥ २ ॥

कैकेई हरषित एहि भाँती । मनहुँ मुदित दव लाइ किराती ॥ सुतहि ससोच देखि मनु मारें । पूँछति नैहर कुसल हमारें ॥