भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 476

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  • रामचरितमानस *

वसिष्ठजीने नावमें तेल भरवाकर राजाके शरीरको उसमें रखवा दिया। फिर दूतोंको बुलवाकर उनसे ऐसा कहा—तुमलोग जल्दी दौड़कर भरतके पास जाओ। राजाकी मृत्युका समाचार कहीं किसीसे न कहना॥ १ ॥

एतनेइ कहेहु भरत सन जाई । गुर बोलाइ पठयउ दोउ भाई॥ सुनि मुनि आयसु धावन धाए । चले बेग बर बाजि लजाए॥

जाकर भरतसे इतना ही कहना कि दोनों भाइयोंको गुरुजीने बुलवा भेजा है। मुनिकी आज्ञा सुनकर धावन (दूत) दौड़े। वे अपने वेगसे उत्तम घोड़ोंको भी लजाते हुए चले॥ २ ॥

अनरथु अवध अरंभेउ जब तें । कुसगुन होहिं भरत कहैं तब तें॥ देखहिं राति भयानक सपना । जागि करहिं कटु कोटि कल्पना॥

जबसे अयोध्यामें अनर्थ प्रारम्भ हुआ, तभीसे भरतजीको अपशकुन होने लगे। वे रातको भयङ्कर स्वप्न देखते थे और जागनेपर [उन स्वप्नोंके कारण] करोड़ों (अनेकों) तरहकी बुरी-बुरी कल्पनाएँ किया करते थे॥ ३ ॥

बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना । सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना॥ मागहिं हृदयँ महेस मनाई । कुसल मातु पितु परिजन भाई॥

[अनिष्टशान्तिके लिये] वे प्रतिदिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दान देते थे। अनेकों विधियोंसे स्रद्धाभिषेक करते थे। महादेवजीको हृदयमें मनाकर उनसे माता-पिता, कुटुम्बी और भाइयोंका कुशल-क्षेम माँगते थे॥ ४ ॥

दो०— एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।

गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ॥ १५७॥

भरतजी इस प्रकार मनमें चिन्ता कर रहे थे कि दूत आ पहुँचे। गुरुजीकी आज्ञा कानोंसे सुनते ही वे गणेशजीको मनाकर चल पड़े॥ १५७॥

चले समीर बेग हय हाँके । नाघत सरित सैल बन बाँके॥ हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई । अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई॥

हवाके समान वेगवाले घोड़ोंको हाँकते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलोंको लॉँघते हुए चले। उनके हृदयमें बड़ा सोच था, कुछ सुहाता न था। मनमें ऐसा सोचते थे कि उड़कर पहुँच जाऊँ॥ १ ॥

एक निमेष बरष सम जाई । एहि बिधि भरत नगर निअराई॥ असगुन होहिं नगर पैठारा । रटहिं कुभाँति कुरखेत करारा॥