भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 475
  • अयोध्याकाण्ड *

४७३

दो०—राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।

तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥ १५५॥

राम-राम कहकर, फिर राम कहकर, फिर राम-राम कहकर और फिर राम कहकर राजा श्रीरामके विरहमें शरीर त्याग कर सुरलोकको सिधार गये॥ १५५॥

जिअन मरन फलु दसरथ पावा । अंड अनेक अमल जसु छावा॥

जिअत राम बिधु बदनु निहारा । राम बिरह करि मरनु सँवारा॥

जीने और मरनेका फल तो दशरथजीने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेकों ब्रह्माण्डोंमें छा गया। जीते-जी तो श्रीरामचन्द्रजीके चन्द्रमाके समान मुखको देखा और श्रीरामके विरहको निमित्त बनाकर अपना मरण सुधार लिया॥ १॥

सोक बिकल सब रोवहिँ रानी । रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥

करहिँ बिलाप अनेक प्रकारा । परहिँ भूमितल बारहिँ बारा॥

सब रानियाँ शोकके मारे व्याकुल होकर रो रही हैं। वे राजाके रूप, शील, बल और तेजका बखान कर-करके अनेकों प्रकारसे विलाप कर रही हैं और बार-बार धरतीपर गिर-गिर पड़ती हैं॥ २॥

बिलपहिँ बिकल दास अरु दासी । घर घर रुदनु करहिँ पुरबासी॥

अँथयउ आजु भानुकुल भानू । धरम अवधि गुन रूप निधानू॥

दास-दासीगण व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं और नगरनिवासी घर-घर रो रहे हैं। कहते हैं कि आज धर्मकी सीमा, गुण और रूपके भण्डार सूर्यकुलके सूर्य अस्त हो गये॥ ३॥

गारीँ सकल कैकइहि देहीं । नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं॥

एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी । आए सकल महामुनि ग्यानी॥

सब कैकेयीको गालियाँ देते हैं, जिसने संसारभरको बिना नेत्रका (अंधा) कर दिया! इस प्रकार विलाप करते रात बीत गयी। प्रातःकाल सब बड़े-बड़े ज्ञानी मुनि आये॥ ४॥

दो०—तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।

सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास॥ १५६॥

तब बसिष्ठ मुनिने समयके अनुकूल अनेक इतिहास कहकर अपने विज्ञानके प्रकाशसे सबका शोक दूर किया॥ १५६॥

तेल नावँ भरि नूप तनु राखा । दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा॥

धावहु बेगि भरत पहिं जाहू । नूप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू॥